गांधी बनाम गोडसे की लड़ाई में कौन किस के साथ

Samachar Jagat | Thursday, 20 Feb 2020 06:58:21 AM
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राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर अटकलों को बाजार गर्म है. बिहार की सियासत में वे क्या कर पाएंगे, कहा नहीं जा सकता लेकिन बिहार की सियासत में उन्होंने हलचल तो मचा ही दी है. बिहार की मीडिया ने भी उन्हें खासा तवज्जो दिया है, यह हैरत में डालने वाली बात है. मीडिया प्रबंधन का ही इसे कमाल माना जा रहा है क्योंकि सियासी तौर पर प्रशांत किशोर का कद इतना बड़ा नहीं है कि उसे इस तरह का स्पेस मिले, जो पटना के अखबारों में मिला है. इसे मीडिया प्रबंधन का ही कमाल माना जा रहा है. यह सही है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से खटपट के बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

जदयू में वे किसके कहने से आए, यह तो नीतीश कुमार ही बेहतर बता सकते हैं या फिर प्रशांत किशोर. इस कहानी का एक तीसरा कोण भी है और वह है गृह मंत्री अमित शाह. नीतीश कुमार ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अमित शाह के कहने पर ही प्रशांत किशोर को जदयू में लिया गया. प्रशांत किशोर इसका खंडन कर चुके हैं और अमित शाह ने कुछ भी नहीं कहा है. वैसे अमित शाह कनेक्शन की बात आती है तो प्रशांत किशोर को लेकर कई तरह के सवाल भी खड़े होते हैं. कई अगर-मगर, लेकिन फिलहाल जवाब नहीं दिख रहा है.

प्रशांत किशोर जदयू से निकाले जाने के मंगलवार को बाद पहली बार पटना पहुंचे. प्रेस कांफ्रेंस की और नीतीश कुमार पर जमकर बरसे. उनके विचारधारा पर भी सवाल उठाया और कामकाज के तरीके पर भी. कुछ वाजिब सवाल भी उठाए और पूछा कि गांधी के रास्ते पर चलने की बात करने वाले गोडसे की उंगली भी पकड़े हुए हैं. वे गांधी के साथ चलते हैं तो गोडसे का हाथ फिर क्यों थाम रखा है. उनके पंद्रह साल के सुशासन पर भी सवाल उठाया और ताकीद भी की कि लालू यादव के पंद्रह साल की तुलना अब नहीं की जा सकती. कुछ गंभीर आरोप भी लगाए. भाजपा पर भी हमला किया और नीतीश कुमार पर भी.

हालांकि वैचारिक तौर पर जिन मुद्दों को प्रशांत किशोर ने उठाया, उसे लेकर उन पर भी सवाल उठने लाजमी हैं. आखिर 2014 में वे नरेंद्र मोदी को ही तो प्रधानमंत्री बनाने में लगे थे और तब क्या वे नरेंद्र मोदी की विचारधारा को नहीं जानते थे. हालांकि इन सवालों से प्रशांत किशोर बचते दिखे. लेकिन उनके इरादे साफ हैं. वे बिहार में तीसरे विकल्प की तैयारी में जुटे हैं. कितने कामयाब होते हैं, यह बाद की बात है. लेकिन नीतीश और भाजपा पर हल्ला बोल से बिहार में सियासी पारा चढ़ गया है. जदयू और भाजपा उनके हमले से तिलमिलाई हुई है. जदयू और भाजपा ने उन पर चौतरफा हमला करते हुए उन पर तीखा प्रहार किया लेकिन विपक्ष नेउनकी पीठ थपथपाई.

प्रशांत किशोर ने नीतीश पर निशाना साधते हुए कहा कि एक साथ गांधी और गोडसे की विचारधारा नहीं चल सकती. प्रशांत ने कहा कि नीतीश कुमार पंद्रह साल की सत्ता का दावा करते हैं, लेकिन क्या बिहार में तरक्की हुई, विशेष दर्जा मिला. उन्होंने बिहार के विकास के दावे पर सवाल खड़ा किया और नीतीश कुमार से पूछा कि विकास के बीस बड़े मानकों में आज भी बिहार की स्थिति 2005 जैसी ही है. तो आपको जनता को बताना चाहिए कि क्या और किस तरह का विकास किया. प्रशांत किशोर के नीतीश कुमार पर किए गए हमले के बाद जदयू-भाजपा ने पीके के इन बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. 

भाजपा के वरिष्ठ नेता व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने प्रशांत किशोर को पाखंडी बताया और कहा कि जब वे भाजपा और नीतीश के साथ थे, तब गोडसे और गांधी वाले सवाल कहां थे. प्रशांत किशोर के आरोपों का पर जदयू सांसद आरसीपी सिंह ने कहा कि किसी की इतनी हैसियत नहीं कि वे नीतीश कुमार को सर्टिफ़िकेट दे सके. नीतीश कुमार की सियासत को बिहार की जनता जानती है, पूरा देश जानता है. वे कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं करते हैं. सांसद ने कहा कि 2005 के बाद से बिहार में कितना विकास हुआ है यह देश ने देखा है. उन्होंने कहा कि बिहार किस हाल में था और आज जहां है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है. कोई कुछ करे यहां फर्क नहीं पड़ता. जदयू का कहना था कि प्रशांत किशोर अपने कारोबारी फायदे के लिहाज से वक्तव्य देते रहते हैं. ऐसे लोगों को आम लोगों से कोई मतलब नहीं रहता है.

लोकसभा में जदयू संसदीय दल के नेता राजीव रंजन सिंह ऊर्फ ललन सिंह ने कहा कि प्रशांत किशोर ने 2005 के पहले के बिहार को देखा नहीं है. देखा होता तो फर्क साफ नजर आता. उन्होंने कहा कि इतने बड़े रणनीतिकार हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में उन्होंने कांग्रेस को 27 से नौ विधायक पर पहुंचा दिया. वह भी तब जबकि परम्परागत विरोधी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक मंच पर आ गई थी. उत्तर प्रदेश के सपा और कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता आज भी पीके की कथित रणनीति को याद कर सिहर उठते हैं. सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महानता है कि वे हर किसी को सम्मान देते हैं. पीके को जदयू ने सम्मान दिया. लेकिन वे इसे संभाल नहीं सके. जदयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने प्रशांत किशोर पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद स्वीकार नहीं करना चाहिए था. यह राजनीतिक अनैतिकता है. त्यागी ने कहा कि मैं चाहता हूं साल 2020 के चुनाव में पराजित होने वाली पार्टी में उनका भी नाम हो. अब तक एक घंटे भी उन्होंने राजनीति के लिए नहीं दिया था. 

लेकिन विपक्ष प्रशांत किशोर के साथ खड़ा नजर आया. रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि प्रशांत किशोर ने समस्त बिहार वासियों खासकर युवाओं की भवनाओं को व्यक्त किया है. बिहार अब पीछे नहीं, भविष्य की ओर प्रस्थान करने का आकांक्षी है. जाहिर है नीतीश कुमार ने पंद्रह सालों में बिहार को पूर्ण रूप से निराश कर दिया है, इसलिए प्रशांत किशोर की रणनीति बिहार में बदलाव का वाहक बनेगा. कांग्रेस ने कहा कि वे एक तरफ़ नीतीश कुमार को पितातुल्य बता रहे हैं और जिन्हें वो पिता कह रहे हैं उन्होंने तो अपने बॉस के कहने पर उन्हें ही पार्टी से निकाल दिया. अब जब वे जदयू से बाहर हैं तो उनपर निशाना साध रहे हैं. इसलिए अब उन्हें भाजपा-जदयू को हराने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए.

राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि प्रशांत किशोर राजद के लिए कोई मसला नहीं हैं, क्योंकि पीके एक इवेंट मैनेजर हैं. आज वे गांधी और गोडसे की बात कर रहे हैं तो कल तक वे उन्हीं दोनों के साथ काम कर रहे थे. तिवारी ने कहा कि यह बात तो है कि प्रशांत किशोर ने जदयू को आईना दिखाया. हम सेक्युलर के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने प्रशांत किशोर को एक सजग नागरिक बताया. उन्होंने कहा अगर प्रशांत महागठबंधन में शामिल होते हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे. उन्होंने कहा आज देश में दो राजनीतिक धारा हैं एक गांधीवाद की दूसरी गोडसेवाद की. प्रशांत किशोर गांधीवाद के पक्ष में खड़े हैं ऐसी स्थिति में सबकी जवाबदेही बनती है कि सब मिलकर मदद करें और उनके बिहार के विकास के दिए जा रहे उनके सुझाव पर काम करें. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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