आजादी के नायक के वारिस लकड़ी बेच कर भर रहे हैं पेट

Samachar Jagat | Thursday, 13 Aug 2020 07:30:01 PM
Freedom hero's heirs are filling their stomach by selling wood

इटावा। आजादी के आंदोलन में चंबल इलाके में अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले चकरनगर स्टेट के राजा निरंजन सिंह जूदेव का परिवार बबूल की लकड़यिां काट कर गुजारा कर रहा है।

उत्तर प्रदेश में इटावा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित चकरनगर के किले की हर ईंट 1857 की क्रांति के इतिहास की गवाही दे रही है। इटावा के के.के. पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डॉ. शैलेंद्र शर्मा ने बताया कि अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी नीतियों और अत्याचार के खिलाफ 1857 में क्रांति का बिगुल बजा था।

उस वक्त रियासत के राजा रूप सिंह और चकरनगर रियासत के राजा निरंजन सिंह जूदेव ने बीहड़ में बगावत की मशाल जलाई थी। गुलामी के काले दिनों से लेकर आजादी के उजाले तक तमाम यादें समेटे राजा निरंजन सिंह का किला आज खंडहर बन चुका है।

राजा निरंजन सिंह जूदेव के वंशज हरिहर सिंह चौहान ने बताया कि आजादी के बाद देश की सरकार बनी तो इस रियासत की तरफ से नजर फेर लिया गया। प्रशासन की उपेक्षा के शिकार महल को ना तो संरक्षित करने का प्रयास किया गया ना ही महान स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को किसी तरह की सहायता दी गई।

महल वीरान खंडहर बन चुका है और परिवार बबूल की लकड़यिां काट कर किसी तरह गुजारा कर रहा है। रियासत की बची हुई बीहड़ की जमीन पर महज 10 फ़ीसदी हिस्सा खेती योग्य है। बाकी जमीन पर विलायती बबूल के जंगल लगे हुए हैं। रुंधे हुए गले से हरिहर सिंह ने बताया कि बगावत के दिनों में इस जंगल में पूर्वजों का सिर छिपाने की पनाह दी थी।

अब हमारे पेट वाले का साधन बना हुआ है। बीहड़ के जंगलों में छुपकर राजा निरंजन सिंह 1860 तक अंग्रेजों के दांत खट्टे करते रहे 1860 में अंग्रेजों ने धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उसी साल उन्हें काला पानी की सजा दी। (एजेंसी)
 



 

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