दुख-चिंता को तुरंत छोड़ने का प्रयास करें

Samachar Jagat | Saturday, 08 Jun 2019 03:10:55 PM
Try to leave the anguish immediately

Rajasthan Tourism App - Welcomes to the land of Sun, Sand and adventures

एक बार एक व्यक्ति लोगों को सम्बोधित कर रहा था। जीवन निर्माण के लिए आवश्यक बातें बता रहा था। लोग बहुत ध्यान से उसकी बातों को सुन रहे थे। एकाएक उस व्यक्ति ने अपने हाथ में एक पुस्तक ली और लोगों से उसके वचन के बारे में पूछा कि इसमें कितना वजन होगा। किसी ने दो सौ ग्राम तो किसी ने तीन सौ ग्राम बताया। उस व्यक्ति ने आगे कहा कि यदि मैं इसे एक मिनट तक सीधा हाथ करके पकड़े रखूं तो क्या मेरे हाथ में कुछ दर्द होगा? वे बोले-बिल्कुल नहीं। यदि मैं इस पुस्तक को एक घण्टे तक पकड़े रखूं तो क्या मेरे हाथ में दर्द होगा! वे बोले हल्का-हल्का दर्द होगा।

और यदि मैं इस पुस्तक को एक दिन तक सीधा हाथ करके पकड़े रहूं तो क्या मेरे हाथ में कुछ दर्द होगा! वे बोले- बहुत दर्द होने लगेगा हाथ में। और व्यक्ति ने आगे कहा कि यदि मैं इस पुस्तक को लगातार पकड़े ही रखूं तो मेरे हाथ की क्या हालत होगी? सारे लोग एक साथ बोले-आपके हाथ में दर्द ही नहीं, लकवा मार जायेगा और हाथ में ही क्या शरीर के एक हिस्से में लकवा मार जायेगा। इसके बाद व्यक्ति ने आगे कहा कि यही स्थिति दुख और चिन्ता की है। यदि हम किसी चिंता या दुख को हमारे मन-मस्तिष्क से तुरंत मुक्त कर देंगे, उसे छोड़ देंगे तो हमारा मन-मस्तिष्क बिल्कुल सही रहेगा, उस पर दुख का प्रभाव बिल्कुल भी नहीं होगा और यदि उसे लम्बे समय तक अपने मन-मस्तिष्क में पकड़े ही रहेंगे तो न केवल हमारा मन-मस्तिष्क बल्कि शरी और जीवन ही लकवा ग्रस्त हो जायेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है।

चूंकि सुख-दुख जीवन के अहम् हिस्से हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का कोई महत्व नहीं है। दुख के कारण ही सुख का महत्व है और सुख के कारण ही दुख प्रासांगिक है। लेकिन ये सर्वदा हैं, शाश्वत हैं, जीवन के हिस्से हैं, इनका अपना लाजमी है, इनके बिना कभी भी जीवन आगे नहीं बढ़ता, जीवन सार्थक नहीं बन सकता है, सक्रिय नहीं बन सकता और सार्थक सृजन नहीं कर सकता। लेकिन सुख-दुख को ग्रहण करना और महसूस करना सब कुछ व्यक्ति पर निर्भर करता है।

 यदि व्यक्ति छोटे से कष्ट से बहुत विचलित हो जाये तो फिर उसके जीवन में कभी सुख आ ही नहीं सकता, वह कभी जीवन में सुख महसूस कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह हर छोटी सी बात से विचलित होगा रहेगा, पीडि़त होता रहेगा और सुख के वास्तविक आनंद से दूर ही भागता रहेगा। इसलिए जीवन का अर्थ तो यही है कि दुख को तुरंत छोड़े, उससे उबरें और सुख में इतने भी न डूब जायें कि जीवन का उद्देश्य ही भूल जायें।

प्रेरणा बिन्दु:- 
फूल महक रहा जिसके संग, कांटों की वह डाली देख
जिसका न होता कोई रंग, पानी की उस बूंद की उस बूंद को देख
जीवन में भरती जोश उमंग, मोर की उजली किरण को देख
भर देता जीवन में रंग, बहती हवा का झौंका देख।
 



 

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!



Copyright @ 2019 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.