जम्मू-कश्मीर मामलाः सुप्रीम कोर्ट के फैसले से केंद्र सरकार बैकफुट पर

Samachar Jagat | Saturday, 11 Jan 2020 08:19:47 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को लेकर जो कुछ भी कहा उससे केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ सकती है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार बैकफुट पर है. जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के बाद हालात अब भी सामान्य नहीं हुए हैं. इंटरनेट अभी तक बहाल नहीं हो पाया है. सुप्रीम कोर्ट ने जो बातें इसे लेकर कहीं हैं उससे सरकार की पेशानी पर बल पड़ सकता है. कश्मीर में इंटरनेट पर लगी रोक को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यकीनन घाटी के लोगों को राहत मिली होगी. अदालत ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच लोगों का एक मौलिक अधिकार है. घाटी के कई लोगों ने इसे खुशखबरी बताते हुए उम्मीद जताई है कि जल्द ही इंटरनेट सेवाएं बहाल हो जाएंगी. पिछले साल पहले पांच अगस्त को जब जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द कर दिया गया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया गया, तब से वहां इंटरनेट सेवाओं पर रोक है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इंटरनेट के इस्तेमाल को एक मौलिक अधिकार करार दिया और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को केंद्र शासित प्रदेश में पाबंदी सभी आदेशों की एक हफ्ते में समीक्षा करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद कश्मीरियों ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत ही बड़ी खुशखबरी है, एक बड़ी राहत है, क्योंकि इंटरनेट पांच महीनों से निलंबित है. हमें वास्तव में उम्मीद है कि अब जल्द से जल्द सेवाएं फिर से शुरू की जाएंगी. लोगों का कहना है कि पांच अगस्त के बाद से कश्मीर में व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इंटरनेट बंद होने से घाटी में पर्यटन को बड़ा नुकसान हुआ है. लोगों का कहना है कि इंटरनेट पर निर्भर व्यवसाय को इससे बहुत बड़ी राहत मिलेगी.

घाटी में इंटरनेट प्रतिबंध का सबसे अधिक प्रभाव छात्रों पर पड़ा है और लोगों का कहना है कि देर से ही सही, शीर्ष अदालत की आलोचना हमारे लिए राहत की बात है. हमारे लिए यह खुले हवा में सांस लेने जैसा है. श्रीनगर के पत्रकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है कि इंटरनेट का उपयोग एक मौलिक अधिकार है, जिसे रोका नहीं जा सकता है. इसके साथ ही उन्होंने उम्मीद जताईं कि मीडिया संगठनों के लिए यह सेवाएं बहाल की जाएंगी ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें. इंटरनेट पर रोक से पत्रकारों को भी काफी परेशानी उठानी पड़ रहीं थीं. 

माकपा ने सुप्रीम कोर्ट की शुक्रवार की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए सरकार से राज्य में सभी प्रकार के प्रतिबंध हटाए जाने की मांग की है. माकपा पोलित ब्यूरो ने शुक्रवार को बयान जारी कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर में नागरिक अधिकारों की कटौती पर उल्लेखनीय टिप्पणी की है जिससे राज्य में सामान्य जनजीवन की बहाली के बारे में केंद्र सरकार के दावा गलत साबित हुआ है. पार्टी ने कहा कि केंद्र सरकार ने गुरुवार को भी अपने इस दावे को सही ठहराने की कोशिश की और विदेशी राजनयिकों को जम्मू कश्मीर के सीमित दौरे पर भेजा. पोलित ब्यूरो ने कहा कि जम्मू कश्मीर में राजनयिकों को सरकार जो दिखाना चाहती है, उन्हें उसी का जायजा लेने की अनुमति दी गई है. यही वजह है कि राजनयिकों को राज्य के तीन नजरबंद पूर्व मुख्यमंत्रियों से मिलने की इजाजत नहीं दी गई है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश केंद्र सरकार के अहंकारी रुख को खारिज करता है और अब इस केंद्रशासित प्रदेश में संविधान का सम्मान करने वाले नए प्रशासकों की नियुक्ति होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक को अब गोवा के राज्यपाल के पद इस्तीफा दे देना चाहिए. पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री ने ट्वीट किया कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश जम्मू-कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों पर केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अहंकारी रुख को खारिज करता है. जम्मू-कश्मीर की वह टीम बदलनी चाहिए जिसने योजना तैयार की और लागू की. चिदंबरम ने यह भी कहा कि संविधान का सम्मान करने वाले नए प्रशासकों की नियुक्ति की जानी चाहिए. जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उन्हें गोवा के राज्यपाल पद से इस्तीफा दे देना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों की एक हफ्ते के अंदर समीक्षा करने को कहा है. इस फैसले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने फैसले के बाद पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट के महत्व को मौलिक अधिकार बताते हुए मोदी सरकार की अवैध गतिविधियों को साल 2020 का पहला बड़ा झटका दिया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने लोगों को गुमराह करने की कोशिश की थी और इस बार शीर्ष अदालत किसी दबाव में नहीं आई. राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष आजाद ने कहा कि हम फैसले का स्वागत करते हैं. यह पहली बार है कि सुप्रीम कोर्ट जम्मू-कश्मीर के लोगों की दिल की बात कही है. उसने लोगों की नब्ज पकड़ ली है. मैं ऐतिहासिक निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद करना चाहता हूं. पूरे देश खासकर जम्मू-कश्मीर के लोग इसके लिए इंतजार कर रहे थे.

जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट समेत कई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल उपकरण के तौर पर नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कश्मीर में बहुत हिंसा हुई है. हम सुरक्षा के मुद्दे के साथ मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को संतुलित करने की पूरी कोशिश करेंगे. इंटरनेट पर एक समयसीमा तक ही रोक लगना चाहिए.कोर्ट ने कहा कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में बोलने की स्वतंत्रता अनिवार्य तत्व है. इंटरनेट का उपयोग करने का अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत एक मौलिक अधिकार है.

न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की तीन सदस्यीय पीठ ने इन प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली गुलाम नबी आजाद और अन्य की याचिकाओं पर पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी. गुलाम नबी आजाद के अलावा, कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन और कई अन्य ने घाटी में संचार व्यवस्था ठप होने सहित अनेक प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं. जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केंद्र सरकार के लिए बड़ा झटका है. सियासी दल लामबंद होंगे और सरकार को घेरने में लग गए हैं. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



 

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