गेहूं का रिकार्ड उत्पादन बनी समस्या

Samachar Jagat | Monday, 06 May 2019 02:43:49 PM
Wheat production

देश में इस साल रबी के चालू समय काल में गेहूं का रिकार्ड उत्पादन होने जा रहा है। पिछले साल के गेहूं उत्पादन का काफी स्टॉक बना हुआ है। इस कारण देश की मंडियों में गेहूं के भावो में 11 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी आ गई है। केंद्र सरकार ने इस आधिक्य की स्थिति लाने के लिए आयात किए जाने वाले गेहूं पर आयात शुल्क 30 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी कर दी है। भारत दुनिया में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन करने वाले देशों में दूसरे नंबर का राष्ट्र है। प्रथम स्थान पर अमेरिका है। तीसरे स्थान पर आस्टे्रलिया और कनाडा है। 

भारत दूसरे और तीसरे स्थान के राष्ट्रों आस्टे्रलिया और कनाडा को पीछे छोडक़र दुनिया में दूसरे स्थान पर आ गया है। आजादी के बाद देश में यह स्थिति कई दशकों तक रही कि हमें गेहूं व अन्य अनाज व दालें अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया से खरीदना पड़ता था। लोग भूले नहीं होंगे कि पहले राशन की दुकानों पर आस्ट्रेलिया का लाल गेहूं मिलता था। भारत की प्रगति अब देश में बम्पर और आधिक्य (सरप्लस) की दृष्टि से देखा जाए तो हमें अपने देश की प्रगति पर गर्व होना चाहिए। यही हाल सब्जियों में भी है। 

आलू, टमाटर और प्याज के भाव बम्पर उत्पादन से इतने क्रेश हो जाते हैं कि उन्हें फेंकने में भी करोड़ों रुपए का खर्चा आता है। हमारे कृषि विकास में एक बड़ी खामी यह हो गई है कि हमने कृषि उत्पादन तो बम्पर कर लिया, लेकिन हमारे पास अनाज रखने के लिए गोदामों की भारी कमी है। दूसरी ओर योजना बनाने वालों की यह बड़ी असफलता है कि देश में कृषि उत्पादन के पूरे उपयोग के लिए हमने कृषि उद्योगों (एग्रोइंडस्ट्री) का विकास नहीं किया। भंडारण की कमी से करोड़ों का अनाज वर्षा के कारण सड़-गल जाता है और बम्पर फसलों को फेंकना पड़ता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने एक समय यहां तक कह डाला कि बजाए अनाज सड़ाने और फेंकने के इसे गरीबों में मुफ्त क्यों नहीं बांटा जा रहा है। कृषि के साथ कृषि उद्योग नहीं होना विकास पर पानी फेर रहा है। गेहूं उत्पादन की प्रगति में एक समय सर्वप्रथम पंजाब, दूसरे स्थान पर हरियाणा, तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश और चौथे स्थान पर मध्य प्रदेश था। अब देश में कृषि उत्पादन में सर्वाधिक प्रगति मध्यप्रदेश ने की है। गेहूं उत्पादन में उत्तर प्रदेश व हरियाणा को पीछे छोड़ता हुआ, पंजाब के समकक्ष प्रथम स्थान पर है। 

जहां तक गेहूं की क्वालिटी का प्रश्न है। मध्यप्रदेश मालवी और शरबती गेहूं सारी दुनिया में सबसे ऊंची क्वालिटी मानी जाती है। पेट्रो कू्रड से अत्यधिक धनी हो गए अरब राष्ट्र मध्यप्रदेश का गेहूं और देश का बासमती चावल ही खरीदते हैं। इस सबके बावजूद भारत के खाद्य और आटा उद्योग आस्ट्रेलिया से गेहूं आयात करते हैं। वह उन्हें भारत के गेहूं से सस्ता पड़ता है। यह भी एक अजीब स्थिति है कि हमारे कई उद्योग व आस्ट्रेलिया से जहां गेहूं आयात करते हैं, वहीं भारत धनाढ्य देशों को गेहूं का निर्यात करता है। 

हम गेहूं का रिकार्ड उत्पादन कर रहे हैं और बाहर से खरीद रहे हैं और बेच भी रहे हैं। जहां धनाढ्य देश हमारा बासमती चावल लेते हैं, वहीं हमारे पड़ोसी नेपाल, म्यांमार और चीन भी हमसे दूसरी किस्मों-दुबराज, मोगरा, काली मूंछ, झिल्ली आदि चावल भारी मात्रा में आयात करते हैं। कई अफ्रीकी देशों में भी भारत का गेहूं व कोर्स चावल भारी मात्रा में निर्यात हो रहा है। 
इस साल सरकार का यह प्रयास है कि बम्पर उत्पादन के कारण गेहूं की कीमतें क्रेश न होने पाए, उन्होंने सरकार के समर्थन मूल्य के स्तर पर कायम रखने की नीति अपनाई गई है। इसके लिए गेहूं के आयात पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाकर महंगा कर दिया है। इस साल सरकार ने गेहूं के समर्थन मूल्य में 6 फीसदी की वृद्धि करके उसे 1840 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है। 

भारत का गेहूं उत्पादन इस वर्ष 2019 में 2 प्रतिशत बढ़ रहा है और 99.13 मिलीयन टन का रिकार्ड उत्पादन होने जा रहा है। भारत को समर्थन मूल्य निर्धारण में किसानों की लागत और लाभ के साथ आटा व अन्य खाद्य उद्योगों की स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। 

अभी समर्थन मूल्य के कारण उन्हें आस्टे्रलिया से गेहूं का आयात करना सस्ता पड़ता है। इस समस्या का निदान किया जाए कि वे देश का गेहूं ही खरीदें।



 

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