दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकना असंवैधानिक

Samachar Jagat | Thursday, 30 Aug 2018 11:19:52 AM
Preventing tainted leaders from contesting elections, unconstitutional

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केंद्र सरकार ने कहा है कि दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से वंचित करना असंवैधानिक और गैर कानूनी होगा क्योंकि संविधान में यह प्रावधान है कि दंडित ठहराए जाने तक व्यक्ति बेकसूर माना जाता है। अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ के एक सवाल के जवाब में यह कहा।

 सुप्रीम कोर्ट आरोपित नेताओं को चुनाव लड़ने से वंचित करने के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ ने सवाल किया था कि चुनाव आयोग खुद फार्म-6 ए में यह अतिरिक्त प्रावधान कर संकल्प है कि यदि पार्टी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को चुनाव में उतारेगी तो उसे पार्टी के सिंबल नहीं दिया जाएगा। अटार्नी जनरल ने कहा कि आयोग को ऐसा करने का अधिकार नहीं है। नेताओं के अयोग्यता के बारे में संविधान व जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 में विस्तृत प्रावधान है। इनके अतिरिक्त किसी और अन्य माध्यम से उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में कोई आदेश नहीं दे सकता क्योंकि जो कानून में नहीं है उसे न्यायिक आदेश के जरिए नहीं करवाया जा सकता है। 

यहां यह बता दें कि राजनीति में अपराधियों का प्रवेश रोकने को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर चिंता जताई है। इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान समय-समय पर शीर्ष अदालत ने सुझाव भी दिए हैं। लेकिन यह कवायद अब तक इसलिए रंग नहीं ला पाई है क्योंकि उसके पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सरकार का रुख भी अटार्नी जनरल के जवाब से सामने आ गया है। बीते सप्ताह मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने साफ कहा कि राजनीति में अपराधीकृत सड़ांध का रूप ले चुका है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी हालात की गंभीरता बताने के लिए पर्याप्त है। अब अदालत ने साफ कहा है कि उसे इस बारे में चुनाव आयोग का सहारा लेना पड़ेगा। संविधान पीठ चुनाव आयोग को निर्देश देकर कह सकता है कि वह राजनीतिक दलों से अपने निर्वाचित सदस्यों का आपराधिक रिकार्ड उजागर करने को कहे। सभी मतदाताओं केा पता चलेगा कि किस दल में कितने दागी जनप्रतिनिधि है, जिन्हें उम्मीदवार नहीं होना चाहिए था। 


जाहिर है उससे राजनीतिक दलों पर भी एक दबाव बनेगा। चुनावी राजनीति में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं का प्रवेश तभी रोका जा सकता है, जब राजनीतिक दल खुद इसके लिए पहल करे। लेकिन हैरान करने वाली और दुखद बात यह है कि राजनीतिक दलों की ओर से अब तक ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ। किसी भी दल ने ऐसा साहस नहीं दिखाया जो अपराधियों को चुनावी राजनीति में आने से रोकने की पहल करता हो, बल्कि ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल खुद नहीं चाहते कि चुनावी राजनीति में अपराधियों को आने से रोका जाए। प्राय: सभी राजनीतिक दलों की यह नियत रहती है कि चुनाव जीतने वाला व्यक्ति होना चाहिए भले ही व किसी भी पृष्ठभूमि का रहा हो। अक्सर यह देखने में आता है कि अगर राजनीति में अपराधियों के प्रवेश रोकने की कोई बात या सुझाव आता है तो उसमें संवैधानिक कानूनी नुक्ते निकाल कर उससे बचने के तरीके खोज लिए जाते हैं। शीर्ष अदालत में अटार्नी जनरल ने सरकार का जो रुख प्रस्तुत किया है, उससे तो यह बात और स्पष्ट हो जाता है।

 अटार्नी जनरल ने भी संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 का सहारा लिया है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर एक तरह से सारे दलों की भीतरी सांठगांठ नजर आती है। इस विषय पर चर्चा तो बहुत होती है, कोई भी दल राजनीति में अपराधियों के प्रवेश पर रोक लगाने का बीड़ा उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता है। इसी का नतीजा है कि चुनावी राजनीति में हत्या, हत्या की कोशिश और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों तक में शामिल नेताओं का रूतबा कायम है। ऐसे लोग अपने धन बल और बाहुबल के बूते राजनीति में दबदबा रखते हैं। राजनीतिक दल भी केंद्र सरकार की तरह यही दलील देते आए हैं कि जब तक कोई आरोपी दोषी करार नहीं दिया जाता, उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। दागदार नेता भी इसी का फायदा उठा रहे हैं क्योंकि लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया के चलते मुकदमों के निपटान बरसों गुजर जाते हैं और आरोपी के लिए दोषी साबित नहीं होने तक चुनाव लड़ने और संसद व विधानसभाओं में पहुंचने का रास्ता खुला रहता है। 

यहां यह बताने में कतई संकोच नहीं है कि सन् 2009 में 30 फीसदी लोकसभा सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। 2014 में यह आंकड़ा बढक़र 34 फीसदी हो गया। इस तरह वर्तमान लोकसभा में एक तिहाई सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि मौजूदा लोकसभा में तीन सांसद ऐसे हैं, जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज है। सवाल यह है कि जिस लोकसभा में एक तिहाई सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हो और अपने दलों को उन्हें पूरा संरक्षण हासिल हो तो ऐसे नेता और दल कैसे कठोर कानून बननें देंगे।

 सुप्रीम कोर्ट के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है। यह भारतीय राजनीति की त्रासदी है कि उसमें शायद ही कोई ऐसा दल हो जो दागदार नेताओं से सुशोभित न हो रहा हो। अगर ऐसा कठोर कानून बन जाए जो आपराधिक मामले दर्ज होने वालों के लिए चुनाव लड़ने के रास्ते बंद कर सके, तो हमारी संसद और विधानसभाएं दागदार चेहरों से मुक्त हो सकती है। जाहिर है ऐसा कानून संसद को ही बनाना है। हालांकि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते इस तरह के कानून के दुरूपयोग की आशंका बनी रहेगी। लेकिन सिर्फ इस वजह से राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए जगह बनाए रखने को सही नहीं कहा जा सकता है।

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