राहुल गांधी ने कोरोना के खतरे से कई बार आगाह किया लेकिन सोई रही सरकार

Samachar Jagat | Sunday, 29 Mar 2020 08:31:28 AM
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कोरोना वायरस का खतरा देश में पूरी तरह पांव पसार चुका है. सरकार देर से चेती. कोरोना वायरस के खतरों से सरकार जानबूझ कर आंखें चुराती रही. अब तो केंद्र सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह इन खतरों को भांपने में नाकाम रही और कोरोना जब पांव पसार चुका तब उसकी नींद टूटी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वे कोरोना से लड़ने की बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत सत्कार में लगे रहे. सोशल मीडिया पर तो केंद्र सरकार की नीयत पर लगातार हमले रहे. कहा तो यह भी जा रहा है कि मध्यप्रदेश में सरकार गिराने और बचाने के खेल की वजह से केंद्र सरकार कोरोना के खतरों से अनजान बनी बैठी रही. हालांकि इसे लेकर सियासत होनी नहीं चाहिए लेकिन सरकार ने जिस तरह इस पूरे मामले की अनदेखी की है, उसे लेकर उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इन खतरों से सरकार को बार-बार आगाह किया था. लेकिन सरकार सोई रही. ट्वीटर और फेसबुक पर इसे लेकर लोग सरकार पर हमला कर रहे हैं. राहुल गांधी की चेतावनी को नजरअंदाज करने पर अभिनेता संजय खान की बेटी फराह अली खान ने भी केंद्र सरकार की खिंचाई की है. राहुल ने लगातार ट्वीट के जरिए सरकार को कोरोना वायरस के खतरों से आगाह किया लेकिन सरकार नहीं चेती. ऐसा क्यों, इसका जवाब तो सरकार के पास ही है.

राहुल गांधी ने कई बार सरकार को चेताया कि कोरोना वायरस देश के लोगों और अर्थव्यवस्था को परेशानी में डाल सकता है. लेकिन विपक्ष की आवाज सरकार को पसंद नहीं, इसलिए राहुल गांधी की आवाद को भी अनसुनी कर दी. राहुल ने 31 जनवरी को पहला ट्वीट कर सरकार को चेताया था. सवाल यह है कि देश के चुने हुए एक सांसद की इतनी चेतावनियों को किसने और क्यों नज़रंदाज़ किया. अगर सही समय पर फैसले ले लिए गए होतो तो इस तरह की मारामारी नहीं होती.

राहुल गांधी जिन्हें नरेंद्र मोदी ब्रिगेड ' पप्पू " का संबोधन देते आए हैं, उन्होंने कई-कई ट्वीट किए. ये ट्वीट आज सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं और लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं. राहुल गांधी ने जो ट्वीट किए उनकी तारीखों पर भी ध्यान देना जरूरी है. राहुल ने पहला ट्वीट 31 जनवरी को किया और लिखा कि चीन में कोरोना वायरस ने सैकड़ो लोगों की जान ली है. मेरी संवेदनाएं पीड़ितों के परिवार और उन लाखों लोगों के साथ हैं जो वायरस को फैलने से रोकने के लिए क्वारंटाइन कर दिए जाने को मजबूर हैं. उन्हें इस अजीब मुश्किल से निकलने की शक्ति और हिम्मत मिले.

इसके बाद 12 फरवरी को वे ट्वीट करते हुए लिखते हैं, कोरोना वायरस से हमारे लोगों और हमारी अर्थव्यवस्था को बेहद गंभीर खतरा है. मेरी समझ है कि सरकार इस खतरे को गंभीरता से नहीं ले रही है. समय पर कार्रवाई महत्त्वपूर्ण है. लेकिन सरकार सोई रही. राहुल गांधी को विलेन की तरह पेश करने वाला मीडिया ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया. लेता भी क्यों, बात तो राहुल गांधी ने कही थी. यह बात अलग है कि इस ट्वीट के हफ्ते भर बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लिट्टी-चोखा खाते हुई तसवीर वायरल हुई. खुद प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर फोटा साझा की और मीड़िया इसके बाद मोदी चालीसा में लग गया.

लेकिन राहुल गांधी यहीं नहीं रुके. तीन मार्च को उन्होंने फिर ट्वीट किया और कहा कि हरेक राष्ट्र के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब नेताओं की जांच होती है. सच्चा नेतृत्व वायरस द्वारा भारत और इसकी अर्थव्यवस्था पर आने वाले विशाल संकट को टालने पर पूरी तरह केंद्रित रहेगा. उसी दिन एक और ट्वीट में प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए लिखा कि डीयर @PMOIndia भारत जब आपात स्थिति का सामना कर रहा है तब अपने सोशल मीडिया अकाउंट से क्लाउन की भूमिका निभाते हुए भारत का समय बर्बाद करना बंद करें. कोरोना वायरस की चुनौती पर हरेक भारतीय का ध्यान खींचने की दिशा में काम कीजिए. देखें ऐसे किया जाता है, साथ में उन्होंने वीडियो भी साझ किया.

फिर दो दिन बाद यानी पांच मार्च को उन्होंने ट्वीट कर कहा कि स्वास्थ्य मंत्री का यह कहना कि भारत सरकार ने कोरोना वायरस को नियंत्रण में कर लिया है, टाइटैनिक के कप्तान द्वारा यात्रियों को यह कहने की तरह है कि घबराएं नहीं, जहाज डूब ही नहीं सकता है. समय आ गया है कि सरकार एक कार्ययोजना घोषित करे जो संकट से निपटने के लिए ठोस संसाधनों से समर्थित हो. दरअसल स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने तीन मार्च को प्रेस कांफ्रेंस कर एक चिकित्सक और मंत्री होने के नाते लोगों से अपील की थी कि कोरोना वायरस के संक्रमण के डर से लोग मुंह पर मास्क लगाकर न घूमें, डर न फैलाएं.

राहुल ने इसके बाद तेरह मार्च को भी ट्वीट किया और कहा कि मैं इसे दोहराता रहूंगा. कोरोना वायरस एक बड़ी समस्या है. समस्या को नजरअंदज करना समाधान नहीं है. अगर ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो भारतीय अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाएगी. सरकार गंभीरता को समझ नहीं रही है. इसके साथ उन्होंने 12 फरवरी का अपना ट्वीट भी साझा किय था. पांच दिन बाद जब कोरोना का संकट नजर आने लगा तो राहुल गांधी ने 18 मार्च को ट्वीट किया और कहा कि कोरोना वायरस से निपटने का एक ही तरीका है, शीघ्र, ठोस कार्रवाई. निर्णायक ढंग से काम करने में सरकार की नाकामी की वजह से भारत को भारी कीमत चुकानी होगी.

लेकिन सरकार ने इसके बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं की. तब तक मध्यप्रदेश में सियासी खेल शुरू हो चुका था. सरकार गिराने और बनाने के लिए पूरी भाजपा और केंद्र सरकार लगी थी. मध्यप्रदेश में सरकार गिरने के बाद ही प्रधानमंत्री हरकत में आए और फिर पहले जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन का एलान किया. लेकिन तब तक बात हाथ से फिसल चुकी थी. हालांकि 21 मार्च को भी राहुल ने ट्वीट किया और लिखा कि कोरोना वायरस हमारी कमजोर अर्थव्यवस्था पर जोरदार प्रहार है. छोटे और मध्यम स्तर के कारोबारी व दिहाड़ी मजदूर सबसे बुरी तरह प्रभावित होंगे. ताली बजाने से उन्हें सहायता नहीं मिलेगी. सिर्फ बड़े आर्थिक पैकेज से लाभ होगा जिसमें सीधे नगद ट्रांसफर, टैक्स ब्रेक और कर्ज के पुनर्भुगतान का स्थगन शामिल हो.

इसलिए सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि राहुल गांधी की इन चेतावनियों के बावजूद सरकार क्यों सोई रही. सिर्फ इसलिए कि राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं और सरकार विपक्ष की सुनना नहीं चाहती. या फिर इसके पीछ वजह कुछ और है. हालांकि सारा देश अभी संकट से गुजर रहा है लेकिन सरकार ने फरवरी में ही इसे गंभीरता से लिया होता तो आज जो यह अफरातफरी है वह नहीं फैली होती. एक तरह से सरकार असहाय सड़कों पर मजदूरों का पलायन देख रही है. बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ा है तो केंद्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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