कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पहला जत्था रवाना

Samachar Jagat | Monday, 11 Jun 2018 12:48:59 PM
The first batch will be left for Kailash Mansarovar Yatra tomorrow

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नैनीताल। विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह ने इस वर्ष की कैलाश मानसरोवर यात्रा के श्रद्धालुओं के पहले जत्थे को आज यहां से रवाना किया। पहले जत्थे में 60 श्रद्धालु शामिल हैं जो लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर पहुंचेंगे। यहां लिपुलेख दर्रे (उत्तराखंड) और नाथु ला दर्रे (सिक्किम) के जरिये पहुंचने के दो रास्ते हैं। सिंह ने बताया कि इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए 3734 आवेदन प्राप्त हुए थे। ड्रा के बाद करीब 1500 लोगों को यात्रा के लिए चुना गया।  भारत और चीन के बीच नब्बे के दशक से कैलाश मानसरोवर यात्रा का संचालन किया जा रहा है। तब से लेकर दोनों देशों के बीच लगभग लगातार कैलाश यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। 

यात्रा एजेंसी कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) के महाप्रबंधक जीएस मर्तोलिया ने बताया कि निगम की ओर से यात्रा को लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं। इस बार सबसे अधिक 18 दल जायेंगे। प्रत्येक दल में अधिकतम 60 यात्री शामिल होंगे। यात्रा आठ सितम्बर तक चलेगी। अंतिम दल आठ सितम्बर को वापस दिल्ली पहुंच जाएगा।

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मर्तोलिया के अनुसार यात्रा का पहला पड़ाव अल्मोड़ा होगा। इससे पहले केएमवीएन की ओर से काठगोदाम स्थित टीआरसी में श्रद्धालुओं का परंपरागत तरीके से भव्य स्वागत किया जाता है। निगम के साहसिक पर्यटन प्रबंधक जी.एस. मनराल के अनुसार यात्रा के दौरान सभी श्रद्धालु उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ ले सकेंगे। अगले दिन श्रद्धालु धारचूला अगले पड़ाव के लिए रवाना हो सकेंगे।

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उन्होंने बताया कि धारचूला कैलाश यात्रा का अंतिम बेस कैम्प होगा। यहां से श्रद्धालु लखनपुर तक वाहन से सफर कर सकेंगे और उसके बाद यात्रा का पैदल सफर शुरू हो जाएगा। मनराल के अनुसार इस बार केएमवीएन ने कैलाश यात्रियों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराने की योजना बनायी है। श्रद्धालु अपने पहले पैदल पड़ाव बूंदी में ठेठ ग्रामीण संस्कृति से परिचित होंगे। कुमाऊं मंडल विकास निगम ने पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यहां होम स्टे योजना को मूर्त रूप दिया है। यहां कैलाश यात्री ग्रामीण परिवेश का दीदार कर सकेंगे। ग्रामीणों द्बारा तैयार घरों में रहेंगे और पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद ले सकेंगे।

इसके अगले दिन यात्री अगले पैदल पड़ाव गुंजी के लिए रवाना हो जाएंगे। यहां यात्रियों को एक दिन आराम दिया जाता है। यहां से यात्री अति ऊंचाई वाले इलाके की ओर रवाना हो जाते हैं। 24 दिन की कठिन तपस्या के बाद यात्रियों की परिक्रमा पूरी हो पाती है। परवेज ने बताया कि जंगल के अन्य इलाकों में भी इस तरह के भोजनालय प्रस्तावित हैं। इसके लिए एक कार्ययोजना बनाकर काम किया जा रहा है। सोहेलवा वन जीव क्षेत्र 452 वर्ग किलोमीटर में फैला है। गिद्धों के भोजनालय बनने से इस प्रजाति के संरक्षण में मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के विश्लेषण के अनुसार डिक्लोफेनाक का पशु-चिकित्सा में उपयोग भारत में गिद्धों के लिए मुख्य खतरा है। डिक्लोफेनाक एक गैर-स्टेरॉयडल सूजन-रोधी दवा है। यह दवा पशुओं पर भी समान रूप से प्रभावी होती है। दवा बीमार पशुओं को दी जाती है। इससे उनके जोड़ों का दर्द कम हो जाता है और उन्हें अधिक समय तक कामकाजी बनाए रखता है। पशुओं में दर्द निवारक के तौर पर डिक्लोफेनाक का बड़े पैमाने पर प्रयोग भारत में गिद्धों की मौत की वजह माना गया है। भारत में गिद्धों की तेजी से कम होती आबादी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। देश में गिद्धों की आबादी 40 हजार से भी कम रह गई है।-एजेंसी 

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