दरकती विरासत: पहचान बचाने को जूझता जयपुर

Samachar Jagat | Friday, 07 Sep 2018 01:27:47 PM
Dakshati legacy: Jupta Jaipur to save identity

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जयपुर की विरासत की कोई परवाह नहीं करेगा तो सवाई जयसिंह की नगरी की मूल पहचान का क्या होगा। गुलाबी नगरी, छोटी काशी, और सवाई जयपुर के नाम से दुनिया में मशहूर इस नगरी के बारे में कौन जानता है कि भविष्य में इसे किस नाम से जाना जाएगा। यह एक शगूफा नहीं सच्चाई है भविष्य की जिसके बारे में नगर नियोजक समय-समय पर चेताते और टिप्पणी करते रहे हैं। इसके लिए एक नजीर (उदाहरण) ही काफी होगा।

भारत सरकार के अर्से तक नगर नियोजक और नगरीय कला आयोग के सदस्य रहे सैयद एस. शफी की दशकों पूर्व की गई टिप्पणी काफी होगी।जो उन्होंने जयपुर में आयोजित राष्ट्रीय  शहरी और ग्रामीण आयोजन कांग्रेस के 48 वें सम्मेलन के बाद  की थी। विषय था शहरी विकास आयोजन: नई शहस्त्राब्दी में चुनौती। सैयद शफी ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में गुलाबी नगर के बिगड़ते स्वरूप के बारे में अफसोस जाहिर करते कहा था कि जयपुर शहर ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहां इसे बचाने के लिए अब भी उचित फैसले नहीं किए गए तो नियोजन के लिए दुनिया में मशहूर यह शहर अपनी पहचान खो देगा। उन्होंने यहां तक कहा कि यह सोने की गिन्नी देने वाला शहर है, इसकी हत्या की जा रही है। दशकों पूर्व जाहिर यह अन्देशा लगातार सच साबित हो रहा है। योजना रहित विकास और विस्तार सुनियोजित, कलापूर्ण, सुन्दर और दर्शनीयनगर-जयपुर के सूरत और मीरत को हानि पहुंच रहा है। कहें तो इसके घर-चौवारे, गली मौहल्ले और चौराहे सदियों तक जिस की कला प्रियता के साथ ही सौंदर्य का बौध कराते गाथा गुनगुनाते रहे है, वो नियम विपरीत मनमाने तरीके से हो रहे निर्माणों की वजह अपने मूल रूप  को तलाशता नजर आ रहा है।

जयपुर देश और दुनियां के  इतिहासकारों का पसन्दीदा पाठय विषय रहा है, वहीं देशी और विदेशी पर्यटक अपने-अपने अन्दाज में इस की शान में कसीदे (गुणगाण) पढ़ते कलमबद्ध भी करते रहे हैं। लेकिन अब सूरते-हाल यह है कि पर्यटक जो अपने दिल-ओ-दिमाग में एक सुनियोजित नगर की छवि की तमन्ना के साथ आते हैं, वों यहां की बदरंगी और ढहती विरासत देखकर काफी निराश होते हैं। सच्चाई यह है कि अब ‘गुलाबी नगर’ तबारीख के सफों तक ही सिमट गई है, वहीं बाजारों के खूबसूरत कंगूरे भी अपनी शक्ल बदलते जा रहे हैं।

सवाई जयसिंह द्वितीय की ख्वाबों की नगरी की जो हालत बनती जा रहीहै, उसको देखते हुए पूर्व महाराजा और राज्य सभा के सदस्य रहे सवाई मानसिंह द्वितीय ने पांच दशक पूर्व (20वीं सदी के छटे दशक के शुरू में) शहर वासियों और शहरी महकमों को सचेत करने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था कि सैलानियों को आकर्षित करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि जयपुर जिस बात के लिए दुनिया में लंबे अर्से से मशहूर है उसे हर कीमत पर कायम रखना है। यह वास्तविक दर्द जो जयपुर के पूर्व राजघराने के उस मुखिया का था जिसने सवाई जय सिंह द्वितीय और सवाई रामसिंह द्वितीय के बाद जयपुर को संवारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- रामस्वरूप सोनी
वरिष्ठ पत्रकार

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