फारूक अब्दुल्ला की रिहाई के सियासी मतलब

Samachar Jagat | Sunday, 15 Mar 2020 09:14:14 PM
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करीब सात महीने की नजरबंदी के बाद नेशनल कांफ्रेंस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया. वे पिछले साल अगस्त से ही नजरबंदी में थे. हालांकि अभी पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को रिहा नहीं किया गया है. वे भी नजरबंद हैं और उन पर भी पीएसए लगा दिया गया है. फारूक अबदुल्ला ने रिहाई के बाद कहा कि यह अधूरी रिहाई है. फिर उन्होंने नजरबंद बेटे उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से मुलाकात की.

नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने बीते सात महीने से हिरासत में रखे गए अपने बेटे उमर अब्दुल्ला से श्रीनगर की उप जेल में मुलाकात की. इस दौरान दोनों नेता भावुक नजर आए. पूर्व मुख्य मंत्री फारूक जनसुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत अपनी हिरासत खत्म होने के बाद शुक्रवार अपने आवास से नजदीक में ही हरि निवास पहुंचे जहां उनके बेटे व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को पीएसए के तहत पांच फरवरी से नजरबंद करके रखा गया है. इस दौरान दोनों नेताओं ने एक दूसरे को गले लगा लिया.

अधिकारियों ने कहा कि फारूक ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से सात महीने बाद अपने बेटे से मुलाकात का अनुरोध किया था, जिसे प्रशासन ने स्वीकार कर लिया. अधिकारियों ने कहा कि दोनों की मुलाकात करीब एक घंटे चली. केंद्र सरकार ने पिछले साल पांच अगस्त को तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य से विशेष दर्जा वापस ले लिया था, जिसके बाद फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को हिरासत में ले लिया गया था. इसके बाद 15 सितंबर को फारूक के खिलाफ पीएसए के तहत मामला दर्ज किया गया जबकि उनके बेटे उमर की ऐहतियातन हिरासत पांच फरवरी को खत्म हो रही थी लेकिन उससे कुछ ही घंटे पहले इसे छह महीने के लिएबढ़ा दिया गया था. 

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने रिहाई के बाद उन्होंने कड़ी सुरक्षा वाले गुपकार एवेन्यू स्थित अपने आवास के छज्जे से बाहर मौजूद रिपोर्टरों और समर्थकों से कहा कि वे आवाम के संघर्ष को संसद के भीतर जारी रखेंगे. फारूक अब्दुल्ला ने 2019 में श्रीनगर की लोक सभा सीट से चुनाव जीता था. पांच अगस्त को कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया और उन्हें दर्जन भर दूसरे नेताओं के साथ नज़रबंद कर दिया गया. बाद में उन पर पीएसए लगा दिया गया. सात महीने बाद पहली बार लोगों के सामने अपनी बात रखते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि अल्लाह का शुक्र है कि अब मैं एक आज़ाद नागरिक हूं. लेकिन ये आज़ादी दूसरे राजनेताओं के बिना अधूरी है. मैं तब तक कोई राजनीतिक बयान नहीं दूंगा जब तक कि उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती और दूसरे नेताओं को रिहा नहीं किया जाता. ऐसा कहा जा रहा है कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला को रिहा करने का फ़ैसला दिल्ली सरकार का कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों को बहाल करने की एक कोशिश है.

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की पार्टी से अलग हुए उनके पूर्व सहयोगी अल्ताफ़ बुखारी ने हाल ही में एक नई राजनीतिक पार्टी ‘अपनी पार्टी’ का गठन किया है जिसमें पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के असंतुष्टों को शामिल किया गया है. कश्मीर में सियासी तौर पर शून्यता के माहौल में एक नई पार्टी के वजूद में आने को पीडीपी और एनसी ने खारिज कर दिया है और इसे असल प्रतिनिधियों को हाशिए पर ले जाने की दिल्ली की एक तिकड़म बताया है.

बुखारी ने पिछले हफ्ते अपनी पार्टी के गठन के मौक़े पर इस पर ज़ोर दिया था कि वे जनमत सर्वेक्षण और स्वायत्ता के नाम पर झूठे वादे नहीं करेंगे. उनका इशारा फारूक और अलगाववादी नेताओं की तकफ था. माना जा रहा है कि बुखारी की नई पार्टी के गठन की वजह से ही फारूक अब्दुल्ला की रिहाई मुमकिन हो सकी है. कहा जा रहा है कि अपनी पार्टी से कश्मीर में राजनीति के लिए रास्ते खोलने की कोशिश है. जानकारी का कहना है कि मुमकिन है कि फ़ारूक़ ने बुख़ारी को एक ख़तरे की तरह देखा और दिल्ली को सहयोग का भरोसा दिया या फिर बुख़ारी का कश्मीर में राजनीति बहाल करने के मक़सद से इस्तेमाल किया गया है.

वैसे उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती और शाह फैसल सहित आधे दर्जन से ज़्यादा बड़े राजनेता अभी भी क़ैद में हैं. गृह मंत्रालय ने पिछले महीने संसद में एक लिखित जवाब में माना कि पांच अगस्त के बाद पांच हजार से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया. सरकार के मुताबिक़ उनमें से ज्यादातर लोगों को रिहा कर दिया गया है. आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि अभी भी करीब हजार लोग पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत बंद हैं. अब फारूक अब्दुल्ला के अगले कदम का इंतजार है. नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी दोनों ने ही केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 की धारा को हटाए जानेके फैसले को माना नहीं है. वे इसका विरोध जारी रखेंगे, या केंद्र के सामने समर्पण करेंगे, इस पर सबकी नजर है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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