न सोचें अपना ही अपना

Samachar Jagat | Thursday, 01 Nov 2018 05:20:21 PM
Do not think your own

धर्म के मामले में खूब सारी धाराएं बहती रही हैं। पूर्व जन्माॢजत संस्कारों, पारिवारिक और वंश परंपरा के अनुरूप जीवनयापन तथा स्वभाव, व्यवहार और मौलिकताओं के साथ ही परिवेश से अॢजत ज्ञान, अनुभवों आदि के कारण से हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी अपने-अपने हिसाब से जीता है। जो इंसान जिस रंग-ढं्रग में जीता है उसे वही पसन्द आता है और उसकी यही सोच होती है कि वह जो कुछ कर रहा है वही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ सत्य है और दूसरों को भी इसे अपनाना चाहिए।

इस मामले में कई लोग मर्यादाओं और परम्पराओं के दायरे में रहकर काम करते हैं और दूसरी किस्म उनकी है जो कि उन्मुक्तता के साथ मनमर्जी से स्वेच्छाचारों का प्रयोग करते रहते हैं। हममें से खूब सारे लोग हैं जो उन कामों को करने में भी दिलचस्पी रखते हैं जिन कामों से उनका कोई सरोकार नहीं होता। हमारी पूरी जिन्दगी में अधिकांश वैचारिक और शारीरिक-मानसिक कर्म व व्यवहार वे होते हैं जिनका हमसे कोई संबंध नहीं होता। लेकिन हमें औरों की देखा देखी आनंद का अनुभव होता है। ऐसे हर प्रकार के कर्म-व्यवहार को सस्ते मनोरंजन की श्रेणी में रखा जा सकता है।

बहुधा हम अपने कर्म की पटरी से भ्रमित होकर ट्रेक बदल लिया करते हैं और बाद में पछताते हैं। बकि हमारी सोच और लक्ष्य सुस्पष्ट होने चाहिएं और दिखने भी। काम वही करने चाहिएं जो अपने जीवन के लिए निर्धारित हैं और जिन्हें करने में वास्तविक आनन्द की अनुभूति होती है। आनन्द प्राप्ति के दो मार्ग हैं। एक मार्ग वह है जिसमें आदमी को वे ही कर्म करने चाहिएं जो इंसान के लिए निश्चित किए गए हैं और जिनका अवलम्बन करने से हमें भीतर से प्रसन्नता होती है।

सही अर्थों में देखा जाए तो यही प्रसन्नता और उल्लास का भाव हृदय से लेकर चेहरे तक छाया और पूरे आभामण्डल में पसरा होता है। इसका अहसास हम स्वयं भी कर सकते हैं और हमारे संपर्क में आने वाले दूसरे लोग भी।

इस मार्ग पर अपनी दृष्टि और दिशा शुचितापूर्ण और सर्वथा शुद्ध हुआ करती है जिसमें प्रत्येक कर्म का लक्ष्य समाज और देश होता है और ऐसे में मनुष्योचित सारी मर्यादाओं और जीवन के अनुशासन का पालन करते हुए हम मनुष्यता के साथ आगे बढ़ते हुए दिव्यत्व और दैवत्व का रास्ता पकड़ लेते हैं जहाँ न कोई तनाव है और न किसी की उलाहना। न कोई हमारे बारे में कुछ कह सकता है, न करने की हिम्मत जुटा सकता है। ऐसे में हमारी मानसिक और शारीरिक तुष्टि का क्रम पूरी ऊ$र्जा और उत्साह के साथ निरन्तर बना रहता है।

जब हम स्वार्थों और विकारों से मुक्त रहकर कोई काम करते हैं तब हमारे लिए सारे मार्ग सुरक्षित और उत्साहपूर्ण होते हैं और ऐसे माहौल में कर्मयोग को आकार देने का अलग ही मजा है जो औरों के लिए भले ही अगोचर हो, परन्तु हमें भीतरी आनंद और ताजगी से ऐसा भरा हुआ रखता है कि जीवन का हर क्षण स्वर्ग के बराबर प्रतीत होता है और किसी भी क्षण मृत्यु की आहट होने पर भी प्रसन्नता से मौत को भी स्वीकार करने का उल्लास बना रहता है।

कर्म और व्यवहार शुचितापूर्ण एवं सत्यं शिवं सुन्दरं होने की स्थिति में जीता हुआ आदमी ही वास्तव में मनुष्य के रूप में सफल है और ऐसे लोगों पर ही विधाता प्रसन्न रहता है। दूसरी प्रकार के लोगों की किस्म को देख कर लगता है कि जैसे विराट विश्व में पैदा होने के बावजूद उनका भचतन संकीर्ण, स्वार्थपूर्ण और स्व केन्द्रित है और लगता है जैसे विधाता ने इन लोगों को अपने घर भरने के लिए ही पैदा किया हुआ है। इन लोगों को न अपने कुटुम्बी दिखते हैं, न अपना समाज और क्षेत्र, न देश।

इनका पूरा संसार अपने आप तक ही सिमटा हुआ होता है और ऐसे में इनकी प्रत्येक गतिविधि का प्रयोजन स्व के लिए होता है। ये अपने कर्मयोग को पूरा करते हुए जिन्दगी भर उस न$जरबंद कैदी की तरह रहा करते हैं जिसके लिए जेल की चहारदीवारियों तक ही संसार का वजूद है और जो कुछ करना है इन्हीं सीमाओं के भीतर रहकर, और वह भी सिर्फ अपने लिए, अपने साथ रह रहे न जरबन्दियों या चंद लोगों के लिए ही, जिनसे हमारा संबंध या संपर्क है।

इस संकीर्ण मानसिकता के साथ जो लोग काम करते हैं वे किसी सार्वजनिक कचरा घर की तरह समृद्धि तो प्राप्त कर खुद भण्डारी होने का दम तो भर सकते हैं लेकिन विराट और व्यापक फैले हुए संसार के तमाम आनंदों से दूर रहते हैं। सिर्फ अपने बड़े और लोकप्रिय होने अथवा सम्पत्तिशाली होने का भ्रम ही दिन-रात इन्हें ऐसा बाँधे रखता है कि ये न और कुछ सोच पाते हैं, न औरों के बारे में सोचने की स्थिति में होते हैं।
- डॉ. दीपक आचार्य
(ये लेखक के निजी विचार है) 



 

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