Climate Change वायुमंडल का श्वेत उपनिवेश, इस नस्लवाद से निपटना होगा

Samachar Jagat | Friday, 15 Jul 2022 04:24:35 PM
Climate change The white colony of the atmosphere, this racism has to be dealt with

मेलबर्न : ''क्लाइमेट चेंज इज रेसिस्ट’’ अर्थात जलवायु परिवर्तन नस्लवादी है। यह ब्रिटिश पत्रकार जेरेमी विलियम्स की एक हालिया पुस्तक का शीर्षक है। हालांकि यह शीर्षक उत्तेजक लग सकता है, पर इसमें दो राय नहीं कि लंबे समय से यह माना जाता है कि अश्वेत लोग जलवायु परिवर्तन के तहत असमान नुकसान झेलते हैं - और आने वाले दशकों में इसके और खराब होने की संभावना है। हालाँकि, ऑस्ट्रेलिया सहित अधिकांश अमीर गोरे देश इस असमानता को ठीक से दूर करने के लिए बहुत कम प्रयास कर रहे हैं।

अधिकांश देश इस बात को मानने को तैयार नहीं कि वह गरीब देशों और समुदायों पर जलवायु का बोझ लाद रहे हैं। ऐसा करने में, वे लाखों लोगों को अकाल मृत्यु, अपंगता या अनावश्यक समस्याओं की सजा देते हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है, जहां जलवायु परिवर्तन कई मायनों में मूल निवासियों के खिलाफ ऐतिहासिक गलतियों का गवाह है। यह अन्याय - एक प्रकार का ''वायुमंडलीय उपनिवेशीकरण’’ - गहराई तक ढंसे हुए औपनिवेशिक नस्लवाद का एक रूप है जो यकीनन हमारे समय के सबसे अधिक दबाव वाले वैश्विक समानता मुद्दे का प्रतिनिधित्व करता है। इस सप्ताह पैसिफिक आइलैंड्स फोरम सहित आने वाली कई वैश्विक वार्ताएं वैश्विक एजेंडा पर जलवायु न्याय को ऊपर जगह देने का अवसर प्रदान करती हैं।

'समान भार नहीं' जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ग्रह पर सभी के बीच समान नहीं होते हैं, और यह समस्या केवल बदतर होती जाएगी। अश्वेत लोग और स्वदेशी लोग अक्सर गर्म होती दुनिया में सबसे भयानक परिणामों का सामना करते हैं। उदाहरण के लिए, शोध से पता चलता है कि 2 डिग्री सेल्सियस की ग्लोबल वाîमग से कृषि उत्पादन में कमी के कारण अफ्रीका की आधी से अधिक आबादी को अल्पपोषण का खतरा होगा। यह तो तब है जब अफ्रीका ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अपेक्षाकृत कम योगदान दिया है। ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय निकाय लोवित्जा इंस्टीट्यूट का कहना है कि जलवायु परिवर्तन: देश के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को बाधित करता है जो स्वास्थ्य और भलाई का आधार हैं। बढ़ती मांग और कम कार्यबल के साथ स्वास्थ्य सेवाएं चरम मौसम में काम करने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
ये सभी ताकतें आदिवासी और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर आबादी के भीतर पहले से ही अस्वीकार्य स्वास्थ्य के स्तर को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होंगी।

बान में विफलता

पिछले महीने, इस अन्याय की जिम्मेदारी लेने के लिए अमीर गोरे देशों की ओर से निरंतर विफलता जर्मनी के बॉन में संयुक्त राष्ट्र की जलवायु बैठकों में साफ नजर आई। वहां, सरकारें ''नुकसान और क्षति’’ के मुआवजे की दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रगति करने में विफल रहीं। ऑक्सफैम के अनुसार, हानि और क्षति सामूहिक रूप से संदर्भित करती है: जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले परिणाम और नुकसान को देखते हुए अनुकूलन के प्रयास या तो अधिकता में हैं या अनुपस्थित हैं। बॉन में, जी77 (134 विकासशील देशों का गठबंधन) और चीन इस साल नवंबर में मिस्र में सीओपी27 जलवायु सम्मेलन में आधिकारिक एजेंडे में तथाकथित ''नुकसान और क्षति सुविधा’’ के लिए वित्तपोषण चाहते है। इस सुविधा में जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने के लिए विकासशील देशों को धन मुहैया कराने के लिए एक औपचारिक निकाय शामिल होगा। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ ने इस कदम का विरोध किया, उन्हें डर था कि वे अरबों डॉलर के नुकसान के लिए उत्तरदायी होंगे।

''नुकसान और क्षति’’ के बारे में चिता लंबे समय से वैश्विक जलवायु वार्ता का हिस्सा है।
2013 में, सीओपी19 में वारसॉ इंटरनेशनल मैकेनिज्म फॉर लॉस एंड डैमेज की स्थापना की गई थी। जलवायु कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि यह जलवायु न्याय के एक नए युग की शुरुआत करेगा। लेकिन लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी वित्त पोषण के लिए अभी भी कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है। और अमीर गोरे देश ऐतिहासिक और समकालीन उत्सर्जन दोनों के लिए मुआवजे या क्षतिपूर्ति की किसी भी बात से खुद को दूर ही रखते हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत फिलिप एलस्टन ने हाल ही में कहा था कि दुनिया ''जलवायु रंगभेद’’ के एक नए युग का जोखिम उठा रही है। इस परिदृश्य में, करोड़ों लोग गरीब, विस्थापित और भूखे होंगे, जबकि अमीर इस मुश्किल से बाहर निकलने का रास्ता खरीद लेंगे। नवंबर में सीओपी27 में जाने पर, अमेरिका, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया के वार्ताकारों को नुकसान और क्षति वित्त को प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसा करने में विफल रहने से केवल जलवायु अन्याय और मजबूत होगा। 



 

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