सीमा कुशवाहा के जनून से ही निर्भया को मिला इंसाफ

Samachar Jagat | Friday, 03 Apr 2020 08:54:16 AM
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निर्भया बलात्कार व हत्या के चारों आरोपियों को लंबी अदालती लड़ाई के बाद आखिकार फांसी दे ही दी गई. कोरोना वायरस के खतरों से देश लड़ रहा था उसी दहशत के माहौल में चारों आरोपियों को दिल्ली के तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई. सात साल तक लंबी लड़ाई में जिसने पूरी ताकत के साथ लड़ाई लड़ी वह थीं सीमा कुशवाहा, जिन्होंने निर्भया को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ी. सीमा कुशवाहा इस लड़ाई में सड़को पर भी उतरीं थी और अदालत में भी पूरी ताकत के साथ आरोपियों को सजा दिलाने की लड़ाई लड़ी. वे लगातार निर्भया के परिवार के साथ खड़ी रहीं और बचाव पक्ष के तमाम तिकड़म के बावजूद सीमा कुशवाहा ने लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की. यह उनका पहला ही केस भी बताया जा रहा है.

सात साल की कानूनी लड़ाई और भावनात्‍मक संघर्ष के बाद निर्भया से दरिंदगी करने वाले चारों दोषियों को 20 मार्च की सुबह फांसी पर लटका दिया गया और इसी के साथ निर्भया के परिवार को सुकून मिला. इस इंसाफ के बाद से देश भर में खुशी का माहौल है. बेटी के लिए न्‍याय की इस जंग में मां-बाप के साथ एक और बेटी थी जो पूरे ताकत के साथ अपने मिशन में जुटी रही. आज उन्हें भी देश दाद दे रहा है. सीमा समृद्धि पेशे से वकील हैं और यूपी के इटावा की रहने वाली हैं. उन्‍होंने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई पूरी की. दिसंबर 2012 में जब निर्भया के साथ दरिंदगी हुई थी तब वे प्रशिक्षण हासिल कर रहीं थीं. इस घटना के बारे में जब उन्‍हें पता लगा तो उन्‍होंने यह तय किया कि वे यह केस लड़ेंगी और इसके लिए कोई फीस नहीं लेंगी.

उनके वकालत के करियर का यह पहला ही केस था. इसमें उन्‍होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. इन्‍होंने निर्भया के अभिभावकों की तरफ से कोर्ट में सिलसिलेवार दलीलें रखीं. कोर्ट में वे हमेशा निर्भया के मां-बाप के साथ खड़ी रहीं और उनके सुख व दुख में भागीदारी रहीं. मायूसी के लंबे दौर के बाद जब खुशी का मौका आया तो निर्भया की मां और पिता ने उसके साथ तस्‍वीरें खिचंवाईं. सीमा ने 2014 में ज्योति लीगल ट्रस्‍ट ज्‍वाइन किया था जो कि दुष्‍कर्म पीडि़ताओं के लिए निशुल्‍क कोर्ट केस लड़ने का काम करता है. जहां तक सीमा के निजी करियर की बात है, वह वकालत को प्राथमिकता नहीं देती थीं. वे आईएएस बनना चाहतीं थीं. इसके लिए उन्‍होंने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी भी की थी. लेकिन हालात ने ऐसा रुख इख्तयार किया कि उन्‍होंने वकालत के रूप में करियर की शुरुआत की.

उनके परिवार में कुल सात भाई व बहन हैं. सीमा सबसे छोटी हैं. सीमा ने बचपन से ही अभावों और संघर्ष की भट्टी में तपकर निखरना सीखा. पढ़ाई को लेकर सीमा के मन में गहरी ललक थी. मुश्किल हालात के बीच उन्‍होंने पढ़ाई पूरी की. उनकी शुरुआती शिक्षा ग्रामीण क्षेत्र में हुई. लखना कस्‍बे के कलावती रामप्‍यारी स्‍कूल से निकलने के बाद उन्‍होंने इंटर की पढ़ाई की. अजितमल पीजी कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद सीमा ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद कुछ समय के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी प्रयास किया. आर्थिक परेशानी की वजह से उन्‍होंने प्रौढ़ शिक्षा विभाग में संविदा शिक्षक की नौकरी भी की. फिर 2012 में सीमा ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया. लॉ के अलावा उन्‍होंने मॉस कम्‍युनिकेशन की भी पढ़ाई की.

विरोध प्रदर्शनों के दौरान ही सीमा के मन में यह विचार आया कि वे स्‍वयं एक वकील है तो क्‍यों ना खुद ही इस केस को लड़ा जाए. सीमा इस मामले को फास्‍ट ट्रैक कोर्ट में लिस्टिंग के लिए प्रयास नहीं करतीं तो इस केस की सुनवाई में तेजी आना मुश्‍किल था. वर्तमान में सीमा कुशवाह सुप्रीम कोर्ट प्रैक्‍टीशनर हैं. निर्भया केस के संबंध में वे बताती हैं कि इस केस की तैयारी करना, इसे लड़ना शुरू से ही बड़ी चुनौती थी. वे सात साल से निर्भया के माता-पिता के साथ लगातार संपर्क में थीं, इस वजह से उनका दोनों से एक प्रकार से भावनात्‍मक नाता भी जुड़ गया.

निर्भया की मां आशा देवी और पिता बद्रीनाथ सिंह भी सीमा की लगन को मानते हैं. फांसी के बाद दोनों से सबसे पहले सीमा का शुक्रिया अदा किया. उनका कहना है कि सीमा के अनथक प्रयासों के बिना इस इंसाफ की लड़ाई को जीत पाना नामुमकिन था. निर्भया मामले में देश भर में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ सी आ गई थी. राजधानी दिल्‍ली में सर्वाधिक प्रदर्शन हुए. रैलियां निकाली गईं. इन सबमें सीमा कुशवाह प्रमुखता से आगे रहीं. उन्‍होंने राष्‍ट्रपति भवन, इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया था. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विशलेषण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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