रिश्ते सम्पूर्ण जीवन के आधार हैं

Samachar Jagat | Monday, 06 May 2019 02:44:26 PM
Relationships are the basis of whole life

रिश्ते अर्थात् आत्मियपन रिश्ते अर्थात् अपने रिश्ते अर्थात् पवित्र बंधन अर्थात् निश्छल प्रेम रिश्ते अर्थात् अनेक शरीर आत्मा एक, काम नेक, दिल एक, संकट एक, खुशी एक, भोजन एक, उत्सव एक, बोझ एक, सब साथ-अनेक हाथ। रिश्ते की तो यही भाषा है और यही परिभाषा है। क्या आनंद है सब परिजन एक साथ भोजन लेते हैं, घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं और खड़े हो जाते हैं किसी संकट में एक साथ, खड़े रहते हैं किसी समारोह में एक साथ और काम करते हैं अनेक हाथ। लेकिन अफसोस ही नहीं बड़ा अफसोस है कि ये रिश्ते ये नाते दूर जाते हुए दिखाई दे रहे हैं, छिटकते-मिटते दिखाई दे रहे हैं और सबसे ज्यादा आहत अपने ही कर रहे हैं, देखिए एक बागनी- एक बार सोने ने लोहे से कहा- भाई, आप और मैं एक ही हथौड़ी से पिटते हैं। लेकिन मेरी समझ में एक बात नहीं आती है कि आप पिटते समय इतनी जोर से क्यों चिल्लाते हो? लोहा ने बड़े दु:ख के साथ कहा कि भाई जब कोई अपना पीटता है, आहत करता है तो ज्यादा तकलीफ होती है। और यह सही है आज व्यक्ति अपनों से आहत ज्यादा है।

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एक बार एक पुत्र ने अपने पिता से पूछा- पिताजी व्यक्ति अपनी ऊंचाई को हमेशा कैसे बरकरार रख सकता है? पुत्र से ऐसी बात सुनकर पिताजी ने उससे कहा- चलो बेटा मैदान में चलते हैं और वहां पतंग उड़ाते हैं। पिताजी पतंग उड़ाने लगे, पतंग धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी। पुत्र यह देखकर बहुत खुश हो रहा था, लेकिन अब पतंग और ऊंची नहीं जा रही थी। पुत्र ने फिर अपने पिताजी से कहा- पिताजी इस धागे को तोड़ दो ताकि यह पतंग और ऊंचाई की ओर जाए। पिताजी ने अपने पुत्र की बात सुनकर धागे को तोड़ दिया। ऐसा होने पर कुछ समय के लिए तो पतंग और ऊंचाई की तरफ गई, लेकिन इसके बाद वह धड़ाम से जमीन पर गिर गई।

 ऐसा होते ही पुत्र ने पिताजी से कहा- यह कैसे हो गया? इस पर पिताजी ने कहा इस धागे और पतंग की तरह ही रिश्ते होते हैं जब ये आपस में बंधे रहते हैं तो व्यक्ति की ऊंचाई हमेशा बनी रहती है और जब कोई व्यक्ति घर-परिवार-समाज से धागे की तरह अपने आपको तोड़ लेता है तो एक बार तो वह अपनी मनमर्जी कुछ स्वतंत्र कर सकता है, लेकिन बिना रिश्तों के वह निरीह, अकेला निम्न स्तर पर ही रहेगा। आइए रिश्ते निभाएं, रिश्ते बचाएं, जीवन बनाएं।

प्रेरणा बिन्दु:- 
बच गया मैं नदी के उफानों से
बच गया मैं आंधी और तूफानों से
यह भी क्या विडम्बना अपने ही घर की
टूट गया मैं दिन दहाड़े अपनों से।



 

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