राज्यसभा सदस्य के मनोयन के बाद कठघरे में रंजन गोगोई और उनके फैसले

Samachar Jagat | Friday, 20 Mar 2020 09:47:29 AM
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पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्य के मनोयन का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उन्हें राज्यसभा के सदस्य के तौर पर शपथ लेने से रोकने की गुहार लगाई गई है. दिलचस्प यह है कि ऐसा करने की गुहार समाजसेवी मधु किश्वर लगाई है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कट्टर समर्थक हैं. किश्वर की याचिका में रिटायरमेंट के बाद जजों के किसी पद को स्वीकार करने, कूलिंग ऑफ पीरियड तय करने को लेकर गाइडलाइन तय करने की भी मांग की गई है. वैसे मंगलवार को पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा में नामित करने के फैसले पर उनके पूर्व सहयोगी कई जजों ने ही सवाल उठाए थे.



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इन सवालों के पीछे उनके अयोध्या और राफेल मामलों पर सुनाए गए फैसले हैं. रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के उन चार जजों में शामिल थे जिन्होंने उस समय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस कर उन पर पक्षपात के आरोप लगाए थे. इसके बाद रंजन गोगोई एक तरह से नायक बनकर सामने आए क्योंकि माना जा रहा था कि इसके बाद वे देश का मुख्य न्यायाधीश बनने का मौका खो सकते हैं. लेकिन जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायर होने के बाद रंजन गोगोई ही देश के मुख्य न्यायाधीश बने. लेकिन अयोध्या और राफेल से जुड़े दो मामलों में उनकी अगुआई में दिए फैसले विपक्ष को रास नहीं आए.

उनके कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट बहुत ही कम या शायद ही किसी टिप्पणी या फैसले में मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बना हो. रंजन गोगोई ने ही तीन तलाक और अनुच्छेद 370 और सीबीआई से जुड़े मामले पर भी सुनवाई की और फैसले दिए. इन फैसलों में सरकार को सही साबित किया गया और एक तरह से उनकी मदद की गई. इन फैसलों की वजह से उनका राज्यसभा जाना सवालों में है. मुहावरों में बात की जाए तो जुमा-जुमा चार दिन ही तो उन्हें रिटायर हुए हुआ है इसलिए उनके मनोयन को सरकार का साथ देने का इनाम माना जारहा है. विपक्ष तो उन पर हमलावर है ही, उनके साथ प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जज कुरियन जोसेफ और मदन बी लोकुर तक ने सवाल उठाए हैं.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि रंजन गोगोई को ईमानदारी से समझौता करने के लिए याद किया जाएगा. एआईएमआईएस प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर तीखा हमला किया. ओवैसी ने कहा कि जस्टिस लोकुर ने जो कहा मैं उससे सहमत हूं. मैं सवाल उठा रहा हूं. न्यायालय पर सवाल उठते है. उनके फैसले से सरकार को लाभ हुआ है. वे खुद मना करें नही तो एक्सपोज हो जाएंगे. जेटली साहेब ने यही कहा था. इनके खिलाफ महिला ने भी शिकायत की थी. उस महिला को भी वे न्याया नहीं दिला पाए. संविधान और लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है.

वैसे सरकार को भी यह पता था कि रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने पर विवाद होगा तो सवाल यह है कि फिर उसने ऐसा क्यों किया. सरकारी के सूत्रों का कहना है कि मनोनीत सांसदों में विभिन्न क्षेत्र के लोग तो हैं. लेकिन मशहूर न्यायविद नहीं था. जस्टिस गोगोई को इसीलिए लाया गया है क्योंकि वे मुख्य न्यायाधीश रहे हैं. कई महत्त्वपूर्ण निर्णय दिए हैं. उनके आने से से राज्यसभा में बहस को नई धार मिलेगी और हाउस ऑफ़ ऐल्डर्स को उनके अनुभवों का लाभ मिलेगा.

वैसे उनके मनोयन को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि असम में विधानसभा चुनाव होना है और भाजपा अगले साल होने वाले चुनाव में इसका फायादा उठाना चाहती है. जस्टिस गोगोई जिस समुदाय से आते हैं उसका वहां उनका ख़ासा प्रभाव है. भाजपा इससे पहले भूपेन हाजरिका को भारत रत्न भी दे चुकी है. भाजपा की मानें तो कांग्रेस का एतराज़ गलत है. कांग्रेस ने बहरुल इस्लाम को पहले 1962 से 1972 यानी दस साल तक राज्यसभा में रखा फिर हाईकोर्ट का जज बनाया. रिटायर होने पर सुप्रीम कोर्ट का जज भी बनाया. फिर उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया.

इसी तरह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा को पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. फिर उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया. सरकारी सूत्रों के मुताबिक उन्होंने ही चौरासी के दंगों में कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट दी थी. कांग्रेस की कृपा दृष्टि चुनाव आयुक्तों पर भी रही. पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एमएस गिल को राज्यसभा भेजा और केंद्रीय मंत्री तक बनाया. मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को भी कांग्रेस ने गांधीनगर से से लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव भी लड़ाया था. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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