लेन-देन बीस फीसदी बढ़ा पर कम हो गए एटीएम

Samachar Jagat | Tuesday, 21 May 2019 10:56:51 AM
Reduced ATMs by 20% increase in transactions

देश में एटीएम से लेन देन तेजी से बढ़ा है, पर इनकी संख्या में दो-तीन साल में घट गई है। इससे शहरों के साथ कस्बों के लोग भी परेशान है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डाटा पर आधारित ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। बैंकों का कहना है कि आरबीआई के कड़े नियमों से एटीएम का संचालन महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में एटीएम की संख्या मार्च 2017 में 2 लाख 30 हजार के करीब थी, जो अब करीब 10 हजार घट गई है। विकसित देशों की तो बात छोड़ दें, ब्रिक्स देशों में भी तुलना करें, प्रति लाख लोगों में भारत में एटीएम की संख्या काफी कम यानी महज 22 है।

रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि एटीएम की संख्या आने वाले वक्त में और तेजी से घट सकती है। आरबीआई के दिशा-निर्देश के बाद हैकिंग रोकने के लिए सिस्टम में नए साफ्टवेयर लगाने और उपकरणों को अपग्रेड करने की लागत काफी बढ़ गई है। एटीएम प्रदाता कंपनी हिताची पेमेंट सर्विसेज के एमडी का कहना है कि इससे उन गरीबों की दिक्कतें होंगी, जो नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग या वॉलेट का इस्तेमाल करने में असमर्थ है। दरअसल एटीएम संचालक (बैंक और थर्ड पार्टी) एटीएम से डेबिट-क्रेडिट कार्ड के जरिए निकासी में 15 हजार का इंटरचेंज शुल्क ग्राहक के बैंक से वसूलते है, लेकिन लागत बढ़ने से यह रकम एटीएम चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 साल में मोबाइल बैंकिंग लेन देन 65 गुना बढ़ गया है। 

2018 में एटीएम की संख्या 2.3 लाख से घटकर 2.2 लाख रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार इसकी वजह जो बताई गई है, उसके अनुसार पहला-सबसे बड़ा कारण बैंकों में फंसा कर्ज बढ़ने के बाद खर्च में कमी के लिए एटीएम घटाए या बढ़ाए नहीं। दूसरा-नए सुरक्षा फीचरों में एटीएम की लागत बढ़ी, लेकिन बैंक इसके लिए तैयार नहीं है। तीसरा-थर्ड पार्टी एटीएम चलाना भी महंगा हुआ क्योंकि छोटे लेन देन से इनको नुकसान हो रहा है। चौथा-बड़ा कारण है बैंकों की चार हजार शाखाएं घटने सभी वहां संचालित एटीएम बंद करने पड़े हैं देश भर में। इस बारे में बैंकों का कहना है कि डिजिटल लेन देन बढ़ने से एटीएम की जरूरत कम हो रही है। 

लोग वॉलेट, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग पर जोर ज्यादा दे रहे हैं। मोबाइल बैंकिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। 2016-17 में जहां 110 करोड़ थी वह 2017-18 में बढक़र 190 करोड़ हो गई और 2018-19 में यह 610 करोड़ तक पहुंच गई है। रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर. गांधी के अनुसार इंटरचेंज शुल्क एटीएम के विस्तार में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरा है। बैंक दूसरे बैंक को इंटरचेंज फीस चुकाने में ज्यादा फायदे में रहते हैं, बजाए अपना खुद का एटीएम चलाने के। यही जमीनी हकीकत है। यहां यह बता दें कि फंसे कर्ज में बढ़ोतरी के बाद बैंकों ने खर्चों में कटौती करने के तहत तमाम शाखाएं खत्म कर दी है या उनका दूसरे में विलय कर दिया है। अकेले एसबीआई ने वित्तीय वर्ष 2018 में एक हजार शाखाएं कम की है। 

बैंकों का तर्क है कि डिजटलीकरण बढ़ने के साथ ग्राहकों की शाखा पर निर्भरत कम हो रही है। तमाम बैंकों के तो शाखाओं पर ही एटीएम है और शाखाएं बंद होने से भी ये बंद हो गए। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में 2014 के बाद 36 करोड़ जनधन खाते खुले हैं और करीब 25 करोड़ रूपे कार्ड जारी किए गए हैं। ऐसे में सरकार की तमाम योजनाओं से लाभान्वित होने वाले गरीबों या इंटरनेट इस्तेमाल न करने वालों के लिए एटीएम धन निकासी का बड़ा जरिया है। उन लोगों को अभी कई किलोमीटर दूर बैंक का चक्कर लगाना पड़ता है।



 

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