City News : देने वाले किसी को गरीबी ना दे, मौत दे मगर बदनसीबी ना दे

Samachar Jagat | Friday, 10 Jun 2022 04:30:59 PM
City News :  Do not give poverty to anyone who gives, give death but do not give misfortune

जयपुर। दैनिक जीवन में अभागा, बदकिस्मत जैसे शब्द आमतौर पर उपयोग में लिए जाते रहे हैं, मगर यदि किसी की हालत इससे भी बदतर हो तो उसे क्या कहा जाए? जी हां ऐसा ही एक मामला यहां पुलिस मैमोरियल के निकट वाली फुटपाथ पर देखने को मिला है। बुधवार का दिन था। मोती डूंगरी वाले गण्ोश जी के मंदिर के प्रांगण में भक्तजनोें की खासी भीड़ जमा थी। अनेक परिवार विवाह महोत्सव का निमंत्रण देने को आए हुए थ्ो। गणपति भगवान से जुड़े गीत और ढोल की आवज इस कदर तेज थी कि कौन क्या कहता था, समझ के बाहर था।

भगवान के दर्शन के लिए ललायित लोगों से जरा अलग हट कर, नजरें उत्तर दिशा की ओर घुमाने पर एक विचित्र सख्स दिखाई दिया। उम्र अधिक नहीं थी, चालीस साल के आसपास का होगा। देखने में भिखारी तो नहीं लग रहा था, मगर हालत जरूर दयनीय थी। फटेहाल था, भिखारियों की लाइन से कोई दस फिट दूर। पुरानी फटी दरी रोड़ पर बिछा कर बैठा आते- जाते लोगोें के चेहरों को ताक रहा था। कई सवाल दिमाग में उठे, कौन है, भिखारी नहीं तो इनकी कतार के निकट क्यों बैठा था...।

आसमानी कलर का मैल में डूबा पूरी आस्तिन का कमीज और सफेद रंग की सूती धोती पहने हुआ था। अपने निकट ही पांवों के घुटनोे ं से छूती हुई स्टील की कटोरी में महाकाल का सिंदूर आते- जाते लोगों के ललाट पर लगा कर गणपति बप्पा मोरिया का नारा लगा दिया करता था। कोई यदि गणपति भगवान का प्रसाद देने का प्रयास करता था तो पूरी निष्ठा और श्रद्धा भाव से सिर पर लगा कर तेज स्वर में जय जय जय पुकारा करता था। इसके आगे कुछ नहीं। नगद पैसे देने की पेशकश यदि कोई करता था तो मना कर दिया करता था।
अभागे सख्स को देखकर अनेक सवाल दिमाग में घूमने लगे थ्ो। संपर्क करने को उसके निकट, जरा सट कर नंगी रोड़ पर ही बैठना पड़ा। दुखियारे व्यक्ति का नाम राजेश था। करौली के लैदोर खुर्द गांव का निवासी बताया। कुछ माह पहले तक वह खुली मजदूरी किया करता था। मगर तभी एक से बढ कर एक मुसीबतोंे का पहाड़ टूट पड़ा। क्या हुआ उसके साथ, इससे जुड़े किसी सवाल को एक बारगी तो उसने बात को टालने का प्रयास किया, मगर तभी उसकी गोद में बैठे दो साल के बच्चे की ओर नजर पड़ी तो अपनी पीड़ा का गुबार रोक नहीं सका।

हल्के भूरे रंग वाले बालों के साथ- साथ शरीर में काफी कमजोर, जरा भी श्ौतानी करने पर हांफने लगता था। गोल- गोल मुखड़े में गोल- गोल आंख्ों। अजीब सी हरकतें कर रहा था। क्या मजाल की एक मिनट के लिए भी चुप बैठा हो। इसी पर सवाल किए तो राजेश का चेहरा लटक गया। कहता था, जन्म से ही इसे विचित्र रोग है। जिसके चलते उसका सिर भारी होकर बेडौल हो गया था। आगे से संकरा और पीछे से चपटा। अजीब सी बेचैनी उसके चेहरे पर थी। पिता ने प्रयास किया,और कुछ नहीं तो दो घूंट पानी तो पीले। मगर व्यवहार अजीब था। मुंह में पानी भरकर उसी क्षण उल्टियां करना शुरू कर देता था।

शारीरिक के साथ- साथ उसे मानसिक परेशानी भी थी। सामान्य बच्चों से जरा हट कर हरकतें किया करता था। जब भी कोई ·ेह से पुचकारता। कई देर तक उसे घूरता रहता था। हाल यह हो चला था कि अपने पिता तक को भी नहीं पहचान पाता था।
बालक आयंस के उपचार के लिए उसे सबसे पहले करौली के सरकारी अस्पताल ले जाया गया था, मगर चिकित्सकों ने बीमारी ला ईलाज बता कर उसे जयपुर के लिए रेफर कर दिया। एमआरआई की जानी थी। चिकित्सकोे ं क ो शक था कि कहीं बच्चे के दिमाग में जरूरत से ज्यादा तो पानी जमा नहीं हो गया। ऐसा हुआ तो उसके ब्रेन में एक इंच का छेद करके ट्यूब डाली जानी थी। टñूब का दूसरा भाग पेट के भीतर रखे जान्ो का प्लान था। ताकि वेस्ट पानी बराबर निकलता रहे। दिमाग में पानी के जमाव के अलावा एक संभावना ब्रेन ट्यूमर की भी लगती थी। फिर कई सारे केस ब्रेन टीबी के भी आ रहे थ्ो, कहीं उसकी चपेट में वह तो नहीं आ गया था।

आयन्स की बीमारी की पुख्ता जानकारी के लिए उसके सिर की एमआरआई करवाई जानी थी। पास में पैसे थ्ो नहीं। क्या करता। किसके आगे हाथ फैलाता, जयपुर में उसका कोई परिचित भी तो नहीं था। कुछ लोगों की सलाह थी कि सवाई मानसिंह अस्पताल में सुबह और सायं के समय अनेक समाजसेवी आया करते है, उनसे संपर्क किया जाए। क्योंे कि यह उपचार केवल तीन हजार रूपए तक सीमित नहीं था। चिकित्सक खुद कहते थ्ो, कोई सीरियस बीमारी हो सकती है, इस पेसेंट को...। पूरा ईलाज कम से कम दो तीन लाख तक होजाएगा। बस यही चिंता उसे सताए जा रही थी। आंखों के चारों ओर काले रंग के सर्किल बन जाने पर उसके मन में भरा दुख साफ तौर पर झलक रहा था।

राजेश के घर मंें दूसरी परेशानी बिचली संतान, बिटिया सलोनी को लेकर थी, जिसके दोनों पांवोें में लकवा था। आने- जाने में ं असहाय थी। नित्यकर्म के लिए भी उसकी मदद करनी होती थी। बीमारी के चलते बच्ची के दोनोंं पांव अंदर की ओर घूम गए थे। कमजोरी के होते हुए, भोजन कोई दूसरा उसे खिलादे तो ठीक, वरना भूखी बैठी रोती रहती थी। राजेश के पिता भूरा सिंह की बीमारी तो और भी अधिक खतरनाक थी। गांव के निकट की पहाड़ी पर पत्थर काटने की मजदूरी किया करता था। इस पर पत्थर का बुरादा उसके फेफड़ों में जमा हो गया था। आरंभ में खांसी की शिकायत हुई थी, बाद में फेफड़े जवाब देने लगे थ्ो।

दो कदम भी चलने पर हांफने लग जाता था। खतरनाक बीमारी के उपचार के लिए खान मालिक और सरकार की ओर से उसे कोई मदद नहीं मिली। जिंदा लाश की तरह झोपें के बाहर, मूंज की टूटी चारपाई पर लेटा, अपने दुख भरे दिन काट रहा था। राजेश की घरवाली को हाथ- पांव क ी हडिडयां जाम होने की शिकायत थी। इसके आगे आंखों में मोतियां बिंद का ऑपरेशन ना होने पर वह अंधी हो चुकी थी। राजेश के छोटे भाई बिजली का करंट लग जाने पर उसका बदन बुरी कदर झुलस गया था। पिछले दो सालोें से जयपुर में इसका ईलाज चल रहा था। बीमारी पर एक ओर खतरनाक बीमारी ने राजेश को तबाह कर डाला था। कौन करेगा उसकी मदद.. लोग जरूर आए थ्ो उसका दर्द सुनने। पर इनमें एक भी लौट कर नहीं आया। दुख भरे कीचड़ में डूबे राजेश को तुरंत ही सहयोग की आवश ्यकता है। अन्यथा संभावना इस बात की दिखाई देने लगी है कि कहीं यह परिवार सामुहिक आत्महत्या तो नहीं कर लेंगे।
 



 

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