सचिन पायलट को साधने की कोशिश में जुटी भाजपा

Samachar Jagat | Friday, 20 Mar 2020 09:47:24 AM
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मध्यप्रदेश में सियासी उथलपुथल जारी है. सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंच चुका है. सरकार गिराने और बचाने का खेल जारी है. वैसे कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को गंवा चुकी है लेकिन उसके सामने कई नेताओं को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती है. खास कर राजस्थान में सचिन पायलट को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. विधानसभा चुनाव से पहले और बाद में जो घटनाक्रम हुए वे मध्यप्रदेश जैसे ही थे. राजस्थान में कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए सचिन पायलट ने खूब मेहनत की थी. उनकी मेहनत रंग लाई और कांग्रेस सत्ता में आई. प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद से ही सचिन पायलट ने कई मुद्दों पर सरकार को सड़क पर घेरा. हालांकि कांग्रेस आलाकमान को पता था कि राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खींचतान हो सकती है, इसलिए अशोक गहलोत को राजस्थान से हटाकर केंद्र की राजनीति में सक्रिय कर दिया गया.



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तब लगा था कि सचिन पायलट के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी आसान हो गई है. उनकी अगुआई में कांग्रेस ने भाजपा को हैरान करते हुए लोकसभा के दो उपचुनाव में मात दी. लेकिन जब राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस बड़ी पार्टी बनकर उभरी. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने तब सचिन पायलट को किनारे करते हुए अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना डाला. हालांकि इससे पहले दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच खूब खींचतान भी हुई. वैसे कांग्रेस ने सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बना कर मामले को ठंडा जरूर किया लेकिन आग अंदर-अंदर सुलग रही है और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री न बनने की कसक बनी हुई है.

मध्यप्रदेश में जिस तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया उपेक्षा का दंश का झेल रहे थे वही भावना सचिन पायलट के बयानों से भी झलकती है. हाल ही में उन्होंने अस्पतालों में हुई बच्चों की मौत के मामले में खुल कर अपनी ही सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि इसमें जिम्मेदारी होनी चाहिए. उन्होंने कहा था कि आज हम लोगों को जवाबदेही तय करनी पड़ेगी क्योंकि जब इतने कम समय में इतने सारे बच्चे मरे हैं तो कोई न कोई कारण रहे होंगे. कमियां प्रशासनिक हैं, संसाधन, चिकित्सक,स्टाफ, नर्सिंग स्टाफ की कमी थी, लापरवाही थी, आपराधिक लापरवाही थी, इन सब की रिपोर्ट बन रही है लेकिन हमें कहीं न कहीं जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी. उन्होंने कहा था कि जिस घर में मौत होती है, जिस माता-पिता के बच्चे की जान जाती है, जिस मां की कोख उजड़ती है उसका दर्द वे ही जान सकती हैं. हालांकि अशोक गहलोत ने सफाई दी थी कि पिछली सरकार की तुलना में इस बार मौतें कम हुई हैं. इसके अलावा एक जाति विशेष के साथ मारपीट, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर भी पायलट अपनी ही सरकार के रवैये पर सवाल उठाते रहे हैं. 

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की राजस्थान में बड़ी हार हुई. अशोक गहलोत अपने बेटे की भी सीट नहीं बचा पाए. इसके बाद एक खेमे में फिर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठी. विधायक पृथ्वीराज मीणा ने कहा था कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए. यह मेरी व्यक्तिगत राय है. मीणा ने कहा कि वे यह बात पहले भी कह चुके हैं क्योंकि विधानसभा चुनाव में पार्टी उन्हीं के कारण जीती थी. हाल ही में मुख्यमंत्री गहलोत ने एक टीवी चैनल को साक्षात्कार में कहा कि प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को कम से कम जोधपुर सीट पर पार्टी की हार की जिम्मेदारी तो लेनी ही चाहिए क्योंकि वे वहां शानदार जीत का दावा कर रहे थे. इसके बाद गहलोत व पायलट के समर्थन में अलग अलग बयान दिए गए.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राजस्थान के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर कहा कि थोड़ा इंतजार करें, क्योंकि इंतजार का फल मीठा होता है. दरअसल उनसे पूछा गया था कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह पर सचिन पायलट भी चलेंगे, शेखावत ने कहा कि मुझे लगता है कि अभी ऐसी बहुत सारी घटनाएं देश को देखने को मिलेंगी. ज्योतिरादित्य और सचिन ने बहुत साल साथ काम किया है. दोनों एक ही पीढ़ी के नेता हैं. दोनों वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के परिवार से आते हैं. निश्चित ही दोनों में दोस्ती और आत्मीय संबंध होंगे, लेकिन आगे क्या होगा, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना चाहिए, क्योंकि इंतजार का फल हमेशा मीठा होता है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से अलग होते ही सचिन पायलट ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस से अलग होते देखना दुखद है. काश चीजों को पार्टी के अंदर ही साथ मिलकर सुलझा लिया गया होता. उनके इस बयान में कांग्रेस आलाकमान को नसीहत दिखाई दे रही है. जहां मिलकर सुलझाने का मतलब है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की बातों को मान लेना. क्योंकि मुख्यमंत्री पद छोड़कर कांग्रेस सिंधिया को सब कुछ देने को तैयार थी. वैसे यह तय है कि भाजपा सचिन पायलट को साधने में जुटी है. सवाल यह है क्या वह ऐसा कर पाएगी. इस सवाल का जवाब फिलहाल सचिन पायलट दे सकते हैं या भाजपा. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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