व्यक्तियों की भीड़ में आदमी मिलता कहां

Samachar Jagat | Wednesday, 10 Apr 2019 04:20:38 PM
Where does the man get in the crowd?

ऐसी कोई जगह दिखाई ही नहीं देती है जहां व्यक्तियों की भीड़ न हो और यह तय बात है कि जहां भीड़ होगी वहां पर न धर्म की परिभाषा होगी न कोई इंसान की परिभाषा या भाषा होगी न कोई प्रतिमान होंगे न कोई मान-सम्मान होगा, बस वहां तो शैतानियत होगी, उच्छृंखलता होगी और खूब उड़ेंगी मानवता की धज्जियां। ऐसी भीड़ को देखकर कोई भी अपने सिद्धांतों पर कब रहने वाला है, इससे यह जाहिर है कि इस प्रकार की भीड़ से सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। फिर चाहे खूब धन-दौलत कमाने की बात हो और खूब धन-दौलत कमाई भी जा रही है, लेकिन मन की शांति उसी रफ्तार से गंवाई जा रही है अर्थात् जितना अधिक धन उतनी ही मन की शांति कम, जितने अधिक मनुष्य बढ़ रहे हैं उतनी ही अधिक मनुष्यता घट रही है, यह स्वाभाविक है।

इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहा जाए कि पहले छोटे-छोटे कच्चे घरों में बहुत सारे संयुक्त परिवार रहते थे अर्थात् आदमी रहते थे जबकि आज बड़े-बड़े आलीशान घरों में-बंगलों में हम दो और हमारा एक रहते हैं अर्थात् पहले घर छोटे थे लेकिन उसमें रहने वाले बड़े थे अर्थात् बड़ी सोच वाले थे, बड़े दिल वाले थे लेकिन अफसोस है कि आज घर तो बड़े होते जा रहे हैं और उसमें रहने वाले उतने ही छोटे होते जा रहे हैं अर्थात् उनकी सोच-उनका दिल छोटा और छोटा होता जा रहा है। बड़ी-बड़ी डिग्रियां हैं, लेकिन कॉमनसेंस का नामोनिशान तक नहीं दिखाई देता है, क्वान्टिटी की शिक्षा में क्वालिटी ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती, फिर ऐसी बड़ी-बड़ी डिग्रियों का क्या औचित्य? क्योंकि डिग्री अपनी जगह है और ज्ञान-बुद्धि अपने जगह हैं।

आज चन्द्रमा पर और मंगल पर लोग जा रहे हैं, लेकिन अपने पड़ौसी के यहां नहीं जा रहे हैं, हजारों साल की जन्म तिथियां और पुण्य तिथियां तो याद रखते हैं लोग लेकिन अपने दादा-दादी, माता-पिता की जन्म तिथियां या पुण्य तिथियां तक याद नहीं रखते हैं। फेसबुक पर हजारों मित्र मिल जाएंगे, लेकिन वास्तविक जीवन में कोई एक भी मित्र नहीं मिलता है और तो और महंगी घड़ी पहनकर भी लोग कभी समय की कद्र नहीं करते हैं। आइए, इन्हीं गिरावटों में हम अपनी ऊंचाई को कभी कम नहीं होने दें।

प्रेरणा बिन्दु:- 
व्यक्तियों की भीड़ में आदमी मिलता कहां
मोमबत्तियों के बीच में दीपक जलता कहां
घर की दीवारों और दिल की दरारों में
टुकड़ों-टुकड़ों आदमी आज सिलता कहां।
 



 

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