ट्रंप-किमजोंग शिखर वार्ता

Samachar Jagat | Wednesday, 16 May 2018 01:10:04 PM
Trump-Kimjong summit

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 12 जून को सिंगापुर में उत्तर कोरिया के शासक किमजोंग-उन के साथ बैठक करेंगे। टं्रप ने पिछले सप्ताह गुरुवार को यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि वे किम से कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर चर्चा के लिए मिलेंगे। ट्रंप ने ट्विटर पर लिखा, किमजोंग उन और मेरे बीच होने वाली बहुप्रतीक्षित बैठक 12 जून को सिंगापुर में होगी।

 हम दोनों विश्व शांति के लिए बेहद खास पल बनाने की कोशिश करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह घोषणा ऐसे समय में की, जिससे पहले उत्तर कोरिया द्वारा रिहा करने के बाद दक्षिण कोरियाई मूल से तीन अमेरिकी नागरिक अमेरिका लौट आए। ट्रंप और किम के बीच सिंगापुर में होने वाली ऐतिहासिक बैठक की तैयारी के लिए अमेरिकी अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। सीएनएन के मुताबिक सिंगापुर में किम से मुलाकात करने का यह फैसला बुनियादी रूप से ट्रंप का है। ट्रंप-किम मुलाकात के लिए सिंगापुर और डीएमजैड को दो संभावित स्थानों के रूप में देखा जा रहा था। किम और ट्रंप के बीच यह पहली बैठक होगी। 

व्हाइट हाउस ने कहा है कि 12 जून को उत्तर कोरिया के शासक किमजोंग उन के साथ शिखर वार्ता में ट्रंप का जोर इस बात पर होगा कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियार मुक्त बनने के लिए अपने फैसले को फिर कभी नहीं बदले। ट्रंप की नीति कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्ण, अपरिवर्तनीय और प्रमाण योग्य परमाणु निरस्त्रीकरण को सुनिश्चित करना है। ट्रंप किमजोंग से यही मांग करने वाले हैं, ट्रंप उत्तर कोरिया को किसी तरह के उकसावे की हरकत न करने की चेतावनी भी देंगे। व्हाइट हाउस ने यह आशंका भी जताई है कि भले कार्यक्रम तय हो, लेकिन उत्तर कोरिया की ओर से उकसाने वाली कोई भी हरकत इसे स्थगित करने के कारण बन सकती है। वहीं सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सियन लूंग ने कहा है कि ट्रंप और किम की मुलाकात शांति के रास्ते पर एक अहम कदम होंगी।

 उन्होंने इसके सफल होने की उम्मीद जताई है। ट्रंप ने एक बयान में कहा है कि अपने नागरिकों की रिहाई के लिए अमेरिका ने उत्तर कोरिया को कोई धन नहीं दिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और उत्तर कोरिया के शासक किमजोंग की यह मुलाकात पूरी दुनिया के लिए राहत की बात है। पिछले दो साल के दौरान दोनों देशों के बीच तनाव जिस चरम स्थिति पर पहुंच गया था, उससे लग रहा था कि तीसरा विश्व युद्ध दूर नहीं है। दो साल के भीतर उत्तर कोरिया ने खुलकर अपने परमाणु मिसाइल परीक्षण किए और एक एटमी ताकत सम्पन्न देश के रूप में दुनिया के सामने आया। उत्तर कोरिया ने जो मिसाइले बना ली है, वे अमेरिका को खतरे में डालने की ताकत रखती है। अमेरिका को किम की यह खुली चुनौती थी। 

युद्ध की आशंका वाले ऐसे हालात बन गए थे कि उत्तर कोरिया से निपटने के लिए अमेरिका ने अपने जंगी जहाजों वाले बेड़े को खाना कर दिया था। कोरिया विभाजन के बाद से ही उत्तर कोरिया अमेरिका की आंख की किरकिरी रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया अमेरिका के खेमे में है। उत्तर कोरिया को चीन का प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष समर्थन हासिल है। शीत युद्ध के दौर के बाद यह पहला मौका है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति और उत्तर कोरिया के शासक के बीच शिखर वार्ता होने जा रही है। जैसा कि ट्रंप के हवाले से ऊपर कहा जा चुका है कि ट्रंप और किम की शिखर वार्ता पूरी तरह परमाणु हथियारों के मसले पर केंद्रित रहेगी। अमेरिका पूरे कोरियाई क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने की जिद पर अड़ा है। लेकिन सवाल है कि अमेरिका उत्तर कोरिया को कहां तक झुका या मना पाता है। 

उत्तर कोरिया जितनी एटमी ताकत हासिल कर चुका है। वह मामूली नहीं है। ऐसे में वार्ता कहां तक सफल होगी, कोई नहीं जानता। अमेरिका ने चेतावनी भी दी है कि अगर वार्ता से पहले उत्तर कोरिया ने कोई उकसाने वाली हरकत की तो यह मुलाकात खटाई में पड़ जाएगी। इसलिए लगता है कि वार्ता तो होने जा रही है, पर विश्वास का पुल अब भी नहीं बन पाया है। हालांकि वार्ता से पहले जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है, उत्तर कोरिया ने कोरियाई मूल के तीन अमेरिकी नागरिकों को रिहा कर दिया। यह अमेरिका की पहली उपलब्धि है और इसे किम की ओर से शांति वार्ता के प्रति सकारात्मक रुख के तौर पर देखा जाना चाहिए। लगभग पिछले एक महीने का घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि उत्तर कोरिया ने भी शांति की दिशा में कदम तो बढ़ाए हैं। 

यह बात अलग है कि ऐसा उसने चारों ओर से बढ़ते दबाव में किया है। किमजोंग अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से मिले। कोरिया के विभाजन के बाद दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति से उत्तर कोरिया के शासक की मुलाकात दूरगामी संदेश वाली थी। इससे यह संकेत भी मिला है कि दोनों कोरिया कभी भी एक होने की संभावनाएं टटोल सकते हैं। ट्रंप से मुलाकात से किम का चीनी राष्ट्रपति से मिलना भी गहरे अर्थ लिए हुए है। किमजोंग अमेरिकी कूटनीति से निपटने के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे। यह अमेरिका भी जानता है। ऐसे में शांति की यह पहल कितनी कामयाब हो पाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा। फिर भी उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच तनाव जिस चरम स्थिति पर पहुंच गए थे और तीसरे विश्व युद्ध की आशंका पैदा हो गई थी, ऐसे में दोनों का वार्ता के लिए तैयार होना भी बड़ी बात है।



 

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