दंगे तो खत्म हो गए लेकिन दाग अब भी बाकी है

Samachar Jagat | Saturday, 14 Mar 2020 10:08:10 PM
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दिल्ली में हालात अब सामान्य हैं. फरवरी के तीसरे हफ्ते में उत्तर-पूर्व दिल्ली के कई इलाकों में दंगे फैले, पचास से ज्यादा लोगों की मौतें हो गईं. सैंकड़ों दुकाने जल गईं तो बहुतों का आशियाना दंगे की भेंट चढ़ गया. हालात भले सामन्य हो गए हों लेकिन दंगों के दाग धुले नहीं हैं. दिल्ली के सीने पर लगे दंगों के जख्म अब भी दिखाई दे रहे हैं. हर तरफ पसरा सन्नाटा. जले हुए घर, दुकानें, गाड़ियां और वीरान गलियां. दंगों के मलबों में रिश्तों खत्म होते विश्वास की अनकही कहानियां. उन कहानियों में सिसकियां भी हैं और आहें भी. लोगों का टूटा विश्वास भी है और कुछ अनदेखे रिश्ते भी हैं. जो कभी उत्तर पूर्वी दिल्‍ली के शिव विहार की सबसे हलचल वाली कॉलोनी हुआ करती थी, अब वह एक भूतिया शहर की तरह है. तबाही के मंजर देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि यह इस देश की राजधानी का ही कोई मोहल्‍ला है. 24 फरवरी को नागरिकता कानून के विरोधियों और समर्थकों के बीच शुरू हुई हिंसा में सबसे ज्‍यादा प्रभावित शिव विहार ही हुआ. इस हिंसा में पचास से ज्‍यादा लोगों की जान चली गई जबकि दो सौ से ज्‍यादा लोग अब भी अस्‍पताल में हैं.



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प्रत्‍यक्षदर्शियों ने बताया कि भीड़ आई और हर चीज को जलाती चली गई. अपने जलते हुए घरों को छोड़कर दंगाइयों से बचने के लिए सैकड़ों परिवारों ने पास के इंदिरा विहार इलाके में शरण ली जहां के लोगों ने इन पीड़ितों को खुले दिल से अपने घरों में पनाह दी. चालीस साल की मुमताज बेगम और उनके परिवार पर दंगाइयों ने तेजाब से हमला किया. वे उस क्षण को भूल नहीं पाई हैं. वे कहती हैं कि हम सभी घर में ही थे जब दंगाई आ धमके. उन्‍होंने तेजाब फेंका जो मेरे पति के चेहरे पर लगा. मेरी बीस साल की बेटी अनम भी उनके बगल में ही खड़ी थी. तेजाब मेरी बेटी के चेहरे पर भी गिरा. हमने किसी तरह खुद को बचाया और मस्जिद की तरफ भागे, जहां हमने रात गुजारी. कई दिनों तक उन्‍हीं कपड़ों में रही जो पहनकर भागी थी. हमने सौ नंबर डायल भी किया लेकिन कोई नहीं आया.'

शाहबानो अपने पंद्रह दिन के बेटे के साथ एक आश्रय गृह में हैं और अपने परिवार के भविष्‍य को लेकर डरी हुई हैं. उन्‍होंने बताया कि हमारे घर के बाहर कई दिनों तक हिंसा हुई. हम सभी बत्तियां बुझाए रखते थे ताकि दंगाई न जान पाएं कि हम अंदर ही हैं. मुझे डर लगता था कि अगर मेरा बेटा जाग गया और उन्‍होंने उसका रोना सुन लिया तो हम पर हमला कर देंगे. जब उन्‍होंने हमारे पड़ोस के घर को जला दिया तो हम अपनी जान बचा कर भागे. बाद में उन्‍होंने हमारे घर को भी जला दिया. मुझे नहीं पता अब क्‍या होगा. हमारा सब खत्‍म हो गया. यहां ही नफीस अहम सैफी जैसे लोग भी हैं जिन्‍होंने अपने घरों को खोल दिया और ऐसे लोगों को बचाया. उन्‍होंने कहा कि मैंने हिंसा देखी और देखा कि कैसे इन परिवारों को मदद की दरकार है. इसलिए मदद की पेशकश की. मैंने अपने परिवार को घर के दूसरे मालों पर भेज दिया और ग्राउंड फ्लोर का यह पूरा हॉल अब इन बेघर लोगों के लिए है.'

मेडिकल राहत टीमें और दिल्‍ली अल्‍पसंख्‍यक आयोग के सदस्‍य भी ऐसे घरों में पहुंचे और हिंसा ग्रस्‍त इलाकों में हुए नुकसान का जायजा लिया. दिल्‍ली अल्‍पसंख्‍यक आयोग की सदस्‍य अनसतासिया गिल ने कहाकि 'हम बड़े पैमाने पर हुई बर्बादी देख सकते हैं. मैं एक कैथलिक नन भी हूं. हम होली फैमिली अस्‍पताल के साथ मिलकर मेडिकल सहायता व एंबुलेंस इन इलाकों में भेज रहे हैं. पहली प्राथमिकता चिकित्‍सीय सहायता पहुंचाना है. दूसरा, अगले कुछ हफ्तों तक बेघर हुए लोगों के लिए भोजन मुहैया कराना और तीसरा इन परिवारों का पुनर्वास. दंगे तो खत्म हो गए हैं लेकिन दाग अभी बाकी है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).


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