सीबीएसई के नतीजों में कई नए कीर्तिमान स्थापित

Samachar Jagat | Wednesday, 08 May 2019 04:33:08 PM
Many new records set out in CBSE's results

बीते सप्ताह गुरुवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं कक्षा के नतीजे घोषित किए गए जिसमें पांचवें साल भी बेटियों ने बाजी मारी है। यही नहीं इन नतीजों में कई नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। पहले स्थान पर संयुक्त रूप से दो विद्यार्थी सफल हुए है। दोनों ही लड़कियां है, वहीं दूसरे नंबर पर भी सफल तीनों लड़कियां है। इस परिणाम में टॉपर रही हंसिका शुक्ला का एक नंबर सिर्फ अंगे्रजी में कहा है। राजनीतिक विज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान और संगीत में उनके पूरे 100-100 नंबर है, वहीं करिश्मा का अर्थशास्त्र में एक नंबर कटा है। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब तीसरे नंबर पर 18 विद्यार्थियों ने कब्जा जमाया है। इनमें से 11 छात्राएं हैं। 

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ है कि इस बार रिकार्ड 28 दिन में परिणाम घोषित कर दिया गया। बोर्ड की चेयरमैन अनीता करवल ने बताया कि अब प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी से ही बोर्ड परीक्षाएं आयोजित की जाएगी। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की बारहवीं परीक्षा के परिणाम इस बार नई उम्मीद व उत्साह जगाने वाले हैं। खासकर इस मायनों में भी लड़कियां न केवल शीर्ष पर रही बल्कि उनका पास होने का कुल प्रतिशत भी लडक़ों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के इस परिणाम को सामाजिक बदलाव की आहट के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही इस अंतर की वजह भी तलाशी जानी चाहिए। जाहिर है यह आंकड़ा आगे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश व प्रतियोगी परीक्षाओं के अलावा नौकरियों में भी फर्क उत्पन्न करेगा। जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि शीर्ष पर भी दो लड़कियां ही है और उन्होंने 500 में से सिर्फ एक-एक अंक कम हासिल किया है। 

साथ ही 498 अंको के साथ दूसरी रैंकिंग भी लडक़ी ने ही हासिल की है। कुल मिलाकर लड़कियों ने परीक्षा में लडक़ों के मुकाबले 9 प्रतिशत बेहतर प्रदर्शन किया है। परीक्षार्थी भी पिछले साल के मुकाबले एक लाख अधिक रहे। इन परीक्षा परिणामों का एक उत्साहवर्धक पक्ष यह भी है कि केंद्रीय विद्यालय का परिणाम सबसे बेहतर रहा और इसके 95.5 फीसदी विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहे। दूसरे नंबर पर पिछड़े इलाकों के गरीब प्रतिभावान बच्चों के लिए खोले गए नवोदय विद्यालयों का परीक्षा फल रहा। यह सुखद संकेत है कि देश के दूरदराज के पिछड़े इलाकों के गरीब प्रतिभावान बच्चों के लिए खोले गए नवोदय विद्यालयों का परीक्षा फल रहा। 

यह भी सुखद संकेत है कि देश के दूरदराज पिछड़े इलाकों में शिक्षा के प्रति गंभीरता का जुनून बढ़ रहा है। निजी स्कूलों का भी तीसरे नंबर पर आना भी यह निष्कर्ष देता है कि खर्चीली शिक्षा प्रणाली व बाहरी चमक दमक बेहतर परीक्षा परिणामों की गारंटी नहीं है। इसी तरह महानगरों के मुकाबले ग्रामीण व छोटे शहरों का परीक्षा परिणाम बेहतर होना भी सुखद संकेत है। 

लेकिन इसके साथ ही फिर पुराने सवाल सामने आते हैं कि क्या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के मूल्यांकन का पैमाना इतना वैज्ञानिक व प्रामाणिक है कि छात्र 500 में से लगभग, पूरे-पूरे अंक हासिल कर लें? एक बात तो यह है कि विज्ञान व गणित में तो सोचा जा सकता है कि इन विषयों की पद्धति व प्रश्नों के उत्तर विज्ञान सम्मत होते हैं, जिसमें संभवत: पूरे-पूरे अंक आने की संभावना होती है। मगर साहित्य व मानविकीय के अन्य विषयों में शत प्रतिशत अंक पाना कैसे संभव है? इन विषयों की अभिव्यक्ति में मूल्यांकन के दौरान यह संभव नहीं है कि हर छात्र ने जो उत्तर दिए हो वे मानकों की दृष्टि से उच्च कोटी के हों। 

दरअसल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के परीक्षा परिणामों का प्रतिशत उच्च शिक्षा व रोजगारपरक संस्थानों में दाखिले की अंकों की सीमा का निर्धारण करता है। जो दूरदराज के इलाकों से आने वाले प्रतिभावान विद्यार्थियों के लिए अन्याय जैसी स्थिति पैदा करता है। दरअसल राज्यों के बोर्डों का परीक्षा फल की प्रतिशत हमेशा की तरह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मुकाबले बहुत कम होता है। नि:संदेह इन स्कूलों का स्तर भी बेहतर नहीं होता और शिक्षा व्यवस्था भी तमाम खामियों से जूझ रही है। फिर नंबर देने में ऐसी उदारता नहीं दिखाई जाती जैसे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में उत्तर पुस्तिकाओं को जांचने में दिखाई जाती है। 

जिसका दंश उन्हें जीवन पर्यन्त झेलना पड़ता है। ऐसे में देश के नीति नियंताओं को इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश में शिक्षा पद्धति में यह विसंगति कैसे दूर की जाए। हालांकि पिछले कुछ सालों से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के नतीजों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं क्योंकि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की तुलना में राज्यों के शिक्षा बोर्डों के नतीजे काफी नीचे दर्ज होते हैं। इसकी कुछ वजहें तो साफ है। एक तो यह कि राज्य बोर्डों के तहत चलने वाले स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं हो पाए है। इसका नतीजा यह होता है, जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में जब दोनों बोर्डों के बच्चे साथ बैठते हैं तो राज्य बोर्डों के बच्चे कमजोर साबित होते हैं। 

इस तरह राज्यों के बोर्ड से पढ़े अनेक होनहार बच्चे भी बेहतर माने जाने वाले शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाने से रह जाते हैं। इस तरह परीक्षा परिणामों के आधार पर समाज में शिक्षा की दो स्पष्ट धाराएं बन गई है। फिर यह सवाल कई सालों से उठ रहा है कि क्या वजहें है कि विद्यार्थी साहित्य तक के पर्चे में पूरे के पूरे अंक हासिल कर ले रहे हैं। एक-दो नंबर कम पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी अधिक होती है। साहित्य और समाज विज्ञान के विषयों में जहां बोध और अभिव्यक्ति के प्रश्न होते है, उनमें महज एकाध नंबर कटना स्वाभाविक रूप से मूल्यांकन पद्धति पर सवाल खड़े करता है। हालांकि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का दावा है कि उनकी मूल्यांकन पद्धति बहुत वैज्ञानिक है और उसकी पुस्तिकाएं जांचने वाले देश भर के योग्य, प्रशिक्षित अध्यापक होते हैं।

मगर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि साहित्य और समाज विज्ञान के बोध प्रश्नों का मूल्यांकन करते समय वे अकाट्य तर्क रखते होंगे। इन सब स्थितियों के मद्देनजर राज्यों के शिक्षा बोर्डों को भी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की तरह नंबर देने में उदारता दिखानी होगी ताकि राज्यों के बोर्डों में पढ़ने वाले होनहार, प्रतिभावान छात्र उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने में सफल हों।



 

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