भीतर की पवित्रता शांति को जन्म देती है

Samachar Jagat | Tuesday, 07 May 2019 04:29:22 PM
Inner sanctity gives birth to peace

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इस पाश्चात्य संस्कृति ने सबसे अधिक यदि कोई नुकसान पहुंचाया है तो उसे व्यक्ति का निजी जीवन कहा जाएगा। आज के इस भागम-भाग की जीवनशैली में व्यक्ति ने अपना निजी जीवन लगभग खो सा दिया है। उसके समय का अधिकांश समय केवल धन और धंधे पर खर्च हो रहा है। उसके पास सामाजिक कार्यो में शामिल होने के लिए तनिक भी समय नहीं है, जबकि उसकी पहचान एक सामाजिक मनुष्य की है। समाज में क्या कुछ हो रहा है, मेरा समाज के लिए क्या योगदान हो सकता है तथा वह यह भी भूल जाता है कि उसका अस्तित्व भी समाज के कारण ही है। 

समाज की बात को चलें हम एक बार एक तरफ भी करें तो परिवार के लिए काम करना, परिवार को दिशा देना, परिवार के साथ सामंजस्य रखना, परिवार को आगे बढ़ाना और संस्कारों से समृद्ध करना भी व्यक्ति का एक प्रमुख दायित्व है। लेकिन अफसोस है कि आज संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार भी नहीं रह पा रहे हैं। 

माता-पिता जिन ऊंचे सपनों और ऊंची उम्मीदों के आधार पर अपने बच्चों को ऊंचाई पर ले जाने के लिए अपन सर्वस्व लुटाते हैं, भयंकर परेशानी उठाते हैं, अपने सपने अधूरे रख, संतान के सपने पूरा करने में जी जान से जीवन भर लगे रहते हैं लेकिन परिणाम की बजाय दुष्परिणाम ही सामने आता है, और उस दुष्परिणाम को देखकर विवश बुढ़ापा रोता है, बिलखता है। परिवार के नाम पर आज व्यक्ति अकेला है। सब कुछ सेपरेट हो गया हैं, और कितना सेपरेट होगा आदमी! पता नहीं।

अब जब बात निजी जीवन की आती है तो इसके बारे में जानकर-सुनकर निराशा ही हाथ लगेगी। अब आदमी अपनी आदमियत छोडक़र रोबोट हो गया, मशीन बन गया है अर्थात् यंत्रवत हो गया है। वह मशीन से भी तेज गति से दौड़ रहा है, मशीन से भी तेज गति से रखा रहा है अर्थात् उसकी गतिशीलता ने उसे मोबाइल बना दिया है। 

ऐसे में उसकी सोच शक्ति, तर्क शक्ति और कल्पना शक्ति में इतने विकार आ गए कि इससे उसके भीतर की पवित्रता ही भंग हो गई है। भीतर भारी उथल-पुथल मची हुई है और इसी उथल-पुथल के कारण वह सोचता कुछ और है, बोलता कुछ और है और करता कुछ और है। उसके सोचने-समझने-बोलने और करने में भारी अंतर देखने को मिलता है और यही कारण है कि यह भीतर से बिल्कुल अशांत है बेशक वह बाहर से दिखावे में हंस रहा हो। 
लगातार काम करते रहने से शरीर थक जाता है, इसके लिए विश्राम जरूरी है उसी प्रकार बाहर की चकाचौंद भी अशांति कर देती है ऐसे भी भीतर की शांति-पवित्रता जीवन में आनंद भर देगी।

प्रेरणा बिन्दु:- 
चुपके-चुपके रोने वाले
अपना आपा खोने वाले
बाहर-बाहर भाग रहे हैं
परेशान रहने वाले।



 

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