तापमान में बढ़ोतरी पूरी दुनिया के लिए खतरा

Samachar Jagat | Saturday, 13 Oct 2018 04:24:40 PM
Increase in temperature threat to the whole world

तापमान में बढ़ोतरी का सबसे बुरा प्रभाव गंगा घाटी क्षेत्र में पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार यदि औसत तापमान में दो डिग्री बढ़ोतरी होती है तो उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे गंगा घाटी वाले राज्यों में बारिश में 20 फीसदी की कमी आ सकती है। बारिश में 20 फीसदी की कमी का मतलब सूख पड़ना होता है। आईपीसीसी की इसी सप्ताह सोमवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 50 फीसदी कमी लानी होगी। वरना सदी के आखिर तक तापमान में बढ़ोतरी दो डिग्री या इससे ज्यादा हो सकती है। 

यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है। लेकिन इसमें भारत और दक्षिण पूर्व एशिया का अलग से संदर्भ लेते हुए कहा गया है कि इन देशों के लिए स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि तापमान में बढ़ोतरी दो डिग्री होती है तो इससे गंगा घाटी वाले राज्यों में बारिश 20 फीसदी तक की कमी आ सकती है। उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड और आंशिक रूप से पश्चिम बंगाल इन राज्यों में शामिल है। देश में सबसे ज्यादा उपजाऊ माना जाने वाला गंगा घाटी क्षेत्र पहले ही कम बारिश और बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में यह रिपोर्ट और भी चिंता पैदा करती है। 

गंगा घाटी क्षेत्र देश के भीतर 10 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है। कृषि के लिहाज से यह सबसे ज्यादा उपजाऊ क्षेत्र है। इसके कुछ इलाकों को छोडक़र ज्यादातर हिस्से खेती के लिए बारिश पर निर्भर है। इसलिए बारिश में 20 फीसदी कमी कृषि के लिए घातक साबित हो सकती है। रिपोर्ट में तापमान बढ़ोतरी के खतरों से आगाह करते हुए कहा गया है कि भारत और अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। गेहूं का 6 फीसदी, चावल का 3.2 फीसदी, मक्का का 7.4 तथा सोयाबीन का 3.1 फीसदी उत्पादन घट सकता है। रिपोर्ट के अनुसार दो डिग्री तापमान बढ़ने की स्थिति में ग्लेशियरों में जमी एक तिहाई बर्फ पिघलकर खत्म हो जाएगी।

 इसका दुष्प्र्रभाव इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों के जल स्तर पर पड़ेगा जिन पर भारत और पड़ोसी देशों में करीब 80 करोड़ लोग निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार तापमान बढ़ोतरी की स्थिति में कोलकाता समेत कई स्थानों मेें हर साल वैसी ही गर्म हवाएं चलना आम हो जाएगा जैसी 2015 में चली थी। यहां यह उल्लेखनीय है तब तापमान 45 डिग्री पार कर गया था और लू की चपेट में आकर ढ़ाई हजार लोगों की मौत देश के विभिन्न हिस्सों में हुई थी। विशेषज्ञों के अनुसार भारत उन सबसे संवेदनशील देशों में शामिल है,जहां जलवायु परिवर्तन की वजह से चरम मौसमी घटनाएं होती है। भारत जैसे क्षेत्र अत्यंत गर्म हवा ही चपेट में आ सकते हैं। जीडीपी को नुकसान पहुंच सकता है।

तटीय इलाके पहले ही समुद्री जल स्तर के बढ़ने की वजह से संघर्ष कर रहे हैं। अगर तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे नहीं रखा गया तो और ज्यादा मुसीबत बढ़ेगी। तापमान बढ़ने के खतरों में महज 0.50 डिग्री की बढ़त पर्यावरण व जीवजगत में भारी उथल-पुथल मचा सकती है। लेकिन इसके मूंगा चट्टाने और आर्कटिक का ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ समाप्त हो सकते हैं। दुनिया भर में लाखों लोग लू, पानी की कमी, तटीय बाढ़ के खतरे की जद में आ सकते हैं। कार्बन उत्सर्जन यदि अभी की तरह जारी रहा तो अत्यधिक गर्मी बढ़ेगी। इससे दुनिया भर में बाढ़ और बीमारियों से तबाही बढ़ने का अंदेशा है। ऊंची समुद्री लहरे खारे पानी व छोटे बचपन जैसी समस्याएं भी होगी। पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य को पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

19 वीं सदी से अब तक पृथ्वी पहले ही 1 डिग्री सेल्सियस या 1.8 डिग्री फॉरेनहाइट गर्म हो चुकी है। अब यह 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस गर्म होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में इस संभावित बढ़ोतरी के नतीजों से आगाह किया गया है। इसी सप्ताह सोमवार को जारी अपनी ताजा रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के सारे देशों को चेताया है कि वक्त तेजी से गुजर रहा है और अब भी हम नहीं चेते तो धरती पर प्राणी जगत का अस्तित्व गंभीर खतरे में पड़ जाएगा। दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में दुनिया के वैज्ञानिकों के साथ लंबे विचार विमर्श के बाद यह रिपोर्ट जारी हुई। इसमें साफ तौर पर आगाह किया गया है कि धरती को आज जिन गंभीर संकटों का सामाना करन पड़ रहा है, उनके कारण वैश्विक समाज और अर्थव्यवस्था भी गंभीर खतरे में है।

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट इस मायने में विशेष महत्व रखती है क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा चिंता धरती के बढ़ते तापमान को लेकर जताई गई है। कहा गया है कि धरती का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और आने वाले दशकों में यह तीन से चार डिग्री और बढ़ सकता है। ऐसे में यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि क्या हम इतनी गर्मी झेल पाएंगे? तवे जैसी तपती धरती पर से जीवों का खात्मा होने का यह बड़ा कारण बन सकता है। जैसा कि इन दिनों में देखने में आ रहा है। धरती की सतह का तापमान बढ़ने से ही महासागरों में भयंकर उथल-पुथल मच रही है और कई देशों को सुनामी और बड़े तूफानों का सामना करना पड़ रहा है। बेमौसम की बारिश, बाढ़, ओले और सूखे जैसी आपदाएं इस बढ़ते तापमान का ही नतीजा है।

एक पर्यावरण थिंक टैंक ने कहा है कि आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल) की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि दुनिया बढ़े हुए समुद्र जल स्तर की गवाह बनेगी। सूखे और बाढ़ तथा लू का दौर बढ़ेगा और ऐसे में भारत जैसे देश जहां बड़ी आबादी कृषि और मत्स्य क्षेत्र से जुड़े हैं बेहद प्रभावित होंगे। सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने कहा है कि तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने का प्रभाव पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा है, जबकि दो डिग्री सेल्सियस का प्रभाव भारत जैसे गरीब और विकासशील देशों के लिए विनाशकारी होगा।

  • यदि औसत तापमान में दो डिग्री बढ़ोतरी होती है तो उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे गंगा घाटी वाले राज्यों में 20 फीसदी बारिश की कमी आ सकती है
  • बारिश में 20 फीसदी कमी का मतलब सूखा पड़ना होता है
  • जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) द्वारा इसी सप्ताह जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 50 फीसदी की कमी लानी होगी वरना सदी के अंत तक तापमान में दो डिग्री या ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है
  • रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है
  • इसमें भारत और दक्षिण पूर्व एशिया का अलग से संदर्भ लेते हुए कहा गया है कि इन देशों के लिए स्थिति ज्यादा चिंताजनक है
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि तापमान में बढ़ोतरी 2 डिग्री होती है, तो इससे गंगा घाटी वाले राज्यों में बारिश में 20 फीसदी तक की कमी आ सकती है
  • गंगा घाटी वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, हिमालय, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड और आंशिक रूप से पश्चिम बंगाल शामिल है
  • देश में सबसे ज्यादा उपजाऊ माना जाने वाला गंगा घाटी क्षेत्र पहले ही कम बारिश और बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में यह रिपोर्ट और भी चिंताएं पैदा करती है
  • गंगा घाटी क्षेत्र देश के भीतर 10 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है। कृषि के लिहाज से यह सबसे उपजाऊ क्षेत्र है
  • इसके कुछ इलाकों को छोडक़र ज्यादातर हिस्से खेती के लिए बारिश पर निर्भर है इसलिए बारिश में 20 फीसदी कमी कृषि के लिए घातक साबित हो सकती है
  • रिपोर्ट में तापमान बढ़ोतरी के खतरों से आगाह करते हुए कहा गया है कि भारत और अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है
  • गेहूं का 6 फीसदी चावल का 3.2 फीसदी, मक्का का 7.4 और सोयाबीन का 3.1 फीसदी उत्पादन घट सकता है
  • दुनिया भर में लाखों लोग लू, पानी की कमी, तटीय बाढ़ के खतरे के जद में आ सकते हैं


 

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