व्यस्त और फटाफट वाली जिंदगी में अब बकरीद भी हुई रेडीमेड

Samachar Jagat | Wednesday, 22 Aug 2018 11:21:11 AM
Bakrid's now readymade in a busy and fast-paced life

अमरोहा। त्याग और बलिदान का पर्व बकरीद आज पूरे देश में पारंपरिक विधि विधान से मनाई जा रही है। हालांकि त्योहार को मनाने के लिए तैयार एक वर्ग ऐसा भी है जिसने समय की कमी का हवाला देते हुए रेडीमेड कुर्बानी के प्रचलन को हवा दी है। मुस्लिम विद्बान तथा सोशल साईंटिस्ट डा.मोहम्मद मुस्तकीम ने बताया कि अमीर लोग खासतौर से सऊदी अरब में पहले से ही प्रावधान है कि बकरीद पर जो लोग कुर्बानी करना चाहते है वह कुर्बानी की कीमत अदा कर देते हैं और मीडिएटर यानि वकील इस बात के लिए होता जो इस बात की पुष्टि कर देता है कि सही में कुर्बानी हुई। अपनी हैसियत के मुताबिक कुर्बानी की रकम देकर कुर्बानी की सुन्नत हासिल कर सकते है। इसके लिए अब विभिन्न जगहों पर रेडीमेड यानि बजरिए वकील कुर्बानी का मदरसों में इंतजाम किया गया है।

मदरसा कासिम उल उलूम फरीदिया अमरोहा के मोहतमिम मौलाना दिलदार हुसैन ने पत्रकारों को बताया है कि जो लोग घर पर कुर्बानी करने में असमर्थ है अथवा कोई और वजह है, वे मदरसे में कुर्बानी कर सकते है। उनके यहां ढाई हजार रुपए से लेकर चार हजार रुपए तक के हिस्से मौजूद है। जिले में कई स्थानों पर रेडीमेड यानि बजरिए वकील कुर्बानी का बंदोबस्त है। जानवर को तलाशे बिना अपनी हैसियत के मुताबिक पैसे देकर कुर्बानी की रस्म अदा की जा सकती है। उन्होने बताया कि सभी जगह जानवरों के हिसाब से कुर्बानी के हिस्सों की कीमत अलग-अलग है। अमरोहा में ढाई हजार से चार हजार रुपए तक का हिस्सा है तो चुचैला कलां में दो हजार से तीन हजार तक के हिस्से है।

दो देशों की खूबसूरती में चार चांद लगाता है ये अनोखा झरना

मदरसा जामा मस्जिद अमरोहा, मदरसा दारुल उलूम चिल्ला, मदरसा कासिम उल उलूम फरीदिया, मदरसा तालिम उल कुरान, मदरसा हनीफ़िया शाही चबूतरा, मदरसा अरबिया इस्लामियां मंसूर उल उलूम, चुचैला कलां, मदरसा जामिया मिस्बाहुल उल उलूम, मदरसा नासिर उल उलूम चुचैला कलां में रेडिमेड कुर्बानी का बंदोबस्त है। मौलाना ने बताया कि जिन जगहों व गांवों में कुर्बानी यानि जानवर ज़िब्हा करने की इजाजत नही है या जो लोग बाहर या विदेश में रहते है, वहां के लोग बिना किसी झंझट के बजरिए वकील कुर्बानी कर सकते है। अफजल यही है कि जो शख्स कुर्बानी कर रहा वह खुद जानवर को ज़िब्हा करें और वहां मौजूद रहे। मौलाना वकील अहमद, नायब सदर जमीयत उलेमा हिद का सुझाव है कि इस तरह की कुर्बानी में कोई बुराई नहीं है। बेहतर यही है कि जो शख्स कुर्बानी कर रहा है वह मौजूद हो।

जो लोग विदेश या बाहर रहते है उनके लिए यह मुफीद है, वह भी कुर्बानी कर सकते है। मुफ़्ती तैयब अहमद कासमीमदरसा जामिया मिस्बाहुल उल उलूम बताते हैं कि खस्सी बकरा कुर्बानी के एतबार से सबसे बेहतर माना जाता है। चूंकि यह तंदरुस्त और खूबसूरत होता है। कुर्बानी के मायने अल्लाह की राह में सबसे अजीज चीज को कुर्बान करने के है, इसलिए लोग खस्सी बकरा की कुर्बानी ज्यादा पसंद करते है। मौलाना वकील अहमद कहते है कि अल्लाह के नबी भी खस्सी बकरे की भी कुर्बानी की है। गौरतलब है कि बकरीद जहां सैकड़ों लोगों के लिए रोजगार का जरिया बन जाता है वहीं भेड-बकरियों की पाबंदी से करोडों का कारोबार ठप्प हो गया है। बता दें कि हाल ही में केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय ने भेड-बकरियों के निर्यात पर भी रोक लगाई थी।-एजेंसी



 

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