प्यार के पवित्र दिन पर नफरत फैलाने का काम कर रही हैं सोशल मीडिया पर शेयर की जा रहीं ये पोस्ट

Samachar Jagat | Thursday, 14 Feb 2019 12:21:28 PM
These posts are being shared on social media, working to spread hatred on the holy day of love

इंटरनेट डेस्क। सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोग अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं, वे जैसे चाहें वैसे पोस्ट बनाकर फेसबुक, व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं और लोग बिना सच्चाई जाने इस पर ​प्रतिक्रिया देनी शुरू कर देते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वेलेंटाइन डे यानि 14 फरवरी को शहीद दिवस मानकर पोस्ट करना। आपको बता दें कि कुछ लोगों का मानना है कि 14 फरवरी यानि वेलेंटाइन डे पर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी और जो लोग वेलेंटाइन डे को प्रेम का इजहार करने का दिन मानते हैं उनका वे विरोध करते नजर आते हैं।

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अगर आप थोड़ा सा ध्यान देंगे तो आपको 14 फरवरी को शहीद दिवस मानने वालों की सच्चाई समझ में आ जाएगी कि कैसे वे गलत पोस्ट करके लोगों को गुमराह कर रहे हैं। सभी जानते हैं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च, 1931 को फांसी दी गई थी और इसी वजह से 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में जो लोग युवाओं को कोस रहे हैं और प्यार के प्रतीक इस दिवस का विरोध कर रहे हैं उन्हें पहले अपने अंदर झांककर देखने की जरूरत है क्योंकि घृणा प्यार से नहीं नफरत से होनी चाहिए। 

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14 फरवरी को फांसी की सजा माफी की अपील हुई थी खारिज

भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंका जहां कोई मौजूद नहीं था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। उन्होंने इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद! का नारा लगाया और अपने साथ लाए हुए पर्चे हवा में उछाल दिए। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया। 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई।

फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई।  इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए। 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई।

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