हवा हुए कसमें वादे-गुम हो गई हरियाली

Samachar Jagat | Friday, 08 Jun 2018 01:37:39 PM
Air-swept windshield

संम्पदा निदेशालय ने महकमा बागान के तहत आने वाले बागों के अलावा उद्यान भवनों के बागों के प्रति भी रूचि दिखाई थी। जयपुर के बागों की तहरीर (लेखा) भी तैयार की गई, पर हरियाली के इन केन्द्रों को संजोकर नहीं रखा जा सका। इतिहास प्रसिद्ध जयपुर नगरी की हरियाली कायम रखते हुए इसको ‘ग्रीन सिटी’ बनाने का सपना भी कई बार देखा गया। कसमें और वादे भी किये गये, यहां तक कि जनवरी, 1998 में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय मेयर (महापौर) सम्मेलन में जयपुर के महापौर ने उक्त संकल्प को दोहराया था। लेकिन यह संकल्प नगर निगम के नवनिर्मित विशाल भवन के इर्दगिर्द ही सीमित होकर रह गया जहां बगीचा विकसित किया गया था। वहीं दूसरी दूसरी तरफ निर्मम विकास के नाम पर बाग-बगीचे टूटते गए और विशाल पेड़ कटते गये।

भवन निर्माताओं एवं मंदिर पुजारियों ने पुरातन हरे वृक्षों (पीपल, बरगद, नीम) को काट कर भवन मंजिलों का निर्माण करा लिया। इस सब के चलते जयपुर को ग्रीन सिटी का रूप (रुतबा) प्रदान करना काफी मुश्किलों से भरा हो गया। मतलब ग्रीन सिटी के वादे और इरादे हवाई हो गए और सपना अधूरा रह गया। शहर की हरियाली को लेकर चिन्तित शहर वासियों  ने गुलाबी नगर नागरिक विकास फोरम के माध्यम से एक बार अपनी बात उठाने की कोशिश की थी। 

उस बात का एक अंश इस प्रकार है ‘विरासत के जिस हिस्से की सौदेबाजी हुई है इस पर भी गौर करना होगा, साथ ही यह देखना होगा कि विकास का ऐसा कौनसा नमूना या प्रतिमान बन सकता है, जिस से प्रकृति जनित पर्यावरण से छेड़छाड़ किए बिना निर्माण हो सके। यह हरे भरे जयपुर को लेकर एक ऐसी टिप्पणी है जिस का जवाब पर्यावरण के प्रति जागरूकता का दम भरने वाले लोग और विभाग शायद तलाश करने में जुटे है।’

कल (रियासतकालीन) की बात को थोड़ा विश्राम  देते आज की तरफ रुख करते हैं। पर्यावरण प्रेमी महकमे गुलाबी नगर में हरित पट्टियांं और हरियाली विकसित करने के इरादे कई मर्तबा करते योजनाएं बना चुके हैं जो धरातल पर नहीं उतर के सिर्फ और सिर्फ हवाई ही साबित हुए।

नगर निगम के दस्तावेजों से पता चलता है कि वर्ष 1990 में तत्कालीन जयपुर नगर परिषद ने आतिश मार्केट में हरियाली, लोन और फव्वारे लगा कर ढाई सौ वर्ष पुराने ईसर बाग की याद ताजा करने की कोशिश की थी। जो नगर परिषद और महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट के मध्य की उलझन के कारण जयपुरवासी सदियों पुराने ईसर बाग की झलक देखने से महरूम रह गए।

बात अभी छह वर्ष पुरानी है, जयपुर-नगर निगम ने शहर की चार दीवारी में जहां उद्यानों के लिए जगह नहीं है पर छोटे-छोटे स्थान उपलब्ध हैं पर वहां बड़े-बड़े गमलोंं में वृक्षारोपण किए जाने की बात की। इसको ‘सुन्दर कोना’ योजना नाम दिया गया था। मकसद था चार दीवारी के लघु स्थानों (भूमि) को अतिक्रमण मुक्त कराने के साथ ही हरा भरा ओर सुन्दर रूप दिया जा सके। योजना यह भी थी कि शहर के प्रवेश द्वारों और फ्लाई ओवरों के नीचे के खाली स्थानों पर भी हरियाली विकसित की जाकर क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त बनाया जा सके पर यह दोनों योजनाएं केवल इरादों तक ही सीमित रह गई। दस वर्ष पूर्व जयपुर नगर निगम ने हरे भरे जयपुर के लिए घर-घर वृक्ष लगाने की घोषणा की थी, वो भी कागजी साबित हुई।

- रामस्वरूप सोनी
वरिष्ठ पत्रकार



 

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