फर्जी खबरों के कारखाने और चैनलों की भूमिका

Samachar Jagat | Wednesday, 20 May 2020 12:29:58 PM
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फर्जी और धार्मिक उन्माद पैदा करने वाली खबरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपना रुख तो साफ नहीं किया लेकिन इसे गंभीर मुद्दा माना है. अदालत ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर है इसलिए इस मुद्दे पर प्रेस काउंसिल को भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए. हालांकि उसने किसी तरह का अंतरिम आदेश नहीं दिया. वैसे बहुत सारे सामाजिक संगठनों को सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से हैरानी नहीं हुई. हाल के दिनों में जो भी घटनाक्रम हुए उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद भी नहीं थी कि वह फर्जी खबरों पर रोक लगाने के लिए कोई अंतरिम आदेश देगा. पूर्व मुख्य न्यायाधीष रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने के बाद तो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं. लेकिन सच यह भी है कि आस्था अदालत पर अब भी है. लेकिन कुछ बुनियादी सवाल तो उठते ही हैं, सुप्रीम कोर्ट को भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

जिस तरह की खबरें हाल में चलाईं या दिखाई गईं तबलीगी जमात को लेकर उसे लेकर क्या अदालत की जिम्मेदारी नहीं थी कि वह स्वतः संज्ञान लेकर इस पर आगे की कार्यवाही करता. ऐसा इसलिए कि यह देश और समाज से जुड़ा मसला है. लोकतंत्र में बोलने के अधिकार का मतलब यह कहां है कि फर्जी खबरें चलाईं जाएं और धड़ल्ले से झूठ चैनलों पर दिखाया जाए और लोगों के मजहबी जज्बात को इस कद्र भड़का दिया जाए कि सब्जी से लेकर दूध बेचने वालों तक के कागज लोग देखने पर उतारू हो जाएं. यह लोकतंत्र की भी हार है और कानून का मखौल भी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अदालत ने माना कि मामला गंभीर है लेकिन इस टिप्पणी का क्या मतलब रह जाता है जब रोज झूठ परोसा जा रहा है. ठीक है कि अदालत में उन चैनलों और पत्रकारों के साथ पूरी सत्ता कदमताल करती दिख रही थी लेकिन सवाल यह है कि अदालत को भी ऐसा दिखना चाहिए था. लगा तो ऐसा ही.

चैनलों के खलीफ पत्रकार लगातार झूठ परोस रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई तक नहीं करती जो उनके खबरों का खंडन करती हुई उसे फर्जी बताती है. एक दो नहीं कई ऐसी खबरें हैं जिसे नोएडा से लेकर प्रयागराज तक की पुलिस ने फर्जी बताया लेकिन न पत्रकारों के ट्वीट पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया लेकिन ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ न सिर्फ मुकदमा दर्ज करते हैं. यूपी के पुलिसवाले फैजाबाद से दिल्ली आकर उनके घर पर पुलिस का धौंस जमाते हैं और फिर उन्हें फैजाबाद आकर अपना बयान दर्ज कराने का नोटिस थमा डालते हैं.

लेकिन वही पुलिस कई चैनलों के खलीफाओं के खिलाफ फर्जी खबर की बात तो सार्वजनिक तौर पर करती है लेकिन फर्जी खबर के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करती. सांप्रदायिक खबरें परोसने में समाचार एजंसी की प्रमुख भी पीछे नहीं रहीं. उनका ट्वीट तो ऐसी ही कहानी बयान करती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लेकर उनका बचाव करने वाली पत्रकार को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पायलेबल जर्नलिस्ट कहा था तो पत्रकारों ने तूफान खड़ कर डाला था. एडिटर्स गिल्ड ने भी इस पर कड़ा एतराज जतया था लेकिन वही महिला पत्रकार आज सांप्रदायिकता फैला रहीं हैं तो एडिटर्स गिल्ड भी चुप है और प्रेस काउंसिल भी.

दरअसल समाचार एजंसी एएनआई ने ट्वीट करते हुए खबर डाली कि नोएडा के सेक्टर पांच में तबलीगी जमात के संपर्क में आए लोगों को क्वारेंटाइन में रखा गया है. इस खबर को रिट्वीट करते हुए एजंसी की मालकिन स्मिता प्रकाश ने बिना इसकी पुष्टि किए नोएडा को सुरक्षित रहने की सलाह दी. समाचार एजंसी के ट्वीट पर नोएडा के डीसीपी ने खबर का खंडन करते हुए एजंसी को टैग किया और लिखा कि यह फर्जी खबर है. हालांकि समाचार एजंसी ने बाद में खबर में सुधार कर लिया. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. नफरत का कारोबार करने वालों को हथियार मिल चुका था. चैनलों ने इसे लेकर ही बहस शुरू कर दी थी. ट्वीट कर चैनल पर कार्यक्रम पेश करने वाले ने आरपार की बात शुरू कर दी थी. इसी तरह एक चैनल ने फर्जी खबर ट्वीट किया और पुलिस ने इसे फर्जी बताया.

फर्जी खबर के ज़रिए नफ़रत फैलाने के लिए मशहूर ज़ी न्यूज़ को एक फजीहत का फजीहत का सामना करना पड़ा. की वजह इस बार भी वही है. चैनल ने नफ़रत फैलाने के उद्देश्य से तब्लीगी जमात के ख़िलाफ़ भ्रामक खबर चलाई, जिसके लिए उसे फटकार लगाए जाने के बाद माफ़ी मांगनी पड़ी. ज़ी न्यूज ने तब्लीगी जमात को लेकर एक खबर चलाई थी. खबर में चैनल ने दावा किया था कि अरूणाचल प्रदेश में कोरोना से संक्रमित जमात के 11 मरीज़ मिले हैं. इसी खबर पर चैनल ने सवाल भी किया कि जमात की जिद आखिर कितने लोगों की जान लेगी. लेकिन इससे पहले कि खबर की पड़ताल की जाती आईपीआर अरूणाचल प्रदेश ने ही खबर का खंडन कर दिया. आईपीआर ने ट्वीट कर बताया कि अरूणाचल प्रदेश में कोरोना संक्रमित सिर्फ एक मरीज़ है. ज़ी न्यूज़ की खबर पूरी तरह से फर्जी है.

आईपीआर के खबर का खंडन किए जाने के बाद जब चैनल की फजीहत हुई तो चैनल ने खुद ही माफ़ी मांग ली. चैनल ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए कहा की मानवीय भूल से जी न्यूज पर अरुणाचल प्रदेश में तब्लीगी जमात के 11 लोगों संक्रमित होने की खबर दिखाई गई. इस गलती का हमें खेद है. ऐसा पहली बार नहीं है जब ज़ी न्यूज ने जमात को लेकर इस तरह की फर्जी खबर चलाई हो. इससे पहले चैनल ने छह अप्रैल को एक खबर चलाई थी, जिसमें दावा किया गया था कि उत्तर प्रदेश के फीरोजाबाद में चार तबलीगी जमाती कोरोना पॉजिटिव मिले हैं, लेकिन जब इन लोगों को पुलिस लेने पहुंची तो इन लोगों ने पथराव शुरू कर दिया.

लेकिन जब इस खबर के बारे में फीरोजाबाद पुलिस को पता चला तो उसने चैनल को फटकार लगते हुए खबर को डलीट करने के लिए कहा. पुलिस ने ट्वीट कर कहा कि आप असत्य व भ्रामक खबरें फैला रहे हैं. जबकि जनपद फीरोजाबाद में न तो किसी मेडिकल टीम और न ही एंबुलेंस गाड़ी पर किसी तरह का पथराव किया गया है. आप अपने ट्वीट को तत्काल डिलीट करें. इस पूरे मामले में कई दिग्गज पत्रकारों का झूठ सामने आया तो दूसरी तरफ विवादों में रहने वाली पुलिस ने फर्जी खबरों का फौरन खंडन कर अपनी छवि से इतर काम किया. एक तरफ देश कोरोना से लड़ रहा है और दूसरी तरफ फर्जी खबरों का कारोबार करने वाले लगातार झूठ परोस रहे हैं. यह खतरनाक है समाज और देश के लिए ही नहीं, उन फर्जी खबरनवीसों के लिए भी जो झूठ को सच बनाने का कारोबार कर रहे हैं. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विशलेषण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).




 
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