मुसाफिर हूं यारों, न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है बस चलते जाना

Samachar Jagat | Friday, 27 Mar 2020 01:09:13 AM
3545054892960105

कोरोना वायरस पर काबू पाने के लिए सरकार ने देश भर में घरबंदी का फरमान तो जारी कर दिया लेकिन इस फरमान से गरीबों का जीवन दूभर हो गया है. अपना शहर और राज्य छोड़ कर दूसरे शहर और राज्यों को जाने वाले दिहाड़ी मजदूर से लेकर रिक्शा-ठेला चलाने वाले परेशान हैं. उनके सामने रोजी का संकट है. रोजगार चला गया है. कामगारों को नौकरी से निकाल दिया गया है. नतीजा यह है कि अपना शहर और राज्य छोड़ कर जाने वाले गरीब वापस अपने गांव-घर लौट रहे हैं लेकिन दिक्कत यह है कि लौटने का साधन नहीं है. न बसें चल रहीं हैं और न ही ट्रेन. बहुत सारे लोग अटके पड़े हैं. दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले मजदूर घर लौट रहे हैं. राजस्थान के जयपुर से कोल्ड स्टोरेज में काम करने वाले मजदूरों को घर भेजा गया है. मंगलवार को चौदह मजदूर जयपुर से पैदल बिहार के लिए निकले. रास्ते में उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे पैदल ही चलने को मजबूर हैं. 



loading...

आगरा पहुंचे बिहार के सुपौल के रहने वाले सुधीर कुमार ने बताया कि वे महीने भर पहले अपने चौदह साथियों के साथ जयपुर के कोल्ड स्टोरेज में काम करने के लिए गए थे. अभी 25 दिन ही हो पाए थे कि सरकार के आदेश पर कोल्ड स्टोरेज को बंद कर दिया गया. इसके बाद कोल्ड स्टोरेज मालिक ने दो हजार रुपए देकर उन्हें घर भेज दिया. लेकिनजयपुर में कर्फ्यू लगा हुआ है. इस कारण कोई वाहन नहीं चल रहा. वे अपने साथियों के साथ पैदल ही घर के लिए निकल लिए.

वे 21 मार्च को जयपुर से निकले थे, 24 मार्च को आगरा पहुंच पाए. रास्ते में खाने और पीने का सामान भी नहीं मिला. इसलिए भूखे पेट चल रहे हैं. रास्ते में जो मिल जाता है, उसी से पेट भर लेते हैं. उन्हें करीब हजार किलोमीटर दूर अपने जिले में जाना है. बिहार के मजदूरों में प्रभास, संजीत, श्याम, विनोद, सुग्रीव, पवन, गुलशन, रंजीत, दीपनारायण, भूपेंद्र, मनोज, अर्जुन आदि सभी चल रहे हैं. रास्ते में पुलिस रोकती है तो वे पैदल अपने घर जाने की बात बताते हैं.

इसी तरह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बेहद झकझोर देने वाले हालात ने बीस साल के अवधेश कुमार को मजबूर कर दिया कि वह सावधानी को छोड़कर, पुलिस कार्रवाई का खतरा उठाकर भी सड़क पर आ जाए. अवधेश ने मंगलवार रात को ही उन्नाव के अपने कारखाने से पैदल अस्सी किलोमीटर की दूरी पर बसे बाराबंकी में अपने गांव की तरफ पैदल निकल पड़े थे. लगभग 36 घंटे के इस सफर में अवधेश कहीं भी रुक नहीं पाएगा, एक-दो बार को छोड़कर. अवधेश का साथ देने के लिए लगभग 20 अन्य बूढ़े-जवान और भी हैं, जो उसके साथ उन्नाव की उसी फैक्टरी में काम करते हैं.

जब अवधेश से पूछा गया कि मोदी ने मजदूरों से अपील की है कि वे घर जाने की बजाय, जहां पर हैं वहीं रहें तो उसने कहा कि मैं भी यह नहीं करना चाहता, लेकिन कोई विकल्प नहीं है. अवधेश ने कहा कि लेकिन मैं कैसे रह सकता हूं. मैं उन्नाव की एक स्टील फैब्रिकेसन कंपनी में काम करता हूं. मैं वहीं रुका हुआ था, जहां उन्होंने रखा था. बीती रात प्रबंधन ने हमें खाली करने के लिए कह दिया. उन्होंने हमसे कहा कि हम यहां नहीं रह सकते. ऐसे में हमारे पास घर जाने के अलावा क्या विकल्प था. परिवहन की सुविधा नहीं है. इसलिए हम कुछ लोग जो एक ही गांव के रहने वाले हैं, जिन्होंने तय किया कि हम पैदल ही गांव चलेंगे.

इस समूह में राजमल भी हैं, उन्होंने कहा कि हमारे गांव में कुछ भोजन है, लेकिन मेरी कमाई वही है जिससे मेरा परिवार चल रहा है. मैंने सुना है कि यूपी सरकार ने मेरे जैसे लोगों को एक हजार रुपए प्रति महीने देने योजना बनाई है, लेकिन मैं कहीं भी पंजिकृत नहीं हूं. कोई भी मेरे पास नहीं आया. मेरे जैसे लोगों को केवल अंधेरा नजर आ रहा है. इस समहू के पास कपड़े, पानी और कुछ बिस्कुट के साथ एक बैग था. धूप से बचने के लिए अपने सिर के चारों ओर तोलिया बांध रखे हैं. इनके पास कोरोना वायरस से बचने के लिए कुछ नहीं है. इसी तरह की कहानी गुजरात में काम करने वाले राजस्थान के हजारों प्रवासी मजदूरों की है. परिवहन सेवा उपलब्ध न होने के कारण पैदल ही अपने घर को लौट रहे हैं. गुजरात पुलिस उन्हें समझाने का प्रयास कर रही है कि वे यात्रा न करें.

अहमदाबाद के एक कांग्रेस नेता ने राजस्थान सरकार से अनुरोध किया है कि गुजरात-राजस्थान सीमा के पास स्थित अरवल्ली जिले के शामलजी उपनगर में ऐसे मजदूरों के पहुंचने पर उनके लिए परिवहन का इंतजाम किया जाए. राजस्थान के डूंगरपुर जिले के निवासी और अहमदाबाद में काम करने वाले राधेश्याम पटेल ने कहा कि बिना किसी कमाई के यहां रहने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने कहा कि हम लोग यहां चाय की दुकानों या खानपान की रेहड़ी पर काम करते हैं. चूंकि सब कुछ बंद है इसलिए हमारे मालिकों ने हमसे कह दिया है कि हालात ठीक हो जाएं तब आना क्योंकि उनके पास हमें देने के लिए पैसे नहीं हैं. बस और अन्य माध्यम उपलब्ध नहीं हैं इसलिए हमने पैदल ही घर जाने का निश्चय किया है.

पटेल उस समूह का हिस्सा हैं, जिसने पैदल यात्रा शुरू की थी. राजस्थान के उदयपुर जिले के रहने वाले मांगी लाल ने कहा कि मुझे वायरस के खतरे के बारे में पता है लेकिन हम असहाय हैं. बिना कमाई के हम तीन हफ्ते तक कैसे जिंदा रहेंगे. हमारे पास मकान मालिक को देने के लिए पैसे नहीं हैं. इससे अच्छा है कि हम अपने घर चले जाएं. गांधीनगर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक मयंक सिंह चावड़ा ने कहा कि पुलिस मजदूरों को मानवीयता के नाते खाने के पैकेट और पानी उपलब्ध करवा रही है. उन्होंने कहा कि हम इन प्रवासी मजदूरों को राजस्थान वापस जाने से रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं. इनके जाने से लॉकडाउन का उद्देश्य सफल नहीं होगा.

गुजरात प्रवासी मजदूर कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक पंजाबी ने दावा किया कि केवल अहमदाबाद से पचास हजार से अधिक मजदूर पैदल ही राजस्थान स्थित अपने घर की ओर रवाना हो चुके हैं. इसी तरह दिल्ली में दिहाड़ी पर काम करने वाले बंटी का है. वे भी अपने छोटे भाई, पत्नी और चार बच्चों सहित दिल्ली छोड़कर अपने गांव अलीगढ़ पैदल जा रहे हैं. उनका एक बच्चा तो दस महीने का ही है. दिल्ली से बुधवार सुबह चले बंटी का कहना है कि यहां रुककर क्या पत्थर खाएंगे. गांव जाएंगे तो वहां तो रोटी-नमक मिल जाएगा. उनके मुताबिक अगर वे ऐसे ही चलते रहे तो कल शाम तक उनका परिवार अलीगढ़ पहुंच जाएगा. इस तरह की खबरें देश के दूसरे इलाकों से भी आ रही हैं.

दिल्ली और गाजियाबाद से बिजनौर, रामपुर और बरेली जैसे उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बसे अपने गांवों-कस्बों की तरफ पैदल ही चल पड़े हैं. लेकिन सिर्फ इतनी दूर पैदल जाना ही इनकी मुश्किल नहीं है. रास्ते में पुलिस का डर है. ढाबे खुले नहीं हैं तो खाने की समस्या भी है. अगर कुछ मिल रहा है तो बहुत महंगा मिल रहा है. ऊपर से कोरोना का खौफ इतना कि किसी गांव में या रहने लायक जगह पर रुक भी नहीं सकते हैं. रुकने देना तो दूर लोग मांगने पर पानी भी नहीं देना चाहते हैं. ऐसी ही मुश्किलों से वे लोग भी जूझ रहे हैं जो दूसरे शहरों में फंसे हुए हैं और मदद की बाट जोह रहे हैं. इनमें से कई लोगों का कहना है कि सरकार को कुछ इंतजाम करना चाहिए. उनके मुताबिक सार्वजनिक यातायात के साधन बंद हैं तो ऐसे में सरकार को उनके लिए कोई व्यवस्था करनी चाहिए या फिर इतना बड़ा फैसला लेने से कुछ दिन पहले बता देना चाहिए था.

उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य वैकल्पिक व्यवस्था करते दिख भी रहे हैं. लेकिन एक बड़ी आबादी इस मामले में भगवान भरोसे ही नजर आ रही है. यानी कि दो महीने से मुंह बाये खड़ी आपदा पर चुटकियों में लिया गया लॉकडाउन का फैसला लाखों लोगों के लिए एक नयी तरह की आपदा बन गया है. बिहार के सैकड़ों मजदूर जहां-तहां फंसे हुए हैं और सरकार इन मजदूरों की सुध नहीं ले रही है. उनकी हालत को देख कर तो बस वह गाना याद आता है, मुसाफिर हूं यारों, न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है बस चलते जाना. हालांकि इन मजूदोंर का ठिकाना उनका अपना गांव घर है, जहां वे लौट रहे हैं, हर मशक्कत के बावजूद. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


loading...


 
loading...

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!




Copyright @ 2020 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.