Success Story : आंखों के बगैर भी सपने देखे जाते हैं..! 'मेंस में पास हो गए तो तुम्हें प्री में भी सफल माना जाएगा'...कोर्ट की शर्त के बाद 25 दिन की तैयारी में RAS बने दृष्टिहीन कुलदीप जैनम..आरएएस दृष्टिहीन वर्ग में 14वीं रैंक लाने वाले युवा की कहानी...पढे़ं

Samachar Jagat | Wednesday, 28 Jul 2021 02:09:53 PM
Success Story  : Alwars 29 year old visually challenged man, Kuldeep Jainam also cracked the RAS exam 2018 14th rank but had to fight a legal battle too.

इंटरनेट डेस्क। राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) 2018 का परीक्षा परिणाम इस महीने ही जारी हुआ है। कई सफल अभ्यर्थियों की सफलता की कहानी लगातार युवाओं को प्रेरित कर रही है। इऩ्हीं में से एक हैं दृष्टिवाधित युवा कुलदीप जैनम। जिन्होंने आरएएस में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दृष्टिहीन वर्ग में 14वीं रैंक लाकर अपने सपनों को साकार किया है। एक समय तो कुलदीप देख न पाने के कारण पूरी तरह निराशा में चले गए थे। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कानून का सहारा लिया और आखिरकार उन सपनों को उन्होंने मूर्त रूप दिया जो कभी उन्होंने देखे थे, जिनके लिये उन्होंने संघर्ष किया था। कुलदीप जैनम ने आज लाखों दृष्टिहीन युवाओं को एक लक्ष्य दिया है कि मेहनत और जुनूं से पंखों के नही होने पर भी उड़ान भरी जा सकती है।  

राजस्थान के अलवर के रहने वाले 29 वर्षीय कुलदीप जैनम ने दरअसल 5 अगस्त 2018 को आरएएस प्री परीक्षा दी थी। इस दौरान देख न पाने के कारण उन्होंने परीक्षा के दौरान श्रुति लेखक की सहायता लेनी थी। आरएएस परीक्षा के साथ अन्य परीक्षाओं में भी नियमानुसार दृष्टिहीन अभ्यर्थी को अपना श्रुति लेखक चुनने का विकल्प मौजूद था। लेकिन इसके बावजूद राजस्थान लोक सेवा आयोग ने अपना श्रुति लेखक की उनकी मांग को खारिज कर दिया। 

जब कुलदीप जैनम आरएएस प्री देने पहुंचे तो उन्हें वहां जो श्रुति लेखक दिया गया, वह न तो सही प्रश्न पढ़ सका और न जवाबों को ओएमआर शीट में भरने में दक्ष था। लिहाजा परिणाम ये हुआ कि कुलदीप प्री परीक्षा में फेल हो गए। लेकिन इसके बावजूद कुलदीप निराश नहीं हुए बल्कि दुगुने जोश के साथ जुट गए कानूनी लड़ाई में। कुलदीप ने इसके बाद उदयपुर के दृष्टिबाधित मित्र अली असगर बोहरा की सलाह पर हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका लगा दी। सिंगल बेंच ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद कुलदीप और उनके मित्र ने डबल बैंच का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी जंग के बाद आखिरकार कुलदीप को कोर्ट ने मेन्स परीक्षा से 25 दिन पहले उन्हें मुख्य परीक्षा में बैठने की मंजूरी दे दी। 

मंजूरी तो मिल गई थी। लेकिन कोर्ट ने उनके सामने एक बड़ी शर्त रख दी थी। कोर्ट ने उनसे कहा कि यदि वह मेन्स में सफल हो गए तो उन्हें प्री में भी सफल माना जाएगा। आखिरकार उन्होंने बचे हुए 25 दिनों में जमकर मेहनत की। 25 दिनों की तैयारी में उन्होंने आरएएस की मुख्य परीक्षा पास कर ली थी। साक्षात्कार में कुलदीप ने अपने जोश, संघर्ष, मेहनत, काबिलियत के बल पर आखिरकार आखिरी जंग भी जीत ली। कुलदीप दृष्टिहीन वर्ग में 14वीं रैंक के साथ पास हुआ। कुलदीप की कहानी दिव्यांगों को तो प्रेरित करती ही है बल्कि सभी युवाओं को एक नये जोश के साथ प्रेरित भी करती है। 

 



 

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