झारखंड में कई उम्मीदवार तो हारने के लिए लड़ रहे हैं चुनाव

Samachar Jagat | Monday, 09 Dec 2019 05:12:16 PM
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अमूमन चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार जीतने के लिए चुनाव लड़ते हैं और जीत के लिए जी-जान लगा देते हैं. लेकिन झारखंड विधानसभा चुनाव में कई ऐसे उम्मीदवार हैं जो जीतने के लिए नहीं हारने के लिए लड़ रहे हैं चुनाव. कई अजब-गजब उम्मीदवार हैं. कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में कई दिलचस्प रंग भी दिखाई दे रहा है. दरअसल इन लोगों का शौक और जनून है चुनाव लड़ना. जीत-हार इनके लिए मायने नहीं रखती. इनका जुनून सिर्फ चुनाव लड़ना है. पहले इस जुनून के लिए बुधन राम देश भर में जाने जाते थे. उन्होंने धनबाद सहित देश के कई हिस्सों में कई मशहूर हस्तियों के खिलाफ चुनाव लड़ा. यहां तक कि सर्वाधिक चुनाव लड़ने के लिए लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी बुधन का नाम दर्ज है. कुछ तो बिना मुद्दे के चुनाव में उतर जाते हैं.

बुधन ने 79 चुनाव लड़ा लेकिन किसी चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली. कोई चुनाव नहीं जीते. आखिरी सालों में डिप्टी मेयर चुनाव के लिए भी उन्होंने नामांकन कराया लेकिन प्रक्रिया पूरी नहीं होने की वजह से नामांकन रद्द हो गया. आज धनबाद में लगभग आधा दर्जन उम्मीदवार ऐसे हैं जो बुधन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम, पंचायत कोई भी चुनाव हो वे चुनाव मैदान में उतर जाते हैं. लगातार हार से इनके जोश और जुनून में कोई कमी नहीं आती. लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था है और इसी आस्था की वजह से वे जोश से भरे रहते हैं और पूरी शिद्दत से चुनाव में हिस्सा लेते हैं. इन उम्मीदवारों पर नजर डालते हैं.

हीरालाल संखवार : सत्त साल के हो चले हीरालाल संखवार धनबाद में चुनाव महापर्व का स्थायी चेहरा हैं. चुनाव कोई भी हो संखवार नामांकन जरूर करते हैं. वे उच्च शिक्षित हैं. विज्ञान से स्नातकोत्तर किया है. इस बार वे फाब्ला से सिंदरी विधानसभा से किस्मत आजमा रहे हैं. वे झारखंड पार्टी, झारखंड पीपुल्स पार्टी व अन्य दलों से भी चुनाव लड़ते रहे हैं.

डॉ. कृष्णचंद्र सिंहराज : धनबाद विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार हैं. गांधी टोपी पहने केसी सिंह सिंहराज कहीं भी आपको अपने जुगाड़ गाड़ी पर सवार हो हाथ जोड़ते मिल जाएंगे. वे लोकसभा चुनाव में भी उम्मीदवार थे. उन्होंने नगर निगम का चुनाव भी लड़ा है. हालांकि जीत किसी में नहीं मिली. पिछले दो दशक से वे हर चुनाव में खड़े होते हैं. चुनाव चिह्न भले बदलता हो पर प्रचार वाहन जुगाड़ गाड़ी ही होता है. 

प्रेमप्रकाश पासवान : प्रेमप्रकाश पासवान ने पीपीपी (परोपकार परम पुण्य) समिति के नाम पर सामाजिक कार्य शुरू किया. चुनाव लड़ने की इच्छा हुई तो लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम सभी चुनाव लड़ा लेकिन सफलता कहीं नहीं मिली. बावजूद इसके हिम्मत नहीं हारी. हर बार जमानत जब्त कराने के बाद भी इस बार भी नामांकन दाखिल किया. हालांकि उनका नामांकन रद्द हो गया. इसके बाद उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली.

मेराज खान : समाजवादी पार्टी के नेता मेराज खान भी नियमित रूप से लोकतंत्र के चुनावी महापर्व में हिस्सेदारी निभाते रहे हैं. पिछले कई बार से वे भी लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम के चुनावों में नियमित रूप से नामांकन पर्चा दाखिल करते रहे हैं. हार के बावजूद हर बार उन्हें टिकट भी मिलता है. पिछले लोकसभा चुनाव में भी वे प्रत्याशी थे. विधानसभा चुनावों में वे झरिया सीट के लिए नामांकन करते रहे थे लेकिन इस बार पार्टी ने उन्हें धनबाद से टिकट दिया है. शैलेंद्रनाथ द्विवेदी : सिंदरी के रहनेवाले शैलेंद्रनाथ द्विवेदी चुनाव प्रक्रिया के नियमित चेहरे हैं. द्विवेदी भी लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम चुनावों में लगातार नामांकन पर्चा दाखिल करते रहे हैं.

उमेश पासवान : उमेश पासवान लोकसभा चुनाव 2019 में निर्दलीय प्रत्याशी बने. सड़क किनारे चौकी पर नारियल की दुकान चलाने वाले उमेश ने चुनाव चिह्न भी नारियल ही चुना. तकरीबन छह हजार वोट मिले. अनुसूचित जाति के उमेश पर चुनाव लड़ने का ऐसा जुनून है कि कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं होने की वजह से जमानत राशि में मिलनेवाली सब्सिडी नहीं मिली तो 25000 रुपए की पूरी राशि जमाकर चुनाव लड़ा और जमानत गंवाई. इस चुनाव में वे फिर मैदान में हैं और पुराना चुनाव चिह्न ही मांगा है. कहते हैं विधानसभा छोटा सीट होता है. यहां सफलता जरूर मिलेगी.

धनबाद के बुधन राम का उद्देश्य ही चुनाव में प्रत्याशी बनना था. 1984 में वे पहली बार धनबाद लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी बने. इसके बाद चुनाव लड़ने का ऐसा जुनून छाया कि सरपंच, मुखिया, विधायक, सांसद के लिए कुल 79 बार नामांकन पत्र दाखिल किया और चुनाव लड़ा. वे राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चित हुए जब 1989 के चुनाव में अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ नामांकन पर्चा दाखिल कर दिया. बुधन ने एक बार राष्ट्रपति पद के लिए भी नामांकन किया लेकिन कई कागजात जमा नहीं कर पाने की वजह से नामांकन रद हो गया. लेकिन 2009 में वे लकवाग्रस्त हो गए और 2010 में उनका निधन हो गया. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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