केरल के राज्यपाल ने गांधी का नाम लिया तो भड़के इतिहासकार इरफान हबीब

Samachar Jagat | Thursday, 02 Jan 2020 04:58:27 PM
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इतिहासकार इरफान हबीब अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. वे विचारों से वामपंथी है इसलिए वे दक्षिणपंथियों के निशाने पर हमेशा रहे. इरफान हबीब अभी सुर्खियों में हैं. केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से इरफान हबीब मंच पर ही भिड़ गए. मामला नागरिकता कानून को लेकर ही बवाल हुआ तो इरफान हबीब ने आरिफ मोहम्मद खान को भाषण देने से रोकने की कोशिश की ऐसा कहा जा रहा है. इसके बाद विवाद पनपा और अब तक यह विवाद खत्म नहीं हुआ है. राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान भारतीय इतिहास कांग्रेस के में हिस्सा लेने शनिवार को केरल के कोन्नूर श्वविद्यालय पहुंचे थे. राजयपाल का कहना है कि उनके भाषण के दौरान इरफ़ान हबीब ने उन्हें शारीरिक तौर पर रोकने की कोशिश की और मुझे धक्का दिया. उन्होंने एक समाचार एजंसी से बातचीत करते हुए कहा कि मैंने जैसे ही अपने भाषण में गांधी जी का नाम लिया इरफ़ान हबीब उठ गए और मेरी तरफ़ बढ़ने की कोशिश की.

मेरे एडीसी ने उन्हें रोका. बायें तरफ़ कुलपति और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोका और दायें तरफ़ मेरे एडीसी ने. फिर वे सोफ़े के पीछे से आए और मेरी तरफ़ बढ़े. वे वहीं खड़े रहे जिसके बाद लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, नारे लगाने लगे. वैसे राज्यपाल के कार्यालय ने इसे लेकर कई ट्वीट किए. ट्वीट में लिखा गया कि भारतीय इतिहास कांग्रेस की उद्घाटन सभा में कोई विवाद नहीं हुआ. कोन्नूर विश्वविद्यालय में आयोजित इसके अस्सीवें संस्करण में इरफ़ान हबीब ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर कुछ सवाल किए. जब राज्यपाल ने इसका जवाब दिया तो इरफ़ान हबीब सीट से उठे और उन्हें रोकने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि राज्यपाल को मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद का नाम लेने का कोई हक़ नहीं है, उन्हें गोडसे का नाम लेना चाहिए. 

लेकिन इस पूरे विवाद पर इरफ़ान हबीब ने कहा कि राजयपाल को मैं कैसे रोक सकता हूं. वे सुरक्षाकर्मियों से घिरे थे और मैं 88 साल का हूं तो मैं उन्हें फिजिकली भाषण देने से कैसे रोक सकता हूं. इरफ़ान हबीब यह जरूर कहते हैं कि उन्होंने राज्यपाल को भाषण के बीच टोका ज़रूर लेकिन जब उन्होंने अबुल कलाम आज़ाद को अब्दुल कलाम आज़ाद कहके उनके हवाले से कहा कि उन्होंने मुसलमानों के बारे में कहा था कि हिंदुस्तान के मुसलमान गंदे तालाब में पानी की तरह हैं. यह एक बहुत ही उत्तेजित बयान था. मैंने कुलपति से कहा कि इनसे कहें कि वे अपना भाषण ख़त्म करें. इरफ़ान हबीब ने कहा कि कुलपति से कहने के बाद मैं राज्यपाल की तरफ़ पलटा. वे बातें करते जा रहे थे बदतमीज़ी की. जब उन्होंने मौलाना आज़ाद का हवाला दिया तो मैंने उनसे ये ज़रूर कहा कि आप को मौलाना आज़ाद और गांधी का नाम लेने की ज़रुरत नहीं है आप गोडसे का हवाला दें. ऐसा मैंने ज़रूर कहा.

इरफ़ान हबीब वामपंथी इतिहासकार के तौर पर जाना जाता है, जबकि आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को दक्षिणपंथी सोच के नेता समझे जाते हैं. लेकिन दोनों की तारें एक जगह मिलती हैं और वह है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिससे दोनों का संबंध रहा है. हबीब कहते हैं कि राज्यपाल का भाषण नियमों के ख़िलाफ़ सेशन के बीच में घुसाया गया. उनका कहना है कि नियमों के अनुसार उन्हें केवल दस मिनट बोलना था, न कि आधा घंटे से ज्यादा. इरफ़ान हबीब कहते हैं कि हमारी परंपरा यह है कि अधिवेशन की शुरुआत कार्यवाहक अध्यक्ष से होती है जो मैं था. वे एक छोटा सा भाषण देते हे जिसके बाद आने वाले अध्यक्ष से कहता है कि अब आप भाषण दें. इरफ़ान हबीब को हैरानी इस बात पर हुई कि राज्यपाल को उस समय भाषण का समय दे दिया गया जिस समय उनका भाषण नहीं था.

सम्मलेन हॉल को चार हिस्सों में बैरिकेड कर दिया गया था. इरफ़ान हबीब को इस बात पर भी आपत्ति थी कि राज्यपाल की सुरक्षा टीम ने उस कांफ्रेंस हॉल को चार भागों में बांट दिया जहां सभी लोग मौजूद थे. उन्होंने कहा कि एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक कोई नहीं जा सकता था. मैंने और मंच में जगह लेने वालों ने जब स्टेज पर जाने से मना कर दिया तो केवल हमारे लिए एक बैरिकेड कुछ पल के लिए हटा दिया गया. इरफ़ान हबीब का कहना है कि भारतीय इतिहास कांग्रेस का अधिवेशन 1935 से हो रहा है. मैं ख़ुद 1947 से इसमें भाग ले रहा हूं. लेकिन आज तक, यहां तक कि अंग्रेज़ों के ज़माने में भी,

सुरक्षाकर्मियों का हस्तक्षेप नहीं हुआ. हबीब का कहना है कि कांफ्रेंस में सुरक्षा कर्मियों का क्या काम. इसे हटवाने के लिए उन्होंने मांग भी की. उन्होंने कहा कि मैंने कहा जब तक बैरिकेड नहीं हटेगा हम राज्यपाल साहेब के साथ मंच पर बैठने नहीं जाएंगे. हमारे सभी पदाधिकारी हमारे साथ थे उन्होंने भी यही पोज़िशन ली. जब उन्हें मालूम हुआ कि हम मंच पर नहीं जाएंगे तब पुलिस ने बैरिकेड हटाया और हमें जाने दिया. आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इरफ़ान हबीब और एक सांसद के भाषण के बाद अपना भाषण शुरू किया.

उन्होंने कहा कि उनकी समझ से यह सम्मलेन इतिहास पर है लेकिन यहां तो सियासी भाषण दिए गए हैं. राज्यपाल ख़ान का कहना था कि उनसे पहले के भाषणों में कश्मीर और नागरिकता संशोधन क़ानून का ज़िक्र हुआ था. तब हबीब ने कहा कि उनका केवल इतना कहना था कि इतिहासकार को रिसर्च की ज़रुरत होती है जिसके लिए इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की सुविधाएं ज़रूरी हैं. मैंने अपने भाषण में कहा कि कश्मीर में चार महीने से इंटरनेट पर प्रतिबंध है तो इतिहासकार अपने काम कैसे करेंगे. अपना रिसर्च किस तरह से करेंगे. सम्मेलन में इरफान हबीब इकलौते शख्स नहीं थे जिन्होंने राज्यपाल का विरोध किया. कई और लोगों ने आरिफ मोहम्मद खान का विरोध किया और इरफ़ान हबीब का समर्थन किया. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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