Jaipur : और वे दुखियारे... दुनिया छोड़ चले

Samachar Jagat | Thursday, 28 Jul 2022 11:06:04 AM
Jaipur : And those miserable... leave the world

जयपुर। बहू बेटों से सताए वृद्धजनों क े ज्यादती के दिनों मंें राहत के लिए जयपुर में अनेक वृद्धाश्रम चल रहे हैं। इसी का एक वाकिया, जिसने भी सुना या देखा, उसका मन फूट पड़ता है। फिर आंटी से जुड़ी यादें ही कुछ ऐसी थी कि जो भी उससे एक बार मिलता, बस उसी का हो जाता था। तमाम आश्रम वासियों के अलावा आश्रम में दान लेकर आने वाले समाज सेवियों केे मन की रानी बन गई थी। संस्था वासी बताते हैं कि मार्च 2012 से वह लगातार इस आश्रम में घुलमिल कर रहती आई थी। इस बार वह अके ली नहीं थी, अपने बीमार पति श्री दिगेन्द्र नाथ जी लहरी क ो भी अपने साथ वहां आई थी। कहते हैं कि लहरी जी को दमें की शिकायत थी।

दवा- पानी के पैसे पास में ना होने पर, उनकी बीमारी लगातार बढती ही गई। फिर एक झांेंका ऐसा आया कि वे यहीं पर चल बसे थ्ो। आश्रम में यह पहला जोड़ा था जो यहां रहते हुए ईश्वर के पास चले गए। इस तरह के कई पीड़ितों के दिल में ऐसा ही दर्द उमड़ रहा था। जिनमें विवेकानंद खरे निवासी मुम्बई किसी कारण के चलते जयपुर आए थ्ो। मगर किसी का सहारा नहीं मिलने पर मौत के हत्थ्ो चढ गए थ्ो। कहते है कि जयपुर रेलवे स्टेशन के निकट ही उनका शव फुटपाथ पर मिला था। किसी का सहारा ना होने पर पुलिस वाले उन्हें आश्रम के सहारे छोड़ गए। शव का अंतिम संस्कार तुरंत ही किया जाना जरूरी हो गया था, हल्की बदबू आने लगी थी। हाथ-पांव जकड़ कर सीध्ो हो गए थ्ो। देखा जाए तो खरे साहब यहां जयपुर अकेले ही आए थ्ो।

मगर इसी के साथ ढेर सारी यादें और किस्से इस कदर लोकप्रिय थ्ो कि हर कोई इन्हें सुनना चाहते रहते था । मुंबई के फुटपाथ की बातंें। गंंडा राज की ज्यादतियोंं के माामले कहने को पुलिस को बताए गए थ्ो, मगर मुकदमा एक बार भी दर्ज नहीं हो सका था। करते भी क्या। गुस्सा तो बहुत आता था। फिर नेताओें को भदè्दी भाषा कहने पर मन कुछ समय के लिए शांत हो जाता था, मगर जब भी अकेलापन उनके निकट होता था तो यही वाकिए मन को कुरेदने लगते थ्ो। खरे साहब की बेबसी यह थी कि शरीर उनका साथ नहीं देता था। सांस उठता तो पसीना- पसीना हो जाया करते थ्ो। हाथ-पांव ठंडे होने के साथ लंबे सांस लेने पर चेहरा नीला हो जाया करता था। घर पर इसका उपचार था नहीं। अस्पताल ले जाने पर तीन - चार दिन प्राय:कर भर्ती रहा करते थ्ो। बीमारी को छोड़ कर खरे साहब का व्यवहार कोमल ही रहा करता था।

हंसमुख चेहरा। लोगोंे को हंसाना उनका विषय रहा करता था, मगर अफ सोस इस बात को लेकर था, बेटोंे के पालन पोषण में सारी जिंदगी बिताने के बाद भी बच्च्ो उनसे ठीक से जुड़ नहीे पाए थ्ो। कहते हैं कि उन्हेंं गले में क ैंसर की गांठ बन गई थी। इसे लेक र वे डरे नहीं। मगर जब बात बेटोंे की आती थी तो उनकी आंख्ों सुर्ख हो जाया करती थी। गुस्से के मारे दांत पीसने लग जाते थ्ो। उनका इकलौता बेटा नालायक निकला। गंदी भाषा में गालियां देना। अनेक बार तो उनके साथ धक्का- मुक्की हो जाया करती थी। रोज- रोज केे झगड़े और सम्मान रहित व्यवहार से परेशान होद गए थ्ो। क्या करते, एक दिन जब उनके साथ हद्द ही पार हो गई तो अपने घर से बिना किसी को कुछ बताए घर से निकल गए। उनका निर्णय वाकई में बड़ा कठिन और कष्ठ भरा हो जाने के बाद भी अपना प्रण नहीं तोड़ सके। वनवास की यात्रा करते- करते बिना कोई टिकट के यात्रा करके देश के लगभग सभी बड़े शहरों की यात्रा कर चुके थ्ो। तीर्थ स्थल पर तो वे कई दिनों तक रम जाया करते थ्ो। मन को शांति मिला करती थी। साधु महात्माओं की टोली में रह कर उनके साथ संगत किया करते थ्ो।

यात्रा के इस दौर में उनकी मुलाकात उनके अनेक साथियों से हुई थी। गांव के किस्सों में थोड़ी रूचि रहा करती थी। मगर तभी उसूल आड़े आ जाया करते थ्ो। इन्हीं दिनोें वे किसी दुर्घटना के शिकार हो गए थ्ो। पांव की हXी टूट जाने पर गरीबी के चलते, बीमारी का उपचार समय पर नहीं हो सका था। होना क्या था। हXी ठीक से नहीं जुड़ सकी और वे हमेशा- हमेशा की तरह विकलांग हो गए थ्ो। दवा -पानी के अभाव में उनके पांव का घाव बदबू मारने लगा था। कीड़े से पड़ गए थ्ो। उनकी हालत इस कदर दयनीय हो गई थी कि उन्हेंं लोग पास में बिढाने से हिचकिचाने लगे थ्ो। जिंदगी के इसी दौर में बेटे का कष्ट पीछा नहीं छोड़ रहा था। जब भी मौका मिलता, एक ही बात अक्सर दोहराने से नहीं चूकते थ्ो। संघर्ष के इस दौर में, जब वे आश्रम में समय काट रहे थ्ो तो एक दिन पुलिस थाने से किसी का फोन आया। कहते थ्ो कि कोई वृद्ध जो अपना नाम विवेकानंद खरे बता रहा है। उसके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज हुआ है।

मामला फर्जीवाड़े का था। पिता के नकली साइन करवा कर उसका बेचान क रने का प्रयास कर रहे थ्ो। तभी उनकी पोल खुल गई। मगर पुत्र तो भागने में सफल हो गया, मगर बीमार और बूढे की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस वाले आश्रम पहुंच गए। काका की हालत दयनीय थी। उनकी दशा देख कर थानेदार जी ने बयान की औपचारिकता पूरी कर वहां से रवाना हो गए थ्ो। पुलिस के सूत्र कहते हैं कि खरे साहब की हालत बेहद शोचनीय है, ऐसे में उन पर फर्जी वाड़े का आरोप बिश्वास करने योग्य नहीं है। पुलिस की भलमानसी यह थी कि उन्हें जब पता लगा कि वृद्ध को गले का कैंसर भी है। इस पर उनके उपचार का प्रयास किया गया था, मगर रोग ही कुछ ऐसा था कि पुलिस और डॉक्टर अपने हाथ मलते रह गए। खरे साहब को सहारे की आवश्कता थी। मगर तमाम खूंटे चरमरा गए थ्ो। ले दे कर उनका वृद्धाआश्रम ही काम आया। दो साल तक वे कीमो थ्ोरेपी की पीड़ा सहते रहे। मगर तभी एक दिन भोर होने के बाद भी खरे साहब नींद से नहीं जागे तो साथी बुजुर्गो ने उन्हें संभाला।

मगर श्वांस जवाब दे गया था। औपचारिक तौर पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया था मगर चिकित्सक नो मौर कह कर अस्पताल के अपने चैम्बर में आराम करने के लिए सो गए। दिन भर की कई तरह की औपचारिकता पूरी करते करते दिन ढल सा गया था। सन डाउन होने के बाद शव का पोास्टमार्टम होता नहींे है। किसी तरह पंचनामा तैयार करवाया। बाद में उनकी देह को अंतिम संस्कार के लिए आदर्श नगर के श्मशान ले जाया गया। नियमों के मुताबिक उस दिन रात का भोजन नहीं बना था। फिर माहौल ही कुछ ऐसा हो गया था कि रोटी का ग्रास गल े से नीचे कैसे उतारते।
आश्रम के लिए यह कोई नई घटना नहीं थी। साल में पांच- सात आश्रम वासी मर जाया करते थ्ो। संस्था के कार्यालय में एक एलबम रखा गया था, जिसमें दिवंगत आश्रम वासी का फोटो सहित संक्षिप्त परिचय दिया करता था। ख्ोरे साहब भी इसी की शोभा बन कर रह गए । फिर शरीर नाशवान माना गया है। जो आया है तो उसके जाने का समय भी तय है। प्राणी होने पर जन्म के साथ- साथ मृत्यु भी शाश्वत सत्य है। लेकिन परिवार में किसी बुजुर्ग की मौत होती है तो कितनी बड़ी बात होती है। पूरा परिवार शोक मंें डूब जाता है।

मगर यादेंभी सदा नहीं रहती । समय के साथ- साथ सब भविष्य की तह में छिप जाते हैं। वृद्धाश्रम की बात की जाए तो शुरूआत के विचार, अक्सर कौंधा करते हैं। वहां जाने पर जीवन और अधिक कष्टमय तो नहीं हो जाएगा। फिर वहां की भूली- बिसरी यादें, घ्ोर तो नहीं लेगी। जैसे कि भार्गव साहब अपने निवास पर ही गरीब बच्चोंे का स्कूल चलाया करते थ्ो। साहब को क्षय रोग हो गया था। एक ही साल वह इस आश्रम मंे अछूत का ढांचा बन कर रह गए। फिर भला हो आश्रम वालों का, उनका उपचार भी करवाया। ऐसा लगा कि जल्द ही वे ठीक हो जाएगें । मगर ठीक नहीं हुई। ये जो ख्याल मन में आया उससे थोड़ी परेशानी जरूर हुई पर इसका जवाब भी मन ही ने दे दिया कि समय सब कुछ भुला देता है। परिवार में भी जाने वाले को अन चाहा भूल कर आगे बढना ही पड़ता है तो वैसा यहां भी होगा। और हां जीवन और मृत्यु की सच्चाई अगर देखनी हो तो वृद्धा आश्रम सबसे बड़ा उदाहरण है। हर सख्स की अपनी कहानी वहां मंडराती रहती है। गुलदस्ते की तरह, महकती है। खुशबू भरे हवा के झोंके आनंद लेने के लिए होते हैं। गम क्षणिक होता है। उनक स्मरण उचित नहीं है।
 



 

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