कभी रंजन गोगई ने लोकतंत्र पर उठाया था सवाल, अब खुद सवालों में

Samachar Jagat | Wednesday, 18 Mar 2020 10:32:03 PM
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दो साल पहले 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी तब पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यशैली और आचरण पर सवाल उठाते हुए तब सुप्रीम कोर्ट के जज रंजन गोगोई ने कहा था कि लोकतंत्र दांव पर है. इसके बाद रंजन गोगोई एक तरह से नायक बनकर सामने आए क्योंकि माना जा रहा था कि इसके बाद वे देश का प्रधान न्यायाधीश बनने का मौका खो सकते हैं. इन चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस एक तरह से मोदी सरकार को भी लपेट रही थी और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचकों के लिए एक तरह से हथियार साबित हुई थी.

रंजन गोगोई ने यह भी कहा था कि यह एक मज़बूत धारणा है कि अवकाशग्रहण के बाद जजों की कहीं अन्यत्र नियुक्ति न्यायपालिका के स्वतंत्रता पर एक धब्बा है. लेकिन राज्यसभा के उनके मनोयन के बाद सवाल शिद्दत से उन पर उठ रहे हैं. उन्हें उन धब्बों की याद दिलाई जा रही है जिसका जिक्र उन्होंने किया था. वे चार महीने पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए और अब उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना डाला गया. जाहिर है कि अयोध्या विवाद, राफाल विमान सौदा, अनुच्छेद 370 मामला, तीन तलाक और सीबीआई में वर्चस्व की लड़ाई में दिए गए फैसले को अब इस मनोयन से जोड़ कर देखा जा रहा है.

कहा जा रहा है कि रंजन गोगोई ने सरकार को फायदा पहुंचाने के लिए फैसले किए और अब न फैसलों पर फिर से पुनर्विचार करने की मांग भी की जा रही है. उनके सहयोगी रहे जजों ने भी इस मनोयन पर सवाल उठा कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर डाला है. रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किए जाने को अयोध्या और राफेल मामलों पर सुनाए गए फैसलों से जोड़ कर देखा जा रहा है.

जस्ट‍िस गोगोई के राज्यसभा में नामित होने के लेकर उनके पूर्व सहयोगियों ने भी सवाल उठाए हैं. जस्टिस रंजन के साथ प्रेस कांफ्रेंस करने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने उनको राज्यसभा भेजे जाने पर चिंता जहिर करते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आम आदमी के भरोसे को खत्म किया है. जस्टिस गोगोई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से समझौता किया है. हमने जस्टिस गोगोई के साथ बताया था कि न्यायपालिका ख़तरे में है इसलिए मैंने रिटायरमेंट के बाद कोई पद न लेने का फ़ैसला किया.

हमने राष्ट्र के लिए अपने ऋण का निर्वहन किया है. 12 जनवरी 2018 को हम तीनों के साथ न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने बयान दिया था. मुझे आश्चर्य है कि कैसे न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने एक बार स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए दृढ़ विश्वास के ऐसे साहस का प्रदर्शन किया था न्यायपालिका ने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नेक सिद्धांतों से समझौता किया है. हमारा महान राष्ट्र बुनियादी संरचनाओं और संवैधानिक मूल्यों पर दृढ़ता से आधारित है, मुख्य रूप से स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए, धन्यवाद.

जिस पल लोगों का यह विश्वास हिल गया है, उस पल यह धारणा है कि न्यायाधीशों के बीच एक वर्ग या तो पक्षपाती है या आगे देख रहा है. मैं न्यायमूर्ति चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर के साथ एक अभूतपूर्व कदम के साथ सार्वजनिक रूप से देश को यह बताने के लिए सामने आए थे कि इस आधार पर खतरा है और अब मुझे लगता है कि खतरा बड़े स्तर पर है. यही कारण था कि मैंने रिटायरमेंट के बाद कोई पद नहीं लेने का फैसला किया. मेरा मानना है कि भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश का राज्यसभा के सदस्य के रूप में नामांकन की स्वीकृति ने निश्चित रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आम आदमी के विश्वास को हिला दिया है, जो भारत के संविधान की बुनियादी संरचनाओं में से एक भी है.

इससे पहले उनके पूर्व सहयोगी जस्टिस (रिटायर्ड) मदन बी लोकुर ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि कुछ समय से अटकलें लगाई जा रही थीं कि जस्टिस गोगोई को क्या सम्मान मिलेगा. तो, ऐसे में उनका नामांकन हैरत में डालने वाला नहीं है लेकिन जो आश्चर्य की बात है, वह यह है कि यह फैसला इतनी जल्दी आ गया.यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अखंडता को फिर से परिभाषित करता है. क्या आखिरी किला भी ढह गया है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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