Experts : मंकीपॉक्स के विकास को समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत

Samachar Jagat | Wednesday, 03 Aug 2022 09:01:45 AM
Experts : More study needed to understand evolution of monkeypox

कोच्चि | विशेषज्ञों के मुताबिक जीनोमिक अध्ययनों से पता चला है कि मंकीपॉक्स वायरस हाल के वर्षों में बदल गया है और बीमारी के विकास को समझने के लिए और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। त्रिशूर स्थित केरल स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, स्कूल ऑफ हेल्थ साइंसेज में विजिटिग प्रोफेसर जन स्वास्थ्य डा. नरेश पुरोहित ने बुधवार को यह बात कही।
प्रख्यात महामारी विज्ञानी डा. पुरोहित ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि भारत में मंकीपॉक्स के मामलों की संख्या मंगलवार को बढकर नौ हो गई, जबकि केरल में अब तक पांच मामले दर्ज हो चुके हैं।

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 24 जुलाई को लौटा एक व्यक्ति मंकीपॉक्स से संक्रमित पाया गया था। कुल मिलाकर, भारत में अब नौ मामले हैं - पांच केरल से, तीन दिल्ली से और एक नाइजीरियाई नागरिक। इन आठ में से पांच का दुबई और शारजाह से अंतरराष्ट्रीय यात्रा का इतिहास रहा है। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सामान्य आबादी में मंकीपॉक्स का मामला मृत्यु अनुपात ऐतिहासिक रूप से 0 प्रतिशत से 11 फीसदी तक रहा है और छोटे बच्चों में यह अधिक रहा है।हाल के दिनों में, मामला मृत्यु अनुपात लगभग तीन फीसदी से छह प्रतिशत रहा है। यह रोग 1970 के दशक से अफ्रीका में है, यह अमेरिका, इजरायल व ब्रिटेन में भी रिपोर्ट किया गया है।

राष्ट्रीय संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के सलाहकार डा. पुरोहित ने यूनीवार्ता को बताया, ''त्वचा पर चकत्ते और बुखार दोनों मंकीपॉक्स और चिकनपॉक्स के सामान्य लक्षण हैं। इनसे लोगों में भ्रम पैदा हुआ है, हालांकि रोगियों में दोनों वायरल रोगों के लक्षणों के प्रकट होने के तरीके में अंतर है।’’ उन्होंने बताया है कि मंकीपॉक्स में घाव चेचक से बड़े होते हैं। मंकीपॉक्स में हथेलियों और तलवों पर घाव दिखाई देते हैं। चेचक में घाव सात से आठ दिनों के बाद अपने आप सीमित हो जाते हैं लेकिन मंकीपॉक्स में ऐसा नहीं होता है। चेचक में घाव वेसिकुलर और खुजलीदार होते हैं। मंकीपॉक्स में घाव मोटे तौर पर वेसिकुलर और बगैर-खुजली वाले होते हैं।

उन्होंने कहा कि मंकीपॉक्स में बुखार की अवधि लंबी होती है और ऐसे रोगी में लिम्फ नोड्स बढèे हुए होते हैं।प्रसिद्ध चिकित्सक ने कहा कि चिकनपॉक्स एक आरएनए वायरस है जो इतना गंभीर नहीं है लेकिन इससे त्वचा पर चकत्ते भी पड़ जाते हैं। मंकीपॉक्स के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने बताया कि इस तरह के वायरस के लिए एक एनिमल होस्ट की आवश्यकता होती है, लेकिन यह गले में खराश, बुखार और सामान्य वायरस के लक्षणों के साथ खुद को सीमित कर लेता है। उन्होंने कहा कि अभी मंकीपॉक्स किशोर अवस्था में है। वर्तमान में कोई उचित उपचार नहीं है। चिकित्सक सिर्फ आइसोलेशन का तरीका अपना रहे हैं और संदिग्ध मरीज को उसके लक्षणों के अनुसार इलाज कर रहे हैं। तो, यहाँ यह रोगसूचक उपचार का मामला है।

उन्होंने कहा,''विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि 1979-80 के आसपास इस बीमारी को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था, तब चेचक के टीके को बंद कर दिया गया था। वर्ष 1980 से पहले पैदा हुए लोग जिन्होंने चेचक का टीका लिया है, उनमें मंकीपॉक्स होने की संभावना कम होती है। चेचक और मंकीपॉक्स दोनों के वायरस के कारण होते हैं।’’ उन्होंने खुलासा किया है कि चेचक और मंकीपॉक्स के बीच इस समानता के कारण, कई देशों ने 'स्मॉल पॉक्स’ के टीके दिए जाने की अनुमति दी है लेकिन भारत में अभी भी इसकी अनुमति नहीं है। उन्होंने कहा,''वायरस किशोर अवस्था में है और डॉक्टर अभी भी इसका पता लगा रहे हैं।’’



 

Copyright @ 2022 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.