फुटपाथ पर कंचे खेला करते थे , संगत बिगड़ी तो लुटेरे बन गए

Samachar Jagat | Monday, 06 Jun 2022 12:21:20 PM
Used to play marbles on the pavement, if the company deteriorated, then they became robbers.

जयपुर। आपकी लगाम जरा भी ढीली पड़ी तो इसके परिणाम देख लीजिए । आपके परिवार में रह रहा सात - आठ साल क ा बालक गंभीर किस्म के अपराधांें में भागीदार बन सकता है। बात चिंताजनक है। सरकार हैरान है। मगर इन अपराधों पर लगाम लगाया जाना बड़ा मुश्किल हो गया है। समस्या बेहद सीरियस होने पर, देश- विदेश मंे मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और वैज्ञानिक अपना माथा खपा रहे हैं, मगर बरसों बीत जाने के बाद भी कोई खास असरदार फार्मुला नहीं बन पाया है। खतरनाक बाल अपराधियोंं की ये फौज कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। आखिर क्यांंे? यह सवाल ऊपरी तौर पर सामान्य सा बेशक लगे, मगर इसकी जड़ में फैल रहे इस जहर का परिणाम बहुत ही शौचनीय हो सकता हैं। यहीं बात देश- विदेश की हो तो यह विषय बड़ा व्यापक बन जाता है, मगर अफसोस , अपनी खूबसूरती और नागरिकों की उच्च शोच और छवि, जयपुरवासियों का दिमाग खराब कर डालती है।

यहां पहली घटना आगरा रोड़ की है। ट्रांसपोर्ट नगर वाली पुलिया के निक ट बना उबड़खाबड़ बस स्टेण्ड । अपराधियों का अXा बन चुका है। दस से पंद्रह साल की उम्र वाले करीब एक दर्जन बच्च्ेा जिनके हाथों में किताब और पुस्तकें होनी चाहिए थी, मगर अब बस एक ही विचार दिमाग में घूमता रहता है...कहां और कैसे बड़ी वरदात की जाए। इस मसले में उनकी नजरें बड़ी पैनी होती है। कोई यात्री चाहे जितनी सतर्कता बरतले, इन अपराधियों को आए बिना नहीं रह सकता है। फिर यह सच भी है। पुलिस भी इस मामले में मात खा जाती है। देखने की बात यह है कि, इनके अपराध कांड बड़े उलझे हुए होते है। आपके सामने कौन सा फटेहाल बच्चा बड़े की अपराधी की शक्ल में आ जाए। इन बारे में जल्दबाजी से काम उल्टा भी हो सकता है।

यह वाकिया गत रविवार का है, समय रात के नौ बजे थ्ो। स्टेंड पर कोई आठ- दस बसें आडी- टेडी हालत में आगरा की ओर जाने की तैयारियां कर रही थी। शादी समारोहों का मौसम होने पर यात्रियों की भीड़ ने रिकार्ड तोड़ने का संकल्प लिया हुआ लगता है। बसोंं की करीब- करीब सभी सीटें फु ल हैं। नीचे रोड़ पर भी लोग खड़े हैं। बस में धुसने के लिए दावपेच अपना रहे है। एक ओर गर्मी और दूसरी तरफ पसीने की बदबू...। जी घबराने लगता है। तभी शोर सुनाई देता है, चोर- चोर। पकड़ों चोर। कौन है। कहां है। भीड़ की नजरें एक दूसरे को घूरती हुई। अपराधियों को खोजने में लगी है। कहने को वहां गश्ती पुलिस की गाड़ी दिखाई दे रही है। मगर जाने क्यों, एक्सन मंुड में नहीं आ पाई है।
मौके पर जमा लोगोंे का ही सफल प्रयास रहा, कोई दस- बाह साल क े एक छोकरे की गिरेबां दबोचली। पिटाई तो होनी ही थी। बात श्रेय लेने की आई तो पुलिस प्रेसनोट में वाह- वाह पुलिस। जय हो आपकी। बड़ी कोशिशों के बाद नकबजनोें का गैंग पकड़ा गया। कई वारदातांें का भंडा फोड हो सकता है। फिर आगे, पुलिस कस्टडी में जब पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ तो जाल केभीतर जाल। अनुसंधान चल रहा है। जल्द ही कोई ठौस कार्ययोजना मीडिया को बताई जाएगी। बाल अपराधी जीतू कहता था कि उनके एक्सन की शुरूआत में पहला

अपराध स्थल का चयन। कितना पोटेंशियल। पुलिस से बचाव और बड़ा कांड करने के ठीक पहले एक वारदात जेब तरासे की, की जाती है। इसके लिए भी नकबजन टीम का नया अपराधी लगाया जाता है। कोशिश की जाती है कि वारदात के बाद ही मौके पर वह पकड़ा जाए। शोरगुल का माहोल। अफरातफरी में मोटा शिकार गिरफ्त में आ जाए। इस बार भी यही हुआ। बदमाशों के आगे पुलिस तंत्र भी कुछ नहीं कर सका। जीतू की निशान देही पर उसके दो और साथी जो उसक ी हम उम्र के थ्ो, पुलिस की पकड़ में आ गए। इस कांड मंें दो पेश्ोवर नकबजन भी शामिल थ्ो, मगर चाकू चमकाते हुए वहां से चम्पत हो गए। चोरी गया माल हजारों की कीमत का था। चार हजार की नकदी भी थी। सब कुछ साफ हो गया।

पुलिस का एक्सन कहता है, अपराध में कोई छोटा- बड़ा नहीं होता है। अपराध चाहे जिसने भी किया हो, सजा दिलवाना उनका फर्ज बनता है। बाल अपराधियों की परिभाषा में यह उल्लेखित किया गया है, 8 से 16 साल की उम्र में यदि कोई बच्चा कानून तोड़ता है तो वह अपराधी की श्रेणी में आता है। बाल अपराधियों की तीन श्रेणियां निर्धारित की गई है। पहला मनोवैज्ञानिक, दूसरी सामाजिक और तीसरी वैज्ञानिक। सभी का सोचने का अपना अलग- अलग तरीका है। पुलिस विभाग द्बारा जारी हाल के आंकड़ों में बाल अपराधियों की प्रतिशत काफी अधिक तेजी खा रही है। ऐसे बच्चों की पहचान के तौर पर इनकी शारीरिक रचना, कद सामान्य, गठीला बदन,निडरता और आक्रामक। इसके अलावा ऐसे बच्चे बैचेन, उग्र और विघटनकारी होते हैं। कानून और अनुशासन तोड़ना इनके लिए सामान्य बात होती है। इनकी आदतें स्कूल स्तर पर ही शुरू हो जाती है। छोटी- छोटी चोरियां आगे जाकर उन्हें बड़े अपराध के लिए प्रेरित करती है।

 सूत्र बताते हैं कि जयपुर के आगरा रोड़, दिल्ली रोड़ कुंडा गांव के आसपास, पांच्यावाला बिंदायका रोड़, अजमेर रोड़ पर बगरू के आगे किशन गढ तक इन बदमाशांें की टोलिया सक्रिय है। देखने में वे ा बेशक मासूम दिख्ो मगर उनकी करतूतों पर नजर रखने की आवश्यकता है। इस सिलसिले में राष्ट्रस्तर पर एक संस्थान देश की आजादी के बाद से ही कार्यशील है। मुंबई का बड़ा जयपुर में भी किया जा सकता है।



 

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