चिंतन चिंता और चिता को छोटा कर देता है

Samachar Jagat | Thursday, 07 Feb 2019 04:11:20 PM
Thinking minimizes anxiety and pyre

दुनिया चिंता से भरी हुई है और लगता है कि चिंता इतनी मजबूत और पिछलग्गू हो गई है कि यह हमेशा मन-मस्तिष्क और तन को खोखला कर रही है, बेचैन कर रही है, जीवन के उद्देश्य को भटका रही है और बढ़ते कदमों को बीच रास्तों में अटका रही है। ऐसा लगता है चिंता लाइलाज हो गई है। हर बीमारी का इलाज ढूंढ़ लिया गया है कोई बीमारी असाध्य नहीं है, लेकिन इस चिंता का कोई इलाज दिखाई नहीं देता है और देखते ही देखते यह चिंता बहुत जल्द ही चिता तक पहुंचा देती है। लोग जिंदगी भर चिंता में जलते रहते हैं और मरते ही चिता में जलते हैं। क्या व्यक्ति इस दुनिया में केवल जलने के लिए ही आता और जलते हुए ही जाता है। यह तो कोई जीवन नहीं हुआ। ऐसा जीवन तो अधूरा है, तुच्छ है, संकीर्ण है, यह तो इस दुर्लभ जीवन के साथ खिलवाड़ है।

हो सकता है लोगों की नजर में चिंता और चिता का कोई इलाज नहीं हो, लेकिन बहुत कारगर और सटीक इलाज है-चिंतन। इसमें चिंता को हराने का साल्ट है, भगाने का साल्ट है और जड़ से खत्म करने का साल्ट है। चिंतन की मात्र मुद्रा से ही अपार शांति लौटने लगती है, मन-मस्तिष्क में भरने लगती है, रोम-रोम में शांति बिखरने लगती है, हर अंग को सकून देने लगती है। चिंतन का मतलब है अपने चित में उतर जाना, अपने परमात्मा में उतर जाना, अपने परम आनन्द में उतर जाना, अपनी दृष्टि में उतर जाना और अपनी सृष्टि में उतर जाना। 

जैसे ही चिंतन शुरू होता है चिंता भागने लगती है, आत्मा जागने लगती, बुद्धि जागने लगती, अज्ञान जाने लगता है, सद्ज्ञान आने लगता है, नफरत जाने लगती है प्रेम आने लगता है और लगने लगता है जैसे यह सम्पूर्ण संसार आनन्द से भरा है, अपनेपन से भरा है, प्रेम से भरा है और सब अपने से लगने लगते है। यह भी सच है कि चिंतन करने वालों की संख्या कम हो सकती है लेकिन उनकी खुशी में कोई कमी नहीं हो सकती है। वे सबसे अलग नजर आते हैं, उनकी आंखों की चमक अलग नजर आती है, उनके चेहरों की कांति अलग नजर आती है, उनके हृदय के भाव अलग नजर आते हैं, वे चिंता से कहीं ऊपर उठे हुए नजर आते है वे चिता से कहीं ऊपर उठे हुए नजर आते हैं और यही कारण है कि चिंतन करने वाले लोग चित को स्थिर और विस्तृत करते नजर आते हैं।

जब चिंतन शुरू होता है तो आंखें स्वयं बंद हो जाती है अर्थात् बाहर की दुनिया बंद हो जाती है और अंदर की दुनिया खुल जाती है और जब भीतर की दुनिया खुल जाती है तो फिर न चिंता रहती है और न मन में चिता रहती है बस रहता है तो केवल आनन्द ही आनन्द। आइए, चिंतन बुलाएं और चिंता-चिता को भगाएं।

प्रेरणा बिन्दु:- 
चिंतन चित को स्थिर और विस्तृत करता ही है, इसके साथ ही यह चित को तृप्त भी करता है।
 



 

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