राज्यसभा के लिए रंजन गोगोई का मनोयन और फैसलों पर उठते सवाल

Samachar Jagat | Wednesday, 18 Mar 2020 07:12:30 AM
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देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई एक अनचाहे विवाद में फंस गए हैं. केंद्र सरकार ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत कर विवाद को जन्म दे दिया है. दरअसल कभी आंतरिक लोकतंत्र की बात और पहली बार प्रेस के सामने सुप्रीम कोर्ट के तबके मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले जजों में से एक रंजन गोगोई को राज्यसभा का सदस्य बनाया जाना पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला है. रिटायर होने से पहले उनके लिए फैसले अब सवालों में है. चाहे वह राम मंदिर मामले में दिया फैसला हो या फिर राफेल विमान घोटाले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देने का फैसला के साथ-साथ सीबीआई में चले घमासान में दिए उनके फैसले पर सवाल उठ रहे हैं और सोशल मीडिया में इन फैसले के अलावा जम्मू-कश्मीर मामले को लंबा खीचने को उनके राज्यसभा के सदस्य के मनोयन से जोड़ कर देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि सरकार ने इन फैसलों के लिए उन्हें इनाम से नवाजा है. क्योंकि उन्हें रिटायर हुए चार महीने ही हुए हैं.



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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत किया. इसके बाद से सियासत भी शुरू हो गई. अब रंजन गोगोई ने राज्यसभा की सदस्यता लेने के सवाल पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने शपथ ग्रहण के बाद इसका जवाब देने की बात कही है. उन्होंने कहा कि मैं संभवतः बुधवार को दिल्ली जाऊंगा. मुझे शपथ लेने देंए, फिर विस्तार से मीडिया को बताऊंगा कि मैंने राज्यसभा की सदस्यता क्यों स्वीकार की. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. उनके सेवानिवृत्त होने से पहले उन्हीं की अध्यक्षता में बनी पीठ ने अयोध्या मामले सहित कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण मामलों में फैसला सुनाया था.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किए जाने पर दावा किया कि गोगोई न्यायपालिका और खुद की ईमानदारी से समझौता करने के लिए याद किए जाएंगे. कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया कि न्यायमूर्ति एचआर खन्ना अपनी ईमानदारी, सरकार के सामने खड़े होने और कानून का शासन बरकरार रखने के लिए याद किए जाते हैं. उन्होंने दावा किया कि न्यायमूर्ति गोगोई राज्यसभा जाने की खातिर सरकार के साथ खड़े होने और सरकार और खुद की ईमानदारी के साथ समझौता करने के लिए याद किए जाएंगे.

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने इसे न्यायिक व्यवस्था में दखल करार दिया और कहा कि इस फैसले से पूरी न्यायिक व्यवस्था कठघरे में खड़ी हो गई है. उन्होंने एक बार कोलेजियम प्रणाली पर सवाल उठाया और कहा कि जरूरत है इस प्रक्रिया को बदलने की ताकि गरीबों, पिछड़ों और दलितों के बच्चे भी सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में जज बन सकें. रालोसपा लंबे समय से कोलेजियम प्रणाली के खिलाफ हल्ला बोल, दरवाजा खोल कार्यक्रम चला रही है.

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर तीखा हमला बोला. उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर निशाना साधते हुए कहा कि वे खुद मना करें नहीं तो एक्सपोज हो जाएंगे. ओवैसी ने कहा कि जस्टिस लोकुर ने जो कहा मैं उससे सहमत हूं. मैं सवाल उठा रहा हूं. न्यायालय पर सवाल उठते है. उनके फैसले से सरकार को लाभ हुआ है. वे खुद मना करें नही तो एक्सपोज हो जाएंगे. जेटली साहेब ने यही कहा था. रंजन गोगोई के खिलाफ महिला ने भी शिकायत की थी. उस महिला को वे न्याय नहीं दिला सके. संविधान और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने इसे शर्मनाक बताया है. ट्वीट कर उन्होंने कहा कि रंजन गोगोई ने राज्यसभा की पेशकश स्वीकार कर ली, इस पर जितनी भी शर्म की जाए कम है.

वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने कहा कि यह गलत है, उन्हें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए था. उन्होंने खुद ही कहा था जज को रिटायर के बाद पद नहीं लेना चाहिए. कहने की बात कुछ और है. न्याय की फ्रीडम को ठेस नहीं लगना चाहिए. इससे लगता है अरुण जेटली भी कहते थे दो साल तक पद नहीं. इसी मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि न्यायपालिका पर गहरा हमला है. गोगोई से सीधा लेना देना नहीं है. आस्था पर सवाल उठा है. परसेप्शन को लेकर सवाल उठेगा. अगर मैंने गलत किया तो आप भी गलत करेंगे. रंगनाथ मिश्रा छह साल बाद आए. दो साल कूलिंग पीरियड हर जगह होता है. अपने की सुन लीजिए हमारी ना सुने तो जेटली की सुन ले सत्तर साल के नियम का उल्लंघन किया. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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