दिल्ली दंगों में मुसलमानों को बचा कर नायक बने मोहिंदर सिंह

Samachar Jagat | Wednesday, 25 Mar 2020 11:42:42 PM
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कोरोना वायरस ने दिल्ली दंगों की आंच को पीछे छोड़ दिया. हालांकि दिल्ली को जलाने वाले दंगों ने कइयों का आशियाना उजाड़ा, कइयों की रोजी-रोटी छीनी तो कइयों का सहारा. दंगों ने दिल्ली में पचास से ज्यादा लोगों की जानें लील लीं और रिश्ते व विश्वास तार-तार हुए. लेकिन इस अंधेरे और अन्याय के बीच भी दंगों के दौरान न सिर्फ यह कि उम्मीद की किरण बरकरार रही बल्कि रिश्तों की मिठास को बनाए रखने में भी लोगों ने कोताही नहीं की.



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हालांकि जो दाग और जख्म दिल्ली के दंगों ने दिए हैं वह दाग जल्दी तो नहीं धुलेंगे लेकिन लोगों ने कोशिश की रिश्ते बरकरार रहे, मानवता जिंदा रहे और लोग मजहब के दायरे से बाहर निकल कर इंसानों को खुशियां बांटें. हालांकि अभी भी बहुत सारे लोग अस्थायी कैंपों में हैं. अब वे कोरोना से लड़ रहे हैं लेकिन इस बीच कई सारे किस्से-कहानियां सामने आ रहीं हैं जो मोहब्बत और भाईचारे की मिसाल हैं. ऐसी ही एक कहानी के हीरो हैं मोहिंदर सिंह और उनके बेटे, जो कुछ मुसलिम परिवारों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि मोहिंदर खुद 1984 दंगों का शिकार हुए थे.

दिल्ली के दंगों में कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जब मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया और हिंदुओं ने मुसलिम परिवारों की सुरक्षा की. ऐसे ही गोकुलपुरी के मोहिंदर सिंह ने 24 और 25 फरवरी को करीब 60 से 70 मुसलमानों को अपनी स्कूटी और मोटरसाइकिल से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. अब मोहिंदर सिंह इन मुसलिम परिवारों में गोकुलपुरी दोबारा लौटने के विश्वास बहाली के काम में जुटे हैं. हिंसा के उस दिन की कहानी बताते हुए मोहिंदर सिंह ने आगे कहा कि मैंने 1984 के सिख विरोधी दंगों को देखा है. इस हिंसा ने मुझे उसकी याद दिला दी. कब मैं तेरह साल का था. हमने दाढ़ी वाले मुसलमानों को पगड़ी दी ताकि उन्हें पहचाना न जा सके. वहां महिलाएं और बच्चे भी थे. हमने सबसे पहले उन्हें ही बाहर निकाला.

हिंसा के समय मोहिंदर सिंह और उनके बेटों ने पहले महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित जगह पहुंचाया. इसके बाद उन्होंने दंगाइयों की नजरों से बचाते हुए मुसलिम पुरुषों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया. सभी मुसलिम परिवार उनका शुक्रिया अदा करते नहीं थकते. मोहिंदर सिंह अब इन परिवारों की वापसी को लेकर उनका भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वे दोनों समुदायों के बीच गहरी हो चुकी खाई को पाटने की भी कोशिश कर रहे हैं. मोहिंदर सिंह जैसे लोगों के भरोसे ही दंगे के बाद फारुख और इश्हाक ने गोकुलपुरी में अपनी दुकान खोली. मोहिंदर की वजह से बहुतों की जानें भी बचीं और एक-दूसरे पर यकीन भी. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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