केंद्रीय बोर्ड परीक्षा में नंबरों की बौछार-राज्य बोर्डों में अंकों का अकाल

Samachar Jagat | Saturday, 11 May 2019 04:13:42 PM
Shows of numbers in Central Board Examination - Drought marks in State Boards

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भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पढ़ाई में शुरू से ही हमेशा तेज रहे और परीक्षाओं में उन्होंने हमेशा टॉप किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने लॉ की बीएलए परीक्षा में 75 फीसदी नंबर हासिल किए। परीक्षक ने उनकी कॉपी जांचने के बाद लिखा कि ‘‘परीक्षार्थी-परीक्षक से भी ज्यादा जानता है।’’ यह संदर्भ इसलिए याद आया क्योंकि वर्तमान में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं और 10वीं की परीक्षाओं में छात्रों के अंकों में जिस प्रकार की मूसलाधार बरसात हुई है, वह न केवल अद्वितीय और अभूतपूर्व है, बल्कि अजीब भी है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और उसके बाद भी दशकों तक 60 प्रतिशत अंक आने पर प्रथम श्रेणी और 75 प्रतिशत अंक आने पर विशिष्ट श्रेणी मानी जाती थी। 

अब तो शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की भरमार है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 12वीं परीक्षा में दो छात्राओं ने 500 में से 499 अंक प्राप्त किए हैं। जबकि सोमवार को 10वीं की परीक्षा के आए नतीजों में पहली बार 13 मेधावियों ने एक साथ शीर्ष स्थान पर कब्जा किया है, जिन्हें 500 में से 499 अंक मिले हैं। यह अच्छी बात है कि 12वीं और 10वीं की परीक्षाओं में बेटियों ने बाजी मारी है। इन नतीजों में केंद्रीय विद्यालयों का परीक्षा परिणाम सबसे बेहतर रहा है और 12वीं की परीक्षा में 95.5 फीसदी विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहे। दूसरे नंबर पर पिछड़े इलाकों के गरीब प्रतिभावान बच्चों के लिए खोले गए नवोदय विद्यालयों का रहा। तीसरे नंबर पर भारी फीस लेकर संचालित किए जाने वाले जिनमें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम अपना रखा है वे निजी विद्यालय रहे है। इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में साल दर साल नंबरों की मूसलाधार बारिश हमारी शिक्षा पद्धति और परीक्षा प्रणाली दोनों ही हंसी का पात्र बनी हुई है।

इसका सीधा संकेत है कि केंद्र सरकार का केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालयों के शिक्षक और परीक्षक सर्वश्रेष्ठ है, जबकि राज्यों के बोर्डों का परीक्षा फल का प्रतिशत बहुत कम होता है। नि:संदेह इन स्कूलों का स्तर इतना तो गिरा हुआ नहीं है कि केंद्रीय विद्यालयों की पढ़ाई और परीक्षा दोनों में ही नीचे रहे। जहां तक केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के मूल्यांकन के पैमाने की बात है क्या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के मूल्यांकन का पैमाना इतना वैज्ञानिक व प्रामाणिक है कि छात्र 500 में से लगभग पूरे अंक हासिल कर लें? एक बार विज्ञान व गणित में तो यह सोचा जा सकता है कि इन विषयों की पद्धति और प्रश्नों के उत्तर विज्ञान सम्मत होते हैं, जिसमें संभवत: पूरे अंक आने की संभावना होती है, मगर साहित्य और इतिहास सहित मानविकीय विषयों में शत प्रतिशत अंक पाना कैसे संभव है? मजे की बात है कि 12वीं की एक टॉपर, आर्ट्स स्ट्रीम की हंसिका ने इंग्लिस में 99 माक्र्स आने पर अपने साथ ना इंसाफी बताते हुए अदालत में जाने की बात कही है। उसने इतिहास, राजनीतिक विज्ञान, मनोविज्ञान और संगीत में 100 में से 100 हासिल किए हैं।

 सवाल यह है कि क्या ये सभी ऐसे हैं जिनमें हर सवाल के 100 में से 100 सही जवाब दिए जा सकते हैं। लगभग हर विषय में पूर्णांक पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ना यही बताता है कि हमारी परीक्षा पद्धति मीडिया क्रिरी के एक ढर्रे में फंसकर रह गई है। तमाम स्कूल और कोचिंग संस्थान बच्चों को सिर्फ वह ढर्रा पकड़ाने के लिए, बच्चों को वह कुंजी थमाने के लिए बैठे हैं, जिससे अंकों का खजाना खुलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे बच्चों को रट्टू तोता बना रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा अंक बच्चों और उनके मां-बाप को तात्कालिक खुशी देते हैं और किसी अच्छे कॉलेज में प्रवेश का दरवाजा खोलते हैं। उनके भीतर रचनात्मकता को बढ़ावा देना इनके एजेंडे में ही नही है। बच्चों मेें उत्सुकता, जिज्ञासा, खोजबीन की तड़प या किसी कौशल में असाधारण निपुणता पैदा करना तो अब शिक्षण जगत की कल्पना से भी परे हो गया है। कुल मिलाकर इससे देश में धंधेबाजों और पिछलागुओं की जमात पैदा हो रही है। शोध और अन्वेषण मेें भारत के फिसड्डी रह जाने की मुख्य वजह यही है। 

वरिष्ठ भारतीय उद्यमी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां शिकायत करती है कि भारत में इंजीनियरों के पास सिर्फ डिग्री होती है, योग्यता नहीं। हमारे शिक्षा ढांचे के पालनहारों को जवाब में कुछ कहना जरूरी नहीं लगता। भारत को नॉलेज पावर मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना क्या इस पूर्णांक बांटने वाली शिक्षा पद्धति के बूते की बात है? परीक्षा के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन और देशों में भी किया जाता है लेकिन उनका जोर विद्यार्थियों की प्रतिभा को उभारने का होता है। चीन में माओ त्से तुंग ने काफी पहले कहा था कि अगर पांच प्रश्नों में से पांचों के जवाब कोई औसत ढंग से दे तो उसे 60 प्रतिशत से ज्यादा अंक नहीं मिले। लेकिन कोई छात्र यदि कोई छात्र एक ही प्रश्न का असाधारण और मौलिक उत्तर दे तो भी उसे 60 प्रतिशत अंक दे दिए जाने चाहिए। सवाल वही कि हमारे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड क्या बच्चों के मूल्यांकन को लेकर लीक से हटने को तैयार होंगे। दरअसल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के परीक्षा परिणामों का प्रतिशत उच्च शिक्षा और रोजगार परक संस्थानों में दाखिले को अंकों की सीमा का निर्धारण करता है।

 जो दूरदराज के इलाके से आने वाले प्रतिभावान विद्यार्थियों के लिए अन्याय जैसी स्थिति पैदा करता है। दरअसल राज्यों के शिक्षा बोर्डों का परीक्षाफल की प्रतिशत हमेशा की तरह केंद्रीय बोर्ड के मुकाबले बहुत कम होता है। नंबर देने में उदारता नहीं दिखाई जाती, जैसी केंद्रीय बोर्ड की उत्तर पुस्तिकाओं को जांचने में दिखाई जाती है, जिसका दंश उन्हें जीवन पर्यन्त झेलना पड़ता है। ऐसे में देश के नीति-नियंताओं को इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश में शिक्षा पद्धति और परीक्षा पद्धति में यह विसंगति कैसे दूर की जाए।

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