मध्यप्रदेश में सरकार गिराने व बचाने का खेल जारी

Samachar Jagat | Friday, 20 Mar 2020 09:47:35 AM
44746829896357

मध्य प्रदेश में सरकार बचाने और गिराने की कवायद जारी है. अदालत के अंदर भी और बाहर भी भाजपा व कांग्रेस में रार भी है और तकरार भी. मामले की सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई. दलीलें दी गईं. दलीलों के जवाब दिए गए. भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी एक याचिका दाखिल की. याचिका पर बहस के दौरान कांग्रेस के वकील ने कहा कि राज्यपाल कैसे कह सकते हैं कि सरकार के पास बहुमत नहीं है.



loading...

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब छह विधायकों का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है तो विधानसभा स्पीकर ने क्या सभी 22 विधायकों पर अपने विवेक का इस्तेमाल किया है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मुद्दा यह है कि उन्होंने इस्तीफा दिया है इस पर स्पीकर को परीक्षण करना है. स्पीकर का कर्तव्य है कि वह यह जांचने के लिए बाध्य है कि क्या किसी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया है. स्पीकर को पहले इस्तीफा स्वीकार करना होगा. यह एक न्यायाधीश के इस्तीफे की तरह नहीं है, जहां वह अपने हाथों से इस्तीफा देता है. स्पीकर को खुद को संतुष्ट करना होगा.

इस बीच मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार बचाने के लिए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत वाले फॉर्मूले की भी चर्चा है. एक बार उनके खिलाफ भी उत्तराखंड के कांग्रेस विधायकों ने बगावत कर दी थी. विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत जैसे बड़े नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था. यह मामला भी कोर्ट पहुंचा था. लेकिन हरीश रावत ने सभी विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करवा दी थी और बाकी बचे विधायकों की संख्या के आधार पर बहुमत साबित कर दिया था. अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या कमलनाथ को हरीश रावत के अनुभव फायदा मिलता है या नहीं. यूं हरीश रावत का भी कहना है कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा नहीं है 

लेकिन सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड जैसे हालात हैं मध्य प्रदेश में. दरअसल यह मामला संवैधानिक तकनीकी से जुड़ा है. उत्तराखंड में बागी विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद हरीश रावत को दलबदल कानून का सहारा मिल गया था. लेकिन मध्य प्रदेश में बागी विधायक अभी भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं. इसलिए उनके ऊपर दलबदल कानून लागू नहीं होता है. राजनीतिक दांवपेंच का इस्तेमाल करके अगर कमलनाथ इन विधायकों सदस्यता रद्द करवा सकते हैं तो फिर मामला उत्तराखंड जैसा हो सकता है. वैसे कानूनविदों के मुताबिक राज्यपाल स्पीकर को आदेश नहीं दे सकता है और सदन में स्पीकर को अपने विवेक से फैसला लेने का अधिकार है.

मध्य प्रदेश विधानसभा में विधायकों के इस्तीफे से पहले 227 सदस्य हैं. इनमें कांग्रेस व सहयोगियों की तादाद 120 है और भाजपा के पास 107. लेकिन 21 विधायकों के इस्तीफे के बाद कुल (इनमें से सिर्फ छह इस्तीफे अभी स्वीकार हुए हैं) सदस्यों की तादाद 206 पहुंच जाएगी और बहुमत का नया आंकड़ा 104 हो जाएगा. इस आंकड़ें के तहत कांग्रेस व सहयोगियों को मिला कर तादाद 99 तक पहुंचती है, यानी बहुमत से पांच कम. भाजपा के पास 107 विधायक यानी बहुमत से तीन ज्यादा. मतलब ऐसी स्थिति में लड़ाई बहुत ही नजदीकी हो जाएगी और जैसा कि कांग्रेस नेता दावा कर रहे हैं कि उनके संपर्क में भी भाजपा के चार-पांच विधायक हैं तो शायद हरीश रावत की तरह कमलनाथ सरकार बचाने में कामयाब हो जाएं.

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह बंगलुरु में डेरा डाले हैं. वे कांग्रेस के बागी विधायकों से मिलने पहुंचे हैं. लेकिन उन्हें मिलने दिया गया और साथ ही हिरासत में ले लिया गया. हालांकि उनकी रिहाई भी हो गई. लेकिन सत्ता के लिए दांवपेच जारी है. कानून का भी सहारा लिया जारहा है और छल-प्रपंच का इस्तेमाल भी हो रहा है. देखना यह है कि आखिर मध्यप्रदेश में सरकार सत्ता बचाने में सफल रहती है या नहीं. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


loading...


 
loading...

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!




Copyright @ 2020 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.