फंसे कर्ज वसूली के नए नियम

Samachar Jagat | Friday, 14 Jun 2019 03:22:54 PM
New rules for seized debt recovery

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फंसे कर्ज यानी एनपीए की पहचान के लिए बीते सप्ताह शुक्रवार को नए नियम जारी किए हैं। इन नियमों के तहत बैंकों को कर्ज आदयगी में पहली चूक के 30 दिन के भीतर उसे खाते को संकटग्रस्त खाते के रूप में जिक्र करना जरूरी होगा। इससे पहले फरवरी 2018 में जारी परिपत्र के तहत एक दिन की चूक पर भी खाते को एनपीए घोषित कर समाधान की कार्रवाई शुरू करना जरूरी कर दिया गया था। इससे पहले 12 फरवरी 2018 में जारी परिपत्र के तहत एक दिन की चूक पर भी खाते को एनपीए घोषित कर समाधान की कार्रवाई शुरू करना अनिवार्य कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी के परिपत्र को रिजर्व बैंक के अधिकार के बाहर बताते हुए उसे खारिज कर दिया था। 

रिजर्व बैंक ने कहा कि नई व्यवस्था कर्ज समाधान की पहले से चल रही सभी योजनाओं का स्थान लेगी। नई व्यवस्था तत्काल लागू हो गई है। फिलहाल अवरुद्ध कर्ज खातों के समाधान के लिए संकटग्रस्त संपत्तियों को पुनर्जीवित करने की कॉर्पोरेट कर्ज पुनर्गठन योजना मौजूदा दीर्घकालिक परियोजना कर्जों का लचीला ढांचा, रणनीतिक कर्ज पुनर्गठन योजना (एसडीआर) और फंसी हुई संपत्ति का सतत पुनर्गठन (एस4ए) शामिल है। रिजर्व बैंक के नए दिशा-निर्देश से यह उम्मीद बनती है कि इस दिशा में अब कुछ कामयाबी मिलेगी। कर्जदारों से कुछ तो पैसा वसूल होगा, भले ही पूरा न हो पाए। बैंकों का तेजी से बढ़ता एनपीए वित्तीय क्षेत्र की सबसे गंभीर समस्या बना हुआ है। जब-तब जो आंकड़े आते रहे हैं, वे चौंकाने वाले रहे हैं। कभी 8 लाख करोड़ तो कभी 10 लाख करोड़। अभी भी मौटे तौर पर माना जा रहा है कि एनपीए का आंकड़ा 10 लाख करोड़ रुपए के ऊपर ही है। जाहिर है, बैंकों का 10 लाख करोड़ रुपए फंस हुआ है कर्जदारों के पास। यह वह रकम है, जिसे वसूल पाने में बैंक नाकाम रहे हैं। 

एनपीए की इस समस्या ने बैंकिंग क्षेत्र की सेहत खराब करके रख दी है। ज्यादातर बैंकों की माली हालात संतोषजनक नहीं है। पिछले साल कुछ बैंक तो कर्ज दे पाने तक की स्थिति में नहीं रह गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बढ़ता एनपीए बैंकों को किस कदर कमजोर कर रहा होगा। बैंकिंग क्षेत्र की बिगड़ती हालत से अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रहती है। ऐसे में सबसे जरूरी है बैंकों का फंसा हुआ पैसा निकले, भले पूरा नहीं निकल पाए, लेकिन जितना बैंक वसूल लें वही उनके फायदे का सौदा होगा। रिजर्व बैंक ने कहा है कि इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद भी वह खुद ब खुद बैंकों को कज न चुकाने वाली कंपनी के खिलाफ दिवाला कानून के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दे सकता है। 

रिजर्व बैंक का नया परिपत्र फंसे कर्ज की जल्द पहचान, उनकी सूचना देने और समयबद्ध समाधान की रूपरेखा प्रदान करता है। रिजर्व बैंक ने एनपीए की वसूली के लिए अब जो नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वे कर्जदारों के लिए जरा राहत भरे है। अब बैंकों को चूककर्ताओं यानी डिफॉल्टर की पहचान के लिए 30 दिन का वक्त दिया गया है। अब बैंक खुद ही यह तय कर सकेेंगे कि किसी डिफॉल्टर के साथ उन्हें क्या करना है? कुल मिलाकर इस कवायद का मकसद यही है कि कर्जदार को जरा मौका दिया जाए ताकि वसूली का रास्ता बंद न हो। वरना ज्यादातर मामले कानूनी जाल में फंस जाते हैं और कर्ज वसूली की संभावनाएं क्षीण हो जाती है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि कर्ज देने वाले बैंकों या वित्तीय संस्थानों को कर्ज वसूली में दिक्कत शुरू होते ही उसको विशेष उल्लेख वाले खाते (एसएमए) के रूप में वर्गीकृत करना होगा। यदि कोई बैंक, वित्तीय संस्थान, सुक्ष्म वित्त बैंक या एनबीएफसी किसी कर्जदार के कर्ज भुगतान में करने की सूचना देता है तो सभी कर्जदाताओं को 30 दिन के भीतर उसकी समीक्षा करनी होगी। इस अवधि में कर्जदाता उस खाते के समाधान की रणनीति पर फैसला कर सकते हैं। 

इसमें समाधान योजना (आरपी) की प्रकृति और योजना के क्रियान्वयन के लिए दृष्टिकोण शामिल होंगे। यहां यह बता दें कि कर्जदारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो मामले को कानूनी जाल में फंसाकर उसका फायदा उठाता है और लंबे समय तक मामले को लटकाए रखना चाहता है। हालांकि सभी कर्जदार ऐसा करते हैं, यह कहना भी उचित नहीं है। मामले को कानूनी जाल में फंसाकर लटकाए रखने वालों के कारण ही एनपीए बढ़ा है। कई बड़ी परियोजनाएं फंसे कर्ज की रकम तो इसीलिए नहीं निकल पा रही है कि कई कारणों से परियोजनाएं ठप हो गई है और पैसा फंस गया है। इनमें बिजली और ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाएं ज्यादा है।

रिजर्व बैंक ने नए परिपत्र में कहा है कि समीक्षा के दौरान जिन मामलों के समाधान योजना लागू की उनमें सभी कर्जदाताओं को आपस में एक समझौता (आईसीए) करना होगा। इससे एक से ज्यादा संस्था से कर्ज लेने वाली इकाई के मामलों में समाधान योजना को तय कर उसे लागू करने में बुनियादी मदद मिलेगी। बैंक या वित्तीय कर्जदाता वसूली या दिवाला कानून के तहत कर्ज समाधान के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू करने को स्वतंत्र होंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि बढ़ते एनपीए से चिंतित रिजर्व बैंक ने पिछले साल बैंकों पर सख्ती की थी और एनपीए वसूली के कड़े निर्देश जारी किए थे।

 रिजर्व बैंक न साफ कहा था कि अगर कोई कंपनी बैंक का कर्ज चुकाने में एक दिन भी चूक जाती है, तो उसे एनपीए मानते हुए बैंक 180 दिन के भीतर यानी 6 माह के अंदर उसका समाधान करे, अन्यथा यह मामला दिवालिया कोर्ट में जाएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जैसा कि ऊपर बताया गया है, इस साल इस केंद्रीय बैंक के उस निर्देश को रद्द कर दिया। इसके बाद ही केंद्रीय बैंक ने नए दिशा-निर्देश जारी किए। अभी ये निर्देश 2 हजार करोड़ और इससे ज्यादा के कर्जों पर लागू होंगे। अब जिम्मेदारी कर्ज देने वाले बैंकों पर ज्यादा होगी, क्योंकि वसूली के अधिकतम विकल्प उन्हें ही रखने होंगे। जैसे भी हो, बिना किसी कानूनी झंझट के और जल्दी ही बकाया की वसूली हो, बैंकों को यह प्रयास करना होगा।



 

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