सर्दी का सितम विश्व रिकार्ड की ओर

Samachar Jagat | Wednesday, 10 Jan 2018 12:52:37 PM
Winter world record for September

उत्तर भारत पूरी तरह ठंड की जकड़ में है। पहाड़ों से लेकर मैदानों तक सर्द हवाएं कंपकंपी बढ़ा रही है और पारा लगातार लुढक़ रहा है। प्रदेश में कोहरे और सर्दी का सितम सोमवार को भी जारी रहा। राज्य में ठंडी हवाएं चलने के कारण रविवार को जयपुर और बीकानेर संभागों में शनिवार के मुकाबले न्यूनतम तापमान में गिरावट जारी रही। मौसम विभाग के प्रवक्ता के अनुसार प्रदेश के चूरू और पिलानी में रविवार की सुबह घना कोहरा छाया रहा। चूरू में न्यूनतम तापमान एक डिग्री सेल्सियस, सीकर और माउंट आबू में दो, पिलानी में तीन, श्रीगंगानगर में 3.1, अलवर एवं भीलवाड़ा मेें चार और चित्तौड़गढ़ में पांच, जयपुर में 7.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग के अनुसार पूरे उत्तर भारत अगले तीन-चार दिनों में विशेष बदलाव की उम्मीद नहीं है।

 अनुमान है कि अगले तीन दिनों तक पारा 1.2 डिग्री और गिरेगा। राजस्थान का चूरू, सीकर, माउंट आबू और अलवर हिमाचल के शिमला से 2.9 डिग्री से भी सर्द रहा। भारतीय मौसम विभाग ने उपग्रह इनसेट 3 डी (मौसम उपग्रह) के जरिए तीन जनवरी की सुबह 9.30 बजे मध्य पाकिस्तान से दिल्ली होते हुए बंगाल की खाड़ी तक कोहरे की एक मोटी परत देखी है। मौसम वैज्ञानिक राजेन्द्र जेनामणी ने अपने फेसबुक पेज पर इस तस्वीर को साझा किया। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार यह दुनिया में कोहरे की सबसे बड़ी परत है। यह परत करीब 1800 किलोमीटर लंबी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार में 25 दिसंबर को कोहरे की यह चादर बननी शुरू हुई।

इसके बाद पश्चिमी हिस्से में यह 31 दिसंबर को दिल्ली, पंजाब और आगे पाकिस्तान की ओर फैली। उधर दूसरी तरफ दो जनवरी को यह पश्चिम बंगाल से लेकर बांग्लादेश तक विस्तृत होती चली गई। कोहरे की ऐसी परत दिसंबर के अंंतिम सप्ताह और जनवरी के पहले सप्ताह में पहले भी बनी है। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है, जब यह मध्य पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक फैले। मौसम विभाग के अनुसार इस दौरान ठंडी हवा चलेगी, जिससे ठिठुरन बढ़ेगी। कोहरे के लिहाज से कनाडा, उत्तर अमेरिका और वाशिंगटन के कुछ क्षेत्र ऐसे है, जहां कोहरा 206 दिन, 200 दिन और 165 दिन छाया रहता है। कोहरे के लंबे दिनों तक छाए रहने के तो रिकार्ड तो खूब है, लेकिन इसके विस्तर की लंबाई से संबंधित रिकार्ड नहीं मिलता है। मौसम विभाग के अनुसार अगले कुछ दिन दिल्ली व आसपास के इलाकों में कोहरा बना रहेगा। इसके कारण दिन के तापमान में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है, लेकिन यदि हवा की गति बढ़ती है तो फिर यह परत टूट सकती है।

अन्यथा लंबी भी खिंच सकती है। मौसम के बदलते मिजाज के चलते आज समूचा उत्तर भारत कड़ाके की ठंड की चपेट में है। टे्रनें भयावह तरीके से विलंबित है, हवाई उड़ानों का कोई ठिकाना नहीं है। सडक़ मार्ग का हाल यह है कि उच्चतम स्तर के राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस वे पर भी सफर सुरक्षित नहीं है। कहीं पर ठंड से, तो कहीं घने कोहरे से हुए सडक़ हादसों का शिकार होकर लोग मर रहे हैं। हम अभी तक न तो ट्रेनों के लेट होने और दुर्घटनाओं से बचाने का कोई कारगार वैज्ञानिक समाधान दे पाएं हैं, न वाहनों की गति स्वत: बढ़ा देेने वाले एक्सप्रेस वे पर कुहासे में दुर्घटनाएं बचाने का कोई तंत्र विकसित कर पाएं हैं। मौसम के बदलते मिजाज के दौरान हमें असली कारण तलाशने होंगे।

समझना होगा कि हमारे यहां कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बर्फीले इलाके होने के बावजूद ठंड से मौतों की खबरें उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली जैसे इलाकों से ही क्यों आती है? रविवार को ही खबर थी कि उत्तर प्रदेश में ठंड के कारण एक दिन में 70 लोगों की मौत हो गई। इसका कारण क्या है? इस सवाल के जवाब में ही समस्या का समाधान है और सच यह है कि जवाब तलाशने की हमने कभी कोशिश ही नहीं की। दरअसल अब समय यह समझने का है कि मौसम तो अपनी चाल चलता है और चलेगा। लेकिन हम उसके साथ कदम ताल कब सीखेंगे?

हमारे यहां हर मौसम अपने तरीके से जिंदगियां जाने का कारण बनता है, लेकिन हम यह मानने को तैयार नहीं है कि यह मौसम का कम, बल्कि व्यवस्थाओं की खामियों का नतीजा ज्यादा है। ऐसी खामियां, जो समय से योजनाएं नहीं बनने देती। हम मौसम की सही भविष्यवाणी तो नहीं कर ढूंढ पाए, वैज्ञानिक सोच वाला ऐसा तंत्र भी विकसित नहीं कर सके, जो पिछले अनुभवों के सबक से आगे की रणनीति बना पाता। यही कारण है कि नाला सफाई का काम बारिश करीब आने के बाद शुरू होता है। अलाव और रैन-बसेरों का आकलन करने में इतना वक्त निकल जाता है कि कई बार यह काम मौसम खत्म होने के बाद तक पूरा नहीं हो पाता।
 
दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र का दौरा करते समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में रेन बसेरे के बारे में जानकारी चाही तो ऐनवक्त पर टेंट हाउस से टेंट लगवाकर वही उसमें किराए के गद्दे और कंबल लाकर लोगों को सुलाया गया और दौरे के दूसरे दिन उन्हें बाहर खदेड़ दिया गया। यह सब दृश्य एक टीवी न्यूज चैनल पर दिखाया गया। यही हाल सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए यूनीफार्म खरीदने की औपचारिकता तब शुरू होती है, जब सर्दी सिर चढ़ चुकी होती है।

प्रकृति तो हमें समय पूर्व चेतावनी देती रहती है, लेकिन हम ही समय रहते नहीं चेतते इसलिए हमें प्रकृति के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। याद होगा कि दो साल पहले मार्च के तीसरे हफ्ते में भी तेज हवाओं और बर्फबारी के दौर ने भारत को बेचैन कर दिया था। होली का फागोत्सव फीका रहा था। प्रकृति के इस संकेत से हमें सतर्क हो जाना चाहिए था। हालांकि अगला मार्च वैसा नहीं रहा, बल्कि उसने तो मार्च में ही जून की सी गर्मी का एहसास करा दिया था। 

मौसम का यह बदला मिजाज हमें सोचने पर मजबूर करता है। इस बार मौसम का बदला मिजाज हमें कुछ ओर ही दिखा रहा है, समूचा उत्तर भारत एक बार फिर कड़ाके की ठंड और कोहरे की चपेट में है। वैसे यह साल संभवत: वैश्विक स्तर पर मौसम बिगड़ने का साल बनने जा रहा है। वर्ष 2016 वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म साल रहा है। वैसे ही वर्ष 2017-18 का साल सबसे ठंडा साल के रूप में रिकार्ड बनाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। सर्दियों ने अगर नवंबर में ही भारत में रिकार्ड तोड़ना शुरू कर दिया तो अमेरिका में भी इसने 133 साल का रिकार्ड तोड़ दिया है। वहां 90 फीसदी से भी ज्यादा इलाका शून्य डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे है। कई इलाकों में तो तीस साल में पहली बार बर्फ देखी है। अमेरिका में तो काफी लंबे समय बाद यह नौबत आई है। वह इसका समाधान भी निकाल लेगा। दुनिया में सबसे अधिक छह मौसम वाला भारत कब संभलेगा? जब उसके बदले मिजाज का मुकाबला करने की हमारी तैयारी अभी तक नहीं है। वक्त का तकाजा है कि मौसम के बदलते मिजाज का मुकाबला करने के लिए हमें जुटना होगा।



 

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