3 दिसंबर: ऊंचा कद और सोच बड़ी, ऐसी शख्सियत रखते थे भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जानिएं उनसे जुड़ी कुछ बातें

Samachar Jagat | Monday, 03 Dec 2018 03:35:53 PM
India's first President Rajendra Prasad was born on December 3

इंटरनेट डेस्क। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक और भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जयंती पर आज उन्हे पूरा देश याद कर रहा है। राजेन्द्र प्रसाद का जन्म आज ही के दिन यानी 3 दिसंबर 1884 बंगाल के जिरोदोई (अब बिहार में) हुआ था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पिता का नाम महादेव सहाय था जो कि एक जमीदार थे। वहीं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं।

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का शुरूआती समय भी अन्य बच्चों की तरह गुजरा। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा छपरा के जिला स्कूल से पूरी की। उनका विवाह 13 साल की उम्र में ही राजवंशी देवी से हो जाने के बाद भी राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आखिरकार उन्होंने विधि विषय में डॉक्ट्रेट की उपाधि हासिल की। राजेन्द्र बापू को वैसे तो कई भाषओं का ज्ञान था जिसमें अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी और बंगाली भाषा शामिल थी, लेकिन इन में से उन्हे अपनी सिर्फ हिंदी और भारतीय भाषा से ही बहुत प्रेम था।

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राजेन्द्र प्रसाद के लेख हिंदी भाषा में कई पत्रिकाओं में छपते थे। राजन्द्र प्रसाद का स्वतंंत्रता आंदोलन में भी अपना अहम योगदान दिया था। महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात चंपारण में हुई थी। जब महात्मा गांधी ने उन्हे अपने पास बुलाया तो उन्होंने कोलकाता विश्व विद्यालय के सिनेटर पद से त्यागपत्र दे दिया था और उनके साथ मिलकर आजादी की लड़ाई के लिए लग गए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के भी एक प्रमुख नेता रहे थे। 1912 ई. में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वें प्रधान मन्त्री थे और जब 1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10वां अधिवेशन पटना तब भी वे वें प्रधान मन्त्री थे।

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वे दो बार (1934 और 1939) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था। यहीं नहीं डॉ. राजेंद्र प्रसाद एकमात्र नेता रहे, जिन्हें दो बार लगातार राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1950 में संविधान सभा की अंतिम बैठक में राष्ट्रपति चुने गए और 26 जनवरी, 1950 से 13 मई, 1962 तक देश के राष्ट्रपति रहे। राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया। यहां तक की और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करने के लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया। उनका ये सराहनीय कार्य एक परम्परा बना जो आज भी जारी है। छोटे कद के और देखने में एक किसान की तरह लगने वाले राजेन्द्र प्रसाद के बारे में काई नहीं कह सकता था कि वे इतने प्रतिभासम्पन्न और उच्च व्यक्तित्ववाले सज्जन हैं। अपने जीवन के आखरी महीने बिताने के लिए उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। जहां 28 फरवरी 1963 में उनका निधन हो गया। 

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