नसीरुद्दीन शाह व मीरा नायर सहित तीन सौ कलाकार, लेखकों ने कहा सीएए देश के लिए ठीक नहीं

Samachar Jagat | Tuesday, 28 Jan 2020 08:25:09 PM
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अभिनेता अनुपम खेर से भिड़े नसीरुद्दीन शाह के कहां कितने दिन हुए हैं. दोनों धाकड़ अभिनेताओं के बीच सोशल मीडिया पर जम कर वार और पलटवार हुआ. कुछ इधर थे, कुछ उधर. नसीरुद्दीन शाह ने एक बार फिर अपनी चुप्पी तोड़ी है. उनके साथ फिल्म जगत की दूसरी हस्तियां भी हैं, कुछ इतिहासकार, कलाकार, गायक और लेखक भी हैं, जिन्होंने सीएए और एनआरसी पर बयान दिया है. उनके इस बयान की गूंज भी देर तक सुनाई देगी.

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, फिल्म निर्माता मीरा नायर, गायक टीएम कृष्णा, लेखक अमिताव घोष, इतिहासकार रोमिला थापर सहित तीन सौ से ज़्यादा हस्तियों ने संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का विरोध करने वाले छात्रों और अन्य के साथ एकजुटता प्रकट की है. इनका बयान ‘इंडियन कल्चरल फोरम' में तेरह जनवरी को प्रकाशित हुआ है. अपने बयान में इनका कहना है कि सीएए और एनआरसी देश के लिए बड़ा खतरा हैं. बयान में कहा गया है कि हम सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले और बोलने वालों के साथ खड़े हैं. संविधान के बहुलवाद और अलग-अलग समाज के वादे के साथ भारतीय संविधान के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए उनके सामूहिक विरोध को हम सलाम करते हैं.

बयान में इन हस्तियों ने कहा है कि हम इस बात को जानते हैं कि हम हमेशा उस वादे पर खरे नहीं उतरे हैं और हममें से कई लोग अक्सर अन्याय को लेकर चुप रहते हैं. वक्त का तकाज़ा है कि हम सब अपने उसूलों के लिए खड़े हों. बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में लेखिका अनीता देसाई, किरण देसाई, अभिनेत्री रत्ना पाठक शाह, जावेद जाफरी, नंदिता दास, लिलेट दुबे, समाजशास्त्री आशीष नंदी, कार्यकर्ता सोहेल हाशमी और शबनम हाशमी शामिल हैं.

इस बयान में कहा गया है कि मौजूदा सरकार की नीतियां और कदम धर्मनिरपेक्ष और समावेशी राष्ट्र के सिद्धांत के खिलाफ हैं. इन नीतियों पर लोगों को असहमति जताने का मौका दिए बिना और खुली चर्चा कराए बिना संसद के ज़रिए जल्दबाज़ी में पास कराया गया हैं. इससे लाखों भारतीयों की जीविका और नागरिकता खतरे में है. एनआरसी के तहत, जो कोई भी अपनी वंशावली (जो बहुतों के पास है भी नहीं) साबित करने में नाकाम रहेगा, उसकी नागरिकता चली जाएगी. बयान में कहा गया है कि एनआरसी में जिसे भी अवैध माना जाएगा, उसमें मुस्लिमों को छोड़कर सभी को सीएए के तहत भारत की नागरिकता दे दी जाएगी.

इनका कहना है कि सरकार के घोषित मकसद के विपरीत, सीएए से प्रतीत नहीं होता है इस कानून का मतलब केवल उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को आश्रय देना है. उन्होंने श्रीलंका, चीन और म्यामां जैसे पड़ोसी देशों को सीएए से बहार रखने पर सवाल उठाया. बयान में कहा गया है कि क्या ऐसा इसलिए है कि इन देशों में सत्तारूढ़ मुसलिम नहीं हैं, ऐसा लगता है कि कानून का मानना है कि केवल मुसलिम सरकारें धार्मिक उत्पीड़न की अपराधी हो सकती हैं. इस क्षेत्र में सबसे अधिक उत्पीड़ित रोहिंग्या या उइगर हैं लेकिन उनको इस कानून से बाहर रखा गया है, ऐसा क्यों. इससे लगता है कि यह कानून केवल मुसलिमों को अपराधी मानता है, मुसलिमों को पीड़ित नहीं मानता है.

बयान के मुताबिक लक्ष्य साफ है कि मुसलमानों का स्वागत नहीं है. बयान में कहा गया है कि नया कानून न केवल सत्ता की ओर से धार्मिक उत्पीड़न को लेकर नहीं है, बल्कि असम, पूर्वोत्तर और कश्मीर में मूल निवासियों की पहचान और आजीविका के लिए भी खतरा है. इन लोगों ने कहा है कि वे इसे माफ नहीं करेंगे. बयान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय जैसे देश भर के विश्वविद्यालयों के छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई की भी आलोचना की गई. उन्होंने कहा कि पुलिस की बर्बरता ने सैकड़ों लोगों को घायल कर दिया है, जिसमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के कई छात्र शामिल हैं. विरोध करते हुए कई नागरिक मारे गए हैं. कई और लोगों को अस्थायी रूप से हिरासत में रखा गया है. विरोध को रोकने के लिए कई राज्यों में धारा 144 लगाई गई है. इन लोगों ने इसे सही नहीं माना है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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