युवा जो संकल्पित हुआ

Samachar Jagat | Tuesday, 07 Aug 2018 10:27:30 AM
Young man grow up

एक बार एक युवा अपने कदमों को पटकते हुए जा रहा था, लेकिन जा कहां रहा था यह उसे बिल्कुल भी मालूम नहीं था। उसके चेहरे से साफ झलक रहा था कि वह बहुत परेशानी में था। न आंखों में चमक थी न तन में जान और मन तो पहले से ही बेजान था। कभी बड़बड़ाता कभी चीखता और कभी अपने कदमों को धरती पर जोर से मारता और जोर से बोलता-‘मैं कहां जाऊ? किधर जाऊ? इस भीड़तंत्र में, इस भ्रष्ट तंत्र में। मेरी मां ने मेरे को जन्म देने के लिए न जाने कितनी मनौतियां मांगी थी, न जाने कितने देवघरों पर, कितने मंदिरों में प्रसाद बोल कर आई थी और मेरे जन्म पर पूरे मौहल्ले वालों को, परिचितों को और सगे-सम्बंधियों को शानदार भोज दिया था। 

क्या यह सब इसी दिन के लिए किया था। मेरी मां रोज हर मौसम में सुबह चार बजे उठकर पशुओं की देखभाल, घर की साफ-सफाई और मेरे लिए गरमा-गरम दूध का एक गिलास उसमें में घी-चीनी घोलकर मुझे अब तक पिलाती रही है। मां के हाथ घिस गए हैं, पड़ौसियों के यहां बुहारी-पोचा करते-करते, मां को ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्या मिला मां को मुझे पढ़ाने पर। मैं कितना बदनसीब हूं जो पिता के दर्शन तक नहीं कर सका क्योंकि वे तो मेरे जन्म के एक महीने पहले ही चल बसे थे।

मैंने भी क्या कम मेहनत की है, दूध बेचा, मां के साथ मजदूरी की, सुबह-सुबह पेपर बांटे और भी न जाने क्या-क्या? फिर भी हमारे झौंपड़े में से बारिश की बूंदें और सूरज की किरणें नाचती हुई-धमकाती हुई आती है। मां का सपना है मेरा लाल खुशहाल बनेगा और लोगों को खुशहाल करेगा लेकिन मुझे लगता है कि मैं इसी तरह फटेहाल-बदहाल रहूंगा और मेरी मां का सपना अधूरा रहेगा क्योंकि मैं जहां भी अप्लाई करता हूं वहां सलेक्शन पहले ही हो जाते हैं और मेरे पास घूस देने के लिए पैसे नहीं है यह भी सच है लेकिन यह भी सच है कि यदि मेरे पास पैसे होते भी तो मैं घूस देकर किसी योग्यताधारी का हक नहीं मारता। 

लेकिन मैं अब क्या करूं? तभी उसकी नजर एक चींटी पर पड़ी, जो अपने से डबल वजन के दाने को लेकर उबड़-खाबड़ जमीन पर, कांटों में सुलगती धरती पर दनादन जा रही थी अपने लक्ष्य की तरफ। युवा ने जब उसे आंखें फाडक़र देखा तो उसके ज्ञान के चक्षु खुल गए और उसके सारे दुर्बल विचार मिनटों में गायब हो गए और वह अपने आप से कहने लगा- मुझे दुनिया की कोई बाधा नहीं रोक सकती खुशहाल बनने और सभी को खुशहाल करने में। अब केवल और केवल मुझे मेरा लक्ष्य दिखाई दे रहा है, लक्ष्य के सिवाय मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। जब एक चींटी ऐसा कर सकती है तो फिर मैं ठहरा एक समर्थ युवा, मजबूत युवा, भारत का युवा और संकल्पित युवा।

प्रेरणा बिन्दु:- 
चींटी को लुढक़ते-गिरते देखा
पर, देखा मुंह में वजनी दाना
धीरज को हिम्मत में रखकर
युवा हुआ लक्ष्य पर रवाना।
 



 

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