अमेरिका-ईरान के साथ परमाणु करार से पीछे हटा

Samachar Jagat | Tuesday, 15 May 2018 02:46:27 PM
US-Iran withdraws from nuclear deal

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश के लिए आखिरकार अमेरिका उसके साथ हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अलग हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह मंगलवार को इसकी घोषणा की। ट्रंप अपने चुनाव प्रचार के समय से ही इस डील की आलोचना करते रहे हैं। उन्हें लगता रहा है कि ईरान ने परमाणु समझौते का उल्लंघन किया है। उनके मुताबिक सबसे पहले तो ईरान सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन कर रहा है और दूसरे उसने नवनिर्मित गैर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण भी किया है। ट्रंप की घोषणा से वैश्विक समुदाय सकते में है। ट्रंप का यह कदम दुनिया को नए तनाव में झोंकने वाला है।

 ईरान भी अमेरिका की कार्रवाई से बौखलाया है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में अमेरिका के  अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी और यूरोपीय संघ शामिल थे। असल में ट्रंप-अमेरिकी वर्चस्ववाद के पक्षधर है। उन्हें लगता रहा है कि इस समझौते में अमेरिका ज्यादा झुका हुआ है और इससे अमेरिका हित नहीं सधते हैं। वह शायद चाहते थे कि ईरान प्रतिबंधों से पूरी तरह तबाह हो जाए और घुटने टेक दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पश्चिमी एशिया की सियासत में उसकी भूमिका जारी रही और उसने विश्व की कई शक्तियों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए। रूस और के साथ उसकी बढ़ती नजदीकी ट्रंप को खटकती रही। अब वह ईरान पर नए सिरे से कड़े प्रतिबंध लगाना चाहते हैं। वह ऐसा कुछ करना चाहते हैं, जिससे अमेरिकी ताकत का इजहार हो। उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन ने कहा कि अमेरिका अपनी ताकत की बुनियाद पर ही कोई समझौता करता है।

ईरान के साथ समझौते से हटकर और नए सिरे से उस पर प्रतिबंध लगाकर अमेरिका अपनी ताकत स्थापित करना चाहता है। कुछ विशेषज्ञों की राय में इस डील को रद्द करने के बाद उत्तर कोरिया के नेता किम जोंगे उन के साथ एक सख्त समझौते का आधार तैयार हो गया है। बहरहाल अमेरिका के सहयोगी अब उनका कितना साथ देंगे, कहना मुश्किल है। कुछ यूरोपीय देश तो साफ कह चुके हैं कि ट्रंप के समझौते रद्द करने के बावजूद वे डील पर कायम रहेंगे। जर्मन विदेश मंत्री गाब्रिएल की राय है कि ईरान के साथ हुए समझौते को रद्द करने से यूरोप और अमेरिका के बीच खाई और बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि यूरोप इस मुद्दे पर एकजुट रहे हमें अमेरिकी लोगों को बताना होगा कि ईरान के मुद्दे पर उनका व्यवहार हम यूरोपीय लोगों को रूस और चीन के अमेरिका विरोधी रुख के करीब ले जाएगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में 2015 में हुए इस समझौते का मकसद ईरान का परमाणु कार्यक्रम सीमित करना था।

यानी शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए तो ईरान के परमाणु रिएक्टर चले, लेकिन परमाणु बम नहीं बनाया जाए। यह समझौता ईरान को घेरने का बड़े देशों का अभियान था। अमेरिका और ईरान के रिश्ते दशकों तक तनावपूर्ण रहे और इस दौरान दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं रहे। समझौता न करने की वजह से ईरान को वर्षों कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। इस समझौते के तहत ईरान को अपने उच्च संबंधित यूरेनियम भंडार का 98 फीसदी हिस्सा नष्ट करने और मौजूदा परमाणु सेंट्रीफ्यूज में से दो तिहाई को भी हटाने की बात थी। समझौते में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षक ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों की निगरानी करेंगे। इसके अलावा ईरान के हथियार खरीदने पर पांच साल और मिसाइल बनाने पर प्रतिबंध्ज्ञ 8 साल तक रहना था। समझौते पर हस्ताक्षर के बदले ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन-देन, उड्डयन और जहाजरानी के क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही गई थी।

 लेकिन ट्रंप के फैसले से सारा गणित पलट गया है। ईरान के साथ समझौते को लेकर सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों में जैसी गुटबाजी हो गई है, यह वैश्विक राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे नए समीकरण बनेंगे। चीन और रूस तो शुरू से ही ईरान के साथ है। पर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ ने समझौता जारी रखकर अमेरिका को यह संदेश दिया है कि हर मुद्दे पर उसकी हां में हां मिलाना संभव नहीं है। इसे ईरान को इन देशों का मजबूत समर्थन ही माना जाना चाहिए। ईरान ने भी इन देशों के साथ समझौता बनाए रखने की बात कही है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी कहा है कि ईरान में 2009 के बाद से परमाणु हथियार विकसित करने की गतिविधियों के कोई संकेत नहीं मिले हैं और ईरान समझौते के हिसाब से काम कर रहा है। ऐसे में समझौते से अमेरिका का हटना वाजिब नहीं कहा जा सकता है। जाहिर है ट्रंप का यह फैसला कूटनीतिक स्तर पर भारी उथल-पुथल पैदा का सकता है। इस निर्णय के बाद तेल के दाम बढ़ सकते है, जिसका भारत पर भी असर पड़ेगा। देश में महंगाई बढ़ेगी।

 हालांकि अगर यूरोपीय संघ डील में बना रहा तो ईरान से कच्चे तेल के आयात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अगर भविष्य में चाबहार प्रोजेक्ट पर कोई असर पड़ा तो ईरान की रूहानी सरकार चीन आर पाकिस्तान को इसमें शामिल कर सकती है। जो भारत के लिए ठीक नहीं होगा। इधर भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश के लिए अमेरिका द्वारा वित्तीय प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर कहा है कि इस मसले को बातचीत और राजनयिक उपायों के तहत सुलझाना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्रालय ने पिछले सप्ताह बुधवार की शाम जारी बयान में कहा, भारत ने हमेशा ही कहा कि इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इसे तय समझौते के तहत सुलझाना चाहिए। सहयोगी देशों का प्रस्ताव ठुकराते हुए अमेरिका इससे बाहर आ गया। अन्य यूरोपीय देश इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ नहीं है। 

फ्रांस की अगुवाई में सभी यूरोपीय देशों ने अमेरिका पर इस संधि में बने रहे का दबाव बनाया था। भारत ने कहा कि संयुक्त वृहद कार्रवाई योजना (जेसीपीएओ) के तहत इस मुद्दे पर बातचीत जरूरी है। जेसीपीएओ पर ईरान और पी-5 और एक (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों-चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और अमेरिका के साथ जर्मनी) और यूरोपीय संघ ने वियना में 14 जुलाई 2015 को हस्ताक्षर किए थे। इधर वित्त मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका द्वारा ईरान पर वित्तीय प्रतिबंध के फैसले से भारत का वहां से कच्चे तेल का आयात प्रभावित नहीं होगा। जब तक यूरोपीय संघ भी इसी तरह के कदम नहीं उठाता। ईरान से कच्चे तेल के आयात पर असर नहीं पड़ेगा।
 



 

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