सब जीवों के प्रति क्षमा भाव ही पर्व की सार्थकता

Samachar Jagat | Tuesday, 25 Sep 2018 07:57:43 PM
The significance of the festivities towards all creatures

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क्षमापन, अपने में वापस लौटने का अनुपम पर्व है। दस लक्षण धर्म के मांगलिक व उत्तम स्वरूप की पूजन व साधना के साथ उनकी शरण में जाने का सद्प्रयास है। समय मेें आज यह पर्वाधिराज भी मात्र व्यवहार रह गया है। यही कारण है कि ये पर्व हमें जगाने, उठाने और दिशा बोधक नहीं बन पा रहे हैं। फिर भी, जितनी औपचारिकता निभ पा रही है, वह स्मरण कराए रहती है। क्षमापन, दस लक्षण धर्म के पर्व की इति नहीं है, शुभारम्भ है। अपने अतीत में लौट कर देखते हैं कि वर्ष भर में कहां अतिचार हुआ, अहम्मन्यता में किसे किस स्थल पर चोट पहुंचाई। 


हम अन्य की अपेक्षा अपने आपके साथ अतिचार अधिक करते हैं। क्रोध आता है, स्वयम् में आता है। कुटिलता, जटिलता, लोभ, अविनय, झूठ फरेब अपने से होकर ही अन्य के लिए ऐसा कर पाते हैं इसलिए अपने को क्षमा करने, स्वयम् को शुद्ध विशुद्ध करने का यह पर्व हमें भविष्य को संवारने का बोध देता है।

आपस के रिश्तों में जितना अपनापन व व्यवहार होता है, उतना ही कहने-कहाने, सुनने-सुनाने में कटुता भी आई रहती है। इसीलिए व्यवहार को सौहार्दपूर्ण बनाए रखने के लिए ‘‘भूल जाओ-भूलते जाओ’’ का दर्शन जीवनचर्या का सुखद मार्ग है। क्षमापन विगत में किए गए अतिचार को भुला देने और स्वस्थ चित्त से अपने में हो जाने का मांगलिक अवसर है।

क्षमापन, अपने को समझने का पर्व है। इस पावन पर्व पर मैं क्षमा लेकर प्रस्तुत हूं। अपने आपको क्षमा करके ही क्षमा के लिए हुआ जा सकता है। पर, यह होता नहीं है। मेरा अहम् मुझे ही जकडे रहता है। अहम् में अपनी सापेक्षता की चेतना ही क्षमा है। क्षमा की कोई भाषा नहीं होती है वह तो मौन है। क्षमा का सार स्वयम् ‘‘मैं’’ से अलग कर देना है। 

क्षमा को प्रज्ञा की आंखों से ही देखना होता है। क्षमा की शक्ति सत्य है और यही अहिंसा की शक्ति है। सत्य में क्रोध, कुटिलता, अविनय, अतिचार नहीं होता। मेरा सत्य ही मेरा हृदय है और जो हृदय सत्यमय बन जाता है, क्षमा के लिए हो जाता है। क्षमापन व्यक्ति को समस्त ऐषणाओं, ग्रंथियों से मुक्त करता है। मैं, इसी भावना के साथ सबसे क्षमा के लिए प्रस्तुत हूं। 

अपने अहम् में कब, कहां और कितनी चोट पहुंचाई होगी, स्मरण पर भी सब घटनाएं समक्ष नहीं आती। घटना अपने समय में घट कर रह जाती है। समय के साथ बीत भी जाती है। लेकिन, जाने अनजाने में उसने जो लकीर बना दी है-निशान बना दिए हैं, वह मौजूद रह जाते हैं, जो कभी उभर कर सामने आ जाते हैं और कभी बालू मिट्टी पर बने पदचिन्हों की तरह हवा उडा कर ले जाती है। 

मैं आज उसी हवा की खोज में हूं कि कहा ऐसे चिन्ह बने हैं जो झौके में उड जावे और हम समतल पर हो जावे। इसके लिए मेरी तत्परता अधिक होनी चाहिए। मैं इस समय जो लिख रहा हूं, उसे स्वयम् पढ़ रहा हूं और अपने से बोलकर वार्ता भी कर रहा हूं। इस लेखन में बुद्धि का जोर है तो ये केवल शब्द मात्र होकर रह जाने हैं, ऊपरी तल पर निकल जावेंगे। मेरा अंतर इसमें है तो ‘अहम’ बिखर कर रहेगा। ‘अहम्’ शक्ति भी है, यह ऐसा अग्नि तत्व है, जिस का लेखा हमारी बाहरी इन्द्रियां नहीं ले जा पाती है।
 
इसी से क्षमा का भाव सापेक्ष है। क्षमा की शर्त ही यह है कि वह आत्म विसर्जन के लिए पूरी तरह प्रस्तुत हो। क्षमा-स्थितिबद्ध नहीं है, गतिशील है और यह गतिशीलता ही हमें एक दूसरे से जोड़े हुए हैं। यही इसकी सार्थकता है। क्षमा की आत्मा-प्रेम और परस्पर का विश्वास है। यही इसका तेजस्वी व सक्रिय स्वरूप है।
(ये लेखक के निजी विचार है) 

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