बेरोजगारी की दर दोगुनी होकर छह फीसदी हुई

Samachar Jagat | Saturday, 20 Apr 2019 10:44:48 AM
Unemployment rate doubled to six percent

लोकसभा के जारी चुनावों के बीच एक बुरी खबर यह आई है कि भारत में पिछले 8 सालों में बेरोजगारी की दर बढक़र दोगुनी हो गई है। नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद से पिछले दो साल में 50 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। देश में बेरोजगार होने वालों में ज्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त और युवा है। यह जानकारी बेंगलुरु की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (एपीयू) की एक नई रिसर्च से सामने आई है। इसके मुताबिक 2018 में बेरोजगारी की दर बढक़र 6 फीसदी तक पहुंच गई जो वर्ष 2000 से 2011 के दशक में रही बेरोजगारी की दर से दोगुनी है।

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 हालांकि इस रिपोर्ट में नोटबंदी का बेरोजगारी बढ़ने के साथ सीधा संबंध स्थापित नहीं हो चुका है। यह रिपोर्ट अमित भोसले के नेतृत्व वाले एपीयू के रिसर्चर्स ने तैयार की है। इसमें कहा गया है कि सरकार नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएसओ) द्वारा जारी किए जाने वाले पीरियोडिक लेबर फोर्स (पीएलएफएस) के नतीजे जारी नहीं कर रही है। इसलिए उन्होंने इस अध्ययन में बेरोजगारी की स्थिति समझने के लिए सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईसी सीपीडीएक्स) के कंज्यूमर पिरामिड्स सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। 


रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य तौर पर देखें तो 2011 के बाद से बेरोजगारी लगातार बढ़ी है। इस बार आम चुनाव में दो बाते सामने आई है, रोजगार और कैश ट्रांसफर। ये दोनों गरीबी हटाने के सपने का हिस्सा है। कैश ट्रांसफर के सारे वादे सीधे और स्पष्ट है, जो छह हजार रुपए सालाना से शुरू होकर 72 हजार रुपए तक जाते हैं, साथ में कुछ पेंशन योजनाएं वगैरह भी है। लेकिन रोजगार के बारे में इतनी स्पष्ट बात नहीं की जा रही। पिछली बार भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में दो करोड़ लोगों को हर साल नौकरी देने की बात दी थी, बता दिया था कि इतने नौजवानों को रोजगार दिया जाएगा। इस बार उसने यह गलती नहीं दोहराई। कांगे्रस ने जरूर एक संख्या दी है, लेकिन वह सरकारी नौकरियों के लिए खाली पदों को भरने के बारे में है।

 हालांकि भाजपा ने भी एक संख्या दी है, लेकिन वह किसी नौकरी के लिए नहीं, बल्कि 30 लाख युवाओं को अपना उद्यम या स्टार्टअप शुरू करने के लिए कर्ज देने के बारे में है। दिलचस्प यह भी है कि भाजपा केे जो मुख्य 10 संकल्प है, उनमें सबको पक्का मकान देने का संकल्प जरूर है, लेकिन सबको पक्का रोजगार देने का संकल्प नहीं है। भारत की आबादी इस समय इतिहास के ऐसे मोड पर है, जहां नौजवानों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है। दुनिया के सबसे ज्यादा नौजवान तो खैर भारत में है ही। 

अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘डेमोग्राफिक डेवीडेंड’ कहा जाता है, यानी यह आबादी की एक ऐसी स्थिति है, जो किसी भी देश को बड़ा लाभ पहुंचा सकती है, क्योंकि आपके पास उत्पादक श्रम शक्ति अनुपात सबसे ज्यादा है, लेकिन हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। 21वीं सदी में पहली बार मतदाता बने युवाओं से वोट की तो अपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें रोजगार दिए जाने की बात नहीं कर रहे हैं।



 

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