अफवाहों पर लगाम के निर्देश

Samachar Jagat | Tuesday, 10 Jul 2018 11:10:58 AM
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केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों से सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों के बाद भीड़ द्वारा पीटकर मार डालने की घटनाओं पर लगाम लगाने को कहा है। इस बारे में गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह गुरुवार को एक परामर्श जारी किया है। यहां यह बता दें कि बीते दो महीनों में बच्चा चोरी के संदेह में देश भर में 20 से अधिक लोगों की हत्या हो चुकी है। ताजा मामला महाराष्ट्र के धुले जिले का है। जहां भीड़ ने पांच लोगों की पीटकर जान ले ली। गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से बच्चा चोरी की अफवाहों पर नजर रखने और उन्हें रोकने के लिए असरदार उपाय शुरू करने को कहा है। गृह मंत्रालय ने राज्यों से अफवाह फैलाने वाले इलाकों की पहचान करने को कहा है। 

ऐसे इलाकों में अफवाह रोकने की जागरूकता फैलाने तथा विश्वास बहाल करने का निर्देश दिया है। निर्देश में बच्चों की चोरी के मामलों की गंभीरता से लेने और उचित ढंग से जांच करने को कहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी परामर्श से दो दिन पहले केंद्र सरकार ने व्हाट्सऐप की गैर जिम्मेदार एवं बवाल मचाने वाले संदेशों को फैलाने से रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया था। उसके बाद व्हाट्सऐप ने अफवाहों को रोकने के लिए अलग से सुरक्षा फीचर बनाने का वायदा किया है। बच्चा चोरी की अफवाहों के चलते मणिपुर और गुजरात में भीड़ ने तीन लोगों की पिटाई कर दी। एक घटना मणिपुर के कंगपोकपी जिले में हुई, वहीं दूसरी घटना गुजरात के राजकोट जिले में सामने आई है। 

महाराष्ट्र पुलिस ऐसी घटनाओं पर अंकुश के लिए प्रयास कर रही है। विशेष पुलिस महानिरीक्षक (साइबर अपराध) के अनुसार व्हाट्सऐप नंबर जारी किए गए हैं, जहां लोग मदद लेने के लिए संदेश भेज सकते हैं। महाराष्ट्र के धुले जिले में बच्चा चोरी के संदेह में भीड़ द्वारा पांच व्यक्तियों को पीट-पीटकर हत्या के मामले में मुख्य आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। धुले के पुलिस अधीक्षक के अनुसार 22 वर्षीय महारू पवार को पड़ोसी नंदुरबार जिले में गिरफ्तार किया गया है। महारू घटना के बाद से फरार था। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने बच्चा चोरी की अफवाह में भीड़ द्वारा लोगों की जान लेने की वारदातों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बताया है।

 उन्होंने कहा कि घटनाएं राज्य सरकार के खिलाफ काम करने वाली ताकतों द्वारा निर्देशित एक सोची समझी रणनीति है। बिप्लब ने वारदातों को अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र करार दिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह मंगलवार को ही हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने गोरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा की गई हिंसा को अपराध बताया और कहा कि चाहे इसका कुछ भी उद्देश्य हों। हिंसा करने वालों पर अंकुश लगाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। अदालत ने इस पर विस्तृत दिशा निर्देश जारी करने की बात कही है। केंद्र ने अब बच्चा चोरी की अफवाह पर लोगों की जान लेने की घटनाओं पर लगाम लगाने का परामश जारी किया है। दरअसल सोशल मीडिया मंचों के जरिए फैलाई जाने भ्रामक सामग्री और अफवाहों को लेकर सरकार की चिंता स्वाभाविक है। 

इन मंचों का दुरूपयोग किस खतरनाक हद तक पहुंच चुका है यह इसी से समझा जा सकता है कि व्हाट्सऐप और फेसबुक पर वायरल हुई फर्जी सूचनाओं व संदेशों के कारण हाल में कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। इन घटनाओं के मद्देनजर सरकार ने उचित ही जैसा कि पूर्व में कहा गया है, व्हाट्सऐप को नोटिस जारी किया था। सरकार ने कहा था लोगों को भडक़ाने वाले फर्जी संदेशों के आदान-प्रदान में व्हाट्सऐप का दुरूपयोग अस्वीकार्य है, इसलिए अमर्यादित और नफरत फैलाने वाले संदेशों को रोकने के लिए व्हाट्सऐस तत्काल कदम उठाए, व्हाट्सऐप अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। यहां यह उल्लेखनीय है कि व्हाट्सऐप विश्व के सबसे बड़े मैसेजिंग प्लेटफार्मों में से एक है। 

भारत में इसके 20 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता है और भविष्य में यह संख्या और बढ़ेगी ही। व्हाट्सऐप ने सूचनाओं व छवियों और तस्वीरों के आदान-प्रदान से लेकर मनोरंजन तक एक बहुत आसान, सर्वसुलभ और तुरंत माध्यम के रूप में अपनी बेजोड़ जगह बना ली है। व्यक्तियों के स्तर पर तो इसका बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो ही रहा है, समूह बनाने तथा सामूहिक विचार-विमर्श और सामूहिक गतिविधियां चलाने में भी यह मददगार साबित हुआ है। पर किसी ने सोचा न होगा कि व्हाट्सऐप का जानलेवा इस्तेमाल भी हो सकता है। बेशक इसके लिए सिर्फ व्हाट्सऐप को दोष नहीं दिया जा सकता। हमारे समाज में जो गैर जिम्मेदारी, नागरिक बोध का अभाव, प्रतिशोध की भावना, नफरत फैलाने वाले निहित स्वार्थों की जैसी सक्रियता मौजूद है, उसकी अभिव्यक्ति सोशल मीडिया मंचों पर भी होती रहती है। जब सूचना के माध्यम सीमित थे तो हर स्तर पर यह प्रबंध किया जा सकता था कि वे छनकर ही यानी प्रामाणिक होने पर ही लोगों के सामने आए। 

लेकिन जहां हर व्यक्ति सूचना प्रदाता और सूचना प्रसारक हो, वहां प्रामणिकता की छानबीन बहुत मुश्किल हो गई है। इसलिए सोशल मीडिया के मंच सूचना से ज्यादा झूठ, अर्धसत्य, भ्रम, अफवाह, चरित्र हनन और विद्वेष फैलाने के माध्यम बन रहे हैं। ऐसे में इस पर रोक लग सकती है क्या, यह प्रश्न खड़ा हो गया है। इधर व्हाट्सऐप का कहना है कि इसके लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है। इसके लिए सरकार, नागरिक समूहों और प्रौद्योगिक मंत्रालय को मिलकर काम करना पड़ेगा।

 यहां यह बता दें कि खुद व्हाट्सऐप कुछ तकनीकी उपाय करने जा रहा है, उससे पता चलेगा कि किसी ने कब संदेश लिखा और कब भेजा, संदेश भेजने वाले ने खुद लिखा या अफवाह फैलाने के लिए भेजा गया है। दरअसल उपयोग करता संदेश या सूचना को लेकर सतर्कता बरतें, इसके लिए तकनीकी चिन्ह और उपाय विकसित किए जा सकते हैं। लेकिन जहां संगठित और सुनियोजित रूप से झूठ और विद्वेष फैलाया जाता हो, वहां कार्रवाई को लेकर सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। साथ ही इसके लिए सतर्कता और जन जागरण जरूरी है।

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